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अध्याय- 07 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Susmita Mishra

 


अध्याय- 07

उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण




व्यक्ति जब कोई वस्तु या सेवा अपने उपभोग या उपयोग के लिए खरीदता है, तो वह, उपभोक्ता कहलाते हैं उपभोक्ता बाजार व्यवस्था का प्रमुख अंग होता है ।
हमारे बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता का स्थान सर्वोपरि है, यदि उपभोक्ता ना रहे तो उत्पादित वस्तुओं को मांगने वाला ही नहीं होगा। उत्पादन के समस्त क्रिया उपभोक्ता के द्वारा ही संचालित होती हैं, क्योंकि उत्पादक के रूप में हम पहले वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं, और फिर हम अपनी आवश्यकता अनुसार उसी वस्तु और सेवाओं से अपनी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं । बाजार व्यवस्था में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही होते हैं और दोनों का अलग अलग महत्व होता है l  वर्तमान युग में उपभोक्ताओं में वस्तु के मूल्य निर्माण एवं गुणवत्ता के प्रति जागरूक बनाया जाता है, उसे उपभोक्ता जागरण के रूप से जानते हैं l
1. उपभोक्ता जागरण 
मनुष्य को अपना जीवन जीने के लिए ढेर सारी वस्तु और सेवा की आवश्यकता होती है। और उन् आवश्यकता पूर्ति के लिए भिन्न भिन्न वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करता है, इस प्रकार हम यह भी कह सकते हैं कि मानव किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है और एक उपभोक्ता प्रतिदिन विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के संपर्क में आता है लेकिन कई बार, कई स्तर पर उनका शोषण हो जाता है जिसका प्रमुख कारण उपभोक्ता को अपने अधिकार का ज्ञान नहीं होना और जागरूकता का अभाव। उपभोक्ता का अधिकार है कि वह जिस वस्तु या सेवा का उपभोग कर रहा है उसका गुण मात्रा वस्तु बनाने में प्रयुक्त तत्व इससे होने वाले प्रभाव तथा सही मूल्य तथा वजन या मात्रा की जांच , आदि का पूर्ण जानकारी प्राप्त करें। 
आज भूमंडलीकरण के इस दौर में उपभोक्ता जहां एक राष्ट्र से नहीं वरन दूसरे देशों के बने वस्तुओं तथा सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं तो उनको जागरूक होना परम आवश्यक है। 
अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होने के कारण उपभोक्ता प्राय: शोषण के शिकार हो जाते हैं उनके हितों की रक्षा के लिए उन्हें जागरुक बनाना आवश्यक है,। उपभोक्ता जागरण हेतु विभिन्न नारे “जागो ग्राहक जागो” उपभोक्ता जागरण का सर्वाधिक प्रचलित नारा है इसके अतिरिक्त कुछ अन्य ना रहे हैं “एक सजग उपभोक्ता सुरक्षित उपभोक्ता” “अपने अधिकारों को जानो ग्राहकों सावधान रहो” “उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करो” “अपने अधिकारों को पहचानो सदर उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है”. 
2. उपभोक्ता शोषण 
उपभोक्ता शोषण का अभिप्राय उत्पादक अथवा विक्रेता द्वारा उपभोक्ताओं को बेची गई वस्तुओं की गुणवत्ता मात्रा शुद्धता एवं मूल्य आदि से संबंधित अनुचित व्यापार व्यवहार है। 
हमारे उपभोक्ता का एक नहीं कई प्रकार से शोषण किया जाता है।कभी माल् या सेवा की घटिया किस्म के कारण तो कभी कम नापतोल के कारण कभी नकली वस्तुएं उपलब्ध होने के कारण कभी वस्तुओं की कालाबाजारी या जमाखोरी के कारण तो कभी स्तरहीन विज्ञापनों के कारण उपभोक्ता के हितों की अनदेखी की जा रही है । 
आजकल उत्पादकों के साथ प्रलोभन देना एक प्रमुख समस्या बनी हुई जैसे एक वस्तु खरीदने पर एक वस्तु मुक्त पुरानी वस्तुओं के बदले नयी बस्तू , नहाने के साबुन में सोने का लॉकेट मिलेगा, चाय की पैकिंग में डायमंड मिलेगा, अन्य वस्तुओं के साथ स्कूटर फ्रीज TV मोबाइल आदि लाखों का इनाम का लालच। 
उपभोक्ता शोषण के प्रमुख कारक 
*मिलावट की समस्या महंगी वस्तुओं में अन्य चीजें मिलावट करके उपभोक्ताओं का शोषण होता है l
*कम तौलने द्वारा वस्तुओं के माप में हेरा फेरा करके भी उपभोक्ता का शोषण होता है l
*कम गुणवत्ता वाली वस्तु उपभोक्ता को धोखे से अच्छी वस्तुओं के स्थान पर कम गुणवत्ता वाली वस्तु देकर शोषण करना । 
*ऊंची कीमत द्वारा ऊंची कीमत वसूल करके भी उपभोक्ता का शोषण किया जाता है l
*डुप्लीकेट वस्तुएं सही कंपनी का डुप्लीकेट वस्तुएं प्रदान करके उपभोक्ता का शोषण होता है। 
भारत में उपभोक्ताओं की शोषण की समस्या बहुत गंभीर है। क्यों? 
भारत में उपभोक्ताओं के शोषण की समस्या बहुत गंभीर है, हमारे देश के अधिकांश उपभोक्ता अशिक्षित है तथा इसकी आज का अस्तर बहुत नियम है इसके फलस्वरुप हुए अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होते। देश के आवश्यक उपभोक्ता पदार्थों का अभाव होने के कारण उंहें अनेक वस्तुओं और सेवाओं को अधिक मूल्य का पर खरीदना पड़ता है अथवा उनके उपयोग से वंचित रह जाना पड़ता है। भारत उपभोक्ता संघ का प्रभाव है उपभोक्ता एवं व्यापारी इसका अनुचित लाभ उठाकर उपभोक्ताओं का कई प्रकार से शोषण करते हैं भारत जैसे विकासशील देशों में कानूनी प्रक्रिया बहुत जटिल और खर्चीली है इसके फलस्वरुप भी इन देशों में उपभोक्ता का शोषण होता है। 

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian standards Institutions, BIs) :
• इसे जिसे पहले भारतीय मानक संस्थान ( indian Standards Institutions, Ist) के नाम से जाना जाता था। इसका मुख्य कार्य विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं का मानक तैयार कर प्रमाणन योजना चलाना है।
औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ISI मार्क का प्रयोग होता है।
कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क का प्रयोग होता है।
 सोने और जेवरों को हॉलमार्क से पहचाना जाता है।
आधुनिक समय में उपभोक्ता के शोषण की समस्या क्यों गंभीर हो गई है
प्राचीन काल से भी उपभोक्ता या विक्रेता वस्तुओं का शोषण करते थे परंतु व्यापार का विस्तार होने के साथ ही आधुनिक समय में यह समस्या अत्यंत गंभीर हो गई है आज अखबार रेडियो टेलीविज़न आदि प्रचार एवं विज्ञापन के कई साधन उपलब्ध हैं उत्पादक इन पर बहुत अधिक धन ख़र्च करते हैं, जिसका भार उपभोक्ताओं को वहन करना पड़ता है। ग्राहको को आकृष्ट करने के लिए उत्पादक प्राय: अपनी वस्तुओं का भ्रामक प्रचार करते हैं । तथा अपनी वस्तुओं की गलत या अधूरी जानकारी देते हैं। बाजार में एकाधिकार एवं अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति होने के कारण भी उपभोक्ताओं का शोषण होता है ऐसी स्थिति में वस्तुओं की आपूर्ति पर बहुत थोड़े से उत्पादकों या विक्रेताओं का नियंत्रण रहता है और वह बाजार को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित कर सकते हैं । 

 → उपभोक्ता संरक्षण एवं सरकार 

उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा संबंधी अधिनियम 
भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कई अधिनियम या कानून लागू किए हैं इससे इसमें नापतोल मानक अधिनियम, खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम आदि महत्वपूर्ण है। 

उपभोक्ताओं के हित की रक्षा के लिए सरकार ने सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उपभोक्ता संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह एक अत्यंत प्रगतिशील और व्यापक कानून है इस अधिनियम के सभी प्रावधान जुलाई 1987 से प्रभावी हुए हैं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सभी प्रकार के वस्तुओं और सेवाओं के विक्रय पर लागू होता है अक्टूबर 2005 में भारत सरकार ने सूचना के अधिकार के नाम से एक अन्य अधिनियम पारित किया है जो जनहित तथा उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 
उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारो सुरक्षा एवं उनके शोषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया है इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं इसके अंतर्गत अनुचित व्यापार तरीकों का प्रयोग करने वाले उत्पादकों तथा विक्रेताओं को दंड देने के स्थान पर उपभोक्ताओं की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई है इसके लिए राष्ट्रीय राज्य एवं जिलास्तर पर एक अर्ध न्यायिक तंत्र गठित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग राज्य स्तर पर राज्य आयोग तथा जिला स्तर पर जिला अदालत कहा जाता है इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों को शीघ्रता से कम खर्च में दूर करना है यह अधिनियम वस्तुओं और सेवाओं के क्रय विक्रय पर लागू होता है 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारों का वर्णन 
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उनकी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है
उपभेक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत उपभोक्ताओं को कुछ अधिकार दिये गये हैं हैं -
1. सुरक्षा का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं से शरीर या संपत्ति को हानि से बचाने के लिए यह अधिकार दिया गया है)।
2. सूचना पाने का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं को खरीदते समय उससे संबंधित जानकारी, जैसे - मूल्य, इस्तेमाल करने की अवधि, गुणवत्ता, अवयवों की सूची इत्यादि) 
3. चुनाव या पसन्द करने का अधिकार (वस्तुओं के ब्रांड, किस्म, गुण, रंग इत्यादि पसन्द करनेका अधिकार) 
4. क्षतिपूर्ति का अधिकार (खरीदी गई वस्तु ठीक ढंग की नहीं होने पर उपभोक्ता को मुआवजे या क्षतिपूर्ति का अधिकार)
5. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (धोखाधड़ी से बचने के लिए एवं एक सजग उपभोक्ता बनने के लिए शिक्षा का अधिकार)

· उपभोक्ताओं के अधिकार की रक्षा एवं हितों के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद एवं राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना की गई 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था दी गई है जिसे तीन स्तर पर स्थापित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग, राज्य स्तर पर राज्य स्तरीय आयोग, जिला स्तर पर जिला मंच (फोरम)। यह न्याय व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्यवहारिक है इस ग्रुप व्यवस्था से उपभोक्ताओं को जल्दी एवं सस्ता न्याय प्राप्त होता है एवं समय एवं धन की बचत होती है पहले शिकायत जिला फोरम में की जाती है शिकायतकर्ता अगर संतुष्ट नहीं है तो मामले को राज्य फोरम फिर राष्ट्रीय फोरम में ले जा सकता है, अगर उपभोक्ता राष्ट्रीय फोरम से भी संतुष्ट नहीं होता है तो आदेश के 30 दिनों के अंदर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है। 

शिकायत कहाँ करें?
1. जिला फोरम : यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख रूपये तक हो।
2. राज्य आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख से 1 करोड़ तक हो 
3. राष्ट्रीय आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 1 करोड़ से अधिक हो
शिकायत दर्ज करने का तरीका 
उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। इस प्रकार की कोई भी शिकायत व्यक्तिगत रूप से या डाक द्वारा भेजी जा सकती है। शिकायत को सादे कागज पर लिखकर निम्नलिखित विवरण जैसे शिकायतकर्ताओं तथा विपरीत पार्टी का नाम का विवरण तथा पता, शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह सब कब हुआ और कहां हुआ, शिकायत में उल्लेखित आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, शिकायत पर शिकायतकर्ताओं अथवा उसके प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को निम्नलिखित राहत देने का प्रावधान है 
i. विक्रय की गई वस्तु या सेवा को बदलना 
ii. विक्रय की जाने वाली वस्तुओं की त्रुटि को दूर करना 
iii. वस्तुओं या सेवाओं के लिए अदा की गई रकम को वापस लौटाना 
iv. उपभोक्ताओं द्वारा सहन की गई हानि की क्षतिपूर्ति करना 

· विश्व के अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी कुछ ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना की गई है जो उपभोक्ताओं के इस शोषण का निराकरण करती है मुख्य रूप से राष्ट्रीय राज्य एवं निम्न प्रशासकीय स्तर पर 2 संस्थाएं महत्वपूर्ण है जो लोगों के जीवन और उपयोग के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है 

मानवाधिकार आयोग :
यह राष्ट्रीय स्तर की उच्चतम संस्था है । यह मानवीय अधिकारों की रक्षा एवं उनके हितों की सुरक्षा प्रदान करती है।
सूचना आयोग :
उपभोक्ताओं को वस्तुओं एवं सेवाओं से संबंधित सूचना प्राप्त कराने के लिए गठित आयोग।
. राज्य स्तर पर राज्य सूचना आयोग।
 राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सूचना आयोग।
सूचना का अधिकार क्या है 
सूचना का अधिकार आम आदमी का अधिकार संपन्न बनाने हेतु सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कदम है सूचना का अधिकार का तात्पर्य है कोई भी व्यक्ति अभिलेख ईमेल आदेश दस्तावेज नमूने और इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े आदि के रूप में ऐसी प्रत्येक सूचना प्राप्त कर सकता है जिसकी उसे आवश्यकता है जिसके लिए आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन करेंगे जिसकी सूचना 30 दिनों में विशेष परिस्थिति में 48 घंटे संबंधित व्यक्तियों को सूचना उपलब्ध करवाया जाएगा। 
एक उपभोक्ता के रुप में बाजार में अपने कर्तव्य का वर्णन करें 
उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए प्रायः सभी देशों में अवश्य कानून बनाए गए हैं परंतु उपभोक्ताओं के भी कुछ कर्तव्य हैं तथा इनके शोषण को रोकने के लिए आवश्यक है कि वे अधिकारों के साथ ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी सचेत हो एक उपभोक्ता के रुप में हमारे लिए निम्नलिखित कर्तव्य को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है 
a. उपभोक्ता को ना केबल वस्तुओं के क्रय विक्रय की व्यवसायिक पक्षों की जानकारी होनी चाहिए वर्णन स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की भी जानकारी आवश्यक है उन्हें कोई भी सामान खरीदते समय उनकी गुणवत्ता और शुद्धता के प्रति पूर्णतया स्वस्थ हो जाना चाहिए यदि यह सामान्य सेवा की गारंटी दीजिए गई है तो गारंटी कार्ड को पूरा करा कर उसे रख लेना चाहिए. 
b. जहां कहीं भी संभव हो खरीदे गए सामान या सेवा की रसीद अवश्य लेनी चाहि 
c. आने का स्थानों पर सरकार अथवा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उपभोक्ता संघ की स्थापना की गई है उपभोक्ता को इस के कार्यक्रम में रुचि लेनी चाहिए। 
d. एक उपभोक्ता द्वारा क्रय की जाने वाली वस्तु है कितनी ही कम मूल्य की क्यों ना हो उसे अपनी वास्तविक समस्या की शिकायत अवश्य करनी चाहिए 
e. उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर इसका प्रयोग भी करना चाहिए 
उपभोक्ताओं की जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से ही उन्हें उत्पादकों और व्यापारियों के शोषण से बचाया जा सकता है। 
नोट :-  इस नोट्स को लिखने के लिए कई किताबो को सन्दर्भ में रखा गया है l किसी भी तथ्यों में शंका हो तो हमारे whatsapp नंबर 9060219579 पर संपर्क करें l 

रोजगार एवं सेवा ( अध्याय 5 ) (वर्ग 10)

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 ( अध्याय 5 

रोजगार एवं सेवा


किसी देश की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका रोजगार होता है  l जब कोई व्यक्ति अपने परिश्रम एवं शिक्षा के आधार पर जीविकोपार्जन के लिए धन एकत्रित करता है अर्थात आर्थिक क्रियाकलाप कर वह अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं जैसे रोटी कपड़ा और मकान प्राप्त कर सके रोजगार कहलाता है l 
अपने परिश्रम व शिक्षा के आधार पर कमाया गया धन को जब पूंजी के रूप में व्यवहार किया जाता है और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश किया जाता है तो सेवा क्षेत्र उत्पन्न होता है अतः रोजगार एवं सेवाएं एक दूसरे के पूरक है अर्थात रोजगार वृद्धि से सेवा क्षेत्र का भी विस्तार होता है l 


रोजगार एवं सेवा में क्या संबंध है

रोजगार एवं सेवाओं में घनिष्ठ संबंध है आर्थिक समृद्धि के साथ सेवा क्षेत्र अब देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इसमें रोजगार की संभावनाएं निरंतर बढ़ती जा रही है l  इस क्षेत्र के अंतर्गत ऐसी अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन संभव है विगत वर्षों के अंतर्गत संचार सेवाओं के प्रसार से सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई हैl भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है, जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर है कृषि पर इस अत्यधिक जनभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है l 

श्रम बल तथा कार्य बल में अंतर

 समाज के जो व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन कर सकते हैं वही श्रमबल का निर्माण करते हैं परिवार के बच्चे एवं बूढ़े तथा मानसिक  शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति इन क्रियाओं में शामिल नहीं होते हैं इसके अतिरिक्त हम श्रमबल में से ऐसे व्यक्तियों को निकाल देते हैं जो परिवारिक अधिकारियों में व्यस्त हैं या कार्य करने के लिए इच्छुक नहीं है इसका अभिप्राय यह है कि जो व्यक्ति वास्तविक रुप से आर्थिक क्रियाकलापों में लगे हैं अथवा उन्हें करने के योग्य हैं वह सभी श्रम बल के सदस्य हैं इसके विपरीत जो इन क्रियाओं में वस्तुतः लगे हुए हैं उन्हें कार्य बल के रूप में जाना जाता है कार्य बल तथा श्रम बल के अंतर को बेरोजगार श्रमबल कहते हैं जनसंख्या के द्वारा ही प्राकृतिक एवं पूंजीगत साधनों के सहयोग से सकल राष्ट्रीय उत्पाद का सृजन होता है 

आर्थिक विकास का क्षेत्र

रोजगार एवं सेवाएं आर्थिक विकास के विकास और विस्तार से उपलब्ध होती है आर्थिक विकास के मुख्य रूप से तीन क्षेत्र हैं A. कृषि क्षेत्र B. उद्योग क्षेत्र C. सेवा क्षेत्र्

कृषि क्षेत्र

भारत एक कृषि प्रधान देश है कृषि क्षेत्र पर कुल जनसंख्या का लगभग 70%  बोझ अत्यधिक जनसंख्या के कारण कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर छीन  हो गया है फल स्वरुप कृषि क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी एवं अन्य बेरोजगारी पाए जाने लगे हैं जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ खेती  के लिए जमीन में वृद्धि नहीं हो पा रहा है और एक ही भूखंड पर आने वाली नई पीढ़ी भी जुड़ता जा चला जा रहा है जिससे उत्पादन की मात्रा प्रति व्यक्ति पर घटता चला जा रहा है

उद्योग क्षेत्र

रोजगार का दूसरा क्षेत्र उद्योग क्षेत्र है इस क्षेत्र के माध्यम से भी रोजगार की प्राप्ति की जा रही है देश की औद्योगिक विकास की गति में तेजी आने के द्वारा ही औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार की वृद्धि होती है

सेवा क्षेत्र

सेवा क्षेत्र को ही आर्थिक विकास का तृतीय क्षेत्र कहा जाता है सेवा क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में 55.1 प्रतिशत योगदान है जबकि कृषि एवं उद्योग का मात्र 44.9 प्रतिशत आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के कारण सेवा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिलती है सेवा क्षेत्र रोजगार का एक व्यापक क्षेत्र है जिसके अंतर्गत आए दिन मानव संसाधन के लिए व्यापक पैमाने पर रोजगार उपलब्ध होने लगे है

सेवा क्षेत्र का महत्व बताएं

आर्थिक विकास एवं रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवा में परिवहन संचार विज्ञापन वाणिज्य तथा सभी प्रकार के सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है विकसित देशों का अधिकांश कार्य बल सेवा क्षेत्र में कार्यरत है इस क्षेत्र की सेवाओं में इन देशों की आर्थिक विकास को बहुत प्रोत्साहन मिला है

                  वर्तमान समय में भारत का सेवा क्षेत्र बहुत विकसित नहीं है लेकिन आज भी हमारे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक है  कृषि के यंत्रीकरण एवं आधुनिक औजरो के प्रयोग से क्षेत्र में रोजगार के अवसर क्रमशः कम हो रहे हैं इसके फलस्वरुप ग्रामीण जनसंख्या रोजगार की खोज में शहरों में पलायन हो रहा है परंतु हमारे देश का औद्योगिक क्षेत्र में बहुत विकसित नहीं है आर्थिक विकास के साथ ही विनी विनिर्माण उद्योग में भी रोजगार के अवसर का विस्तार होगा लेकिन पूंजी तथा अत्याधुनिक तकनीक के अभाव में औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर में बहुत तेजी से वृद्धि होने की संभावना नहीं है यही कारण है कि आप सभी विकासशील देश रोजगार के नए अवसरों के सृजन के लिए सेवा क्षेत्र को महत्व देने लगे l 

                                                         हमारे देश तथा राज्य के लिए सेवा क्षेत्र का विशेष महत्व है इस छेत्र में की जाने वाली विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक सेवाओं और सुविधाओं एक अर्थव्यवस्था को क्रियाशील बनाती है उदाहरण के लिए कच्चे माल मशीन यंत्र को कारखाना तक पहुंचाने तथा उत्पादित वस्तुओं को बाजार तक ले जाने के लिए यातायात के साधन आवश्यक है उसी प्रकार शक्ति औद्योगिक उत्पादन का आधार है आधुनिक उद्योगों के मुख्यता मशीनों का प्रयोग होता है जो शक्ति अथवा बिजली से संचालित होते हैं संरचनात्मक और सेवाओं के अभाव में कृषि एवं उद्योग किसी भी क्षेत्र का विकास संभव नहीं है l 

                                                           भारत एक विकासशील देश के आर्थिक विकास के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की आवश्यकता है उन्हें पूंजी निवेश करना चाहते हैं उद्योग व्यवसाय के लिए सड़क बिजली पानी आदि कि सुविधाएं उपलब्ध है।

सेवा क्षेत्र के भाग

सेवा क्षेत्र को सामान्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-
सरकारी सेवा जब देश व राज्य की सरकार लोगों को काम करने के बदले मासिक वेतन देती है इनसे विभिन्न क्षेत्रों में काम लेती है तो उसे सरकारी सेवा कहा जाता है सरकारी सेवा के कुछ व्यापक क्षेत्र का उदाहरण है इस प्रकार है जनसेवा रेल सेवा वायु यान सेवा स्वास्थ्य वा वित्त सेवा शिक्षा सेवा बस सेवा कृषि सेवा अभियंत्रण सेवा बैंकिंग सेवा आदि।
गैर सरकारी सेवा
जब सरकार अपने द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों को गैर सरकारी संस्थानों के सहयोग से लोगों तक पहुंचाने का काम करती है अथवा लोग स्वयं अपने प्रयास से ऐसी सेवाओं का सृजन से लाभान्वित होते हैं तो उसे गैर सरकारी सेवा कहा जाता है इस क्षेत्र के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं बैंकिंग सेवा दूरसंचार सेवा यातायात सेवा स्वास्थ्य सेवा स्वरोजगार सेवा आदि।
रोजगार सृजन में सेवाओं की भूमिका आज विश्व का लगभग सभी देशो में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र की उत्पादक विधियों एवं तकनीक में परिवर्तन हो रहे हैं इन परिवर्तनों से सेवा क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित किया है सेवा क्षेत्र अब किसी देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना निरंतर बढ़ती जा रही है 

भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर करती हैं कृषि पर से इस अत्यधिक आभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है क्षेत्र के अत्यधिक ऐसे अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सेवा क्षेत्र की पारंपरिक सेवाओं में परिवहन जिनमें शिक्षा एवं सेवाओं को भी सम्मिलित किया जाता है यह बड़े बड़े पैमाने पर रोजगार की व्यवस्था करती है तथा आर्थिक विकास के साथ-साथ में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है भारत की परिवहन सेवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह हमारे देश के माल ढोने और यात्री परिवहन के साधन है सुरक्षा सेवाओं के बाद रेल देश के सबसे अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कराता है हमारा देश विश्व की सबसे बड़ी सड़क प्रणाली वाले देशों में एक है लेकिन अभी भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की बहुत कमी है तथा ग्रामीण क्षेत्र के निर्माण बहुत अधिक रोजगार सृजन संभव है ग्रामीण क्षेत्र में सड़क का विकास प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत किया जा रहा है इस योजना के उद्देश्य से सभी गांव को सड़क से जोड़ना है जिनकी आबादी 500 से अधिक है जहाजरानी और विमान सेवाएं हमारे देश के अन्य परिवहन साधन है तथा आर्थिक विकास के साथ ही इन सेवाओं में भी रोजगार के अवसर में वृद्धि हुई है।
    वर्तमान में रोजगार सृजन की दृष्टि से संसार सेवाएं भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं डाक सेवक टेलीग्राफ टेलीफोन रेडियो संचार के साधन है इसका प्रयोग कर रहे हैं परंतु विगत वर्षों के अंतर्गत संचार उपग्रहों के प्रयोग से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं क्षेत्र में टेलीफोन मोबाइल इंटरनेट सेवाओं का प्रयोग होने लगा है इसके परिणाम स्वरुप क्षेत्र में रोजगार के अवसर में वृधि हो गया हैं।

· राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार के द्वारा रोजगार सृजन करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिसका क्रियान्वन राज्य सरकार के द्वारा भी किया जा रहा है जिसमें सरकार के द्वारा रोजगार हेतु निम्न प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है सरकार के द्वारा चलाई गई योजना 

· काम के बदले अनाज 14 नवंबर 2004
· राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम 1980
· ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण का कार्यक्रम 1979
· ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम 1983 
· समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम 20 अक्टूबर 1890
· जवाहर रोजगार योजना 1889 
· स्वयं सहायता समूह
· नरेगा
आउटसोर्सिंग किसे कहते हैं ?

विगत वर्षों के अंतर्गत सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का बहुत तेजी से विकास हुआ है ।आज दूर संचार सुविधाओं द्वारा पूर्व की अपेक्षा विभिन्न देशों से संपर्क स्थापित करना तथा सूचनाओं का आदान प्रदान करना शुरू हो गया है अतः अब हम अपने देश में रहकर भी विश्व के अन्य देशों को अपनी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं इससे सेवा क्षेत्र को बहुत विस्तार हुआ है तथा अन्य वस्तुओं के समान हैं इस क्षेत्र के उत्पादन का भी निर्यात होने लगा है ,जब कोई कंपनी अपने उत्पादन से संबंधित सेवाएं अन्य स्रोतों अथवा देशों से प्राप्त करती है तो उसे आउटसोर्सिंग कहते हैं हमारे देश में शर्म सस्ता होने के कारण विकसित देशो के अन्ए काव्य अपनी सेवाओं का भारत में आउटसोर्सिंग करने लगी है एक विदेशी फॉर्म द्वारा अपनी पुस्तक के डिजाइन छपाई आदि के कार्य हमारे देश में करवाना आउटसोर्सिंग का उदाहरण है।

 भारत विश्व को सेवा प्रदाता के रूप में

21 वीं शताब्दी के विश्व के सेवा क्षेत्र में भारतीय श्रम पूंजी का महत्व पूर्ण योगदान रहा है । हमारे देश के निवासी बहुत पहले से उत्तरी अमेरिका ऑस्ट्रेलिया ब्रिटेन आदि विकसित देशों में जाकर अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे हैं आज भारत को विश्व का अग्रणी युवा देश कहा जाता है जहां संपूर्ण जनसंख्या में ऊर्जावान युवा वर्ग की संख्या अधिक हो गई है यह विकास की गति को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है अपने देश में अफसरों की कमी तथा उन देशो का उच्च जीवनस्तर है भारतवासियों को विकसित देशों में जाने के लिए प्रेरित करता है 

उदारीकरण के कारण विश्व के सेवाक्षेत्र में जो विकास की गति आई है इसका लाभ सभी देशों को प्राप्त होने के अवसर आने लगे हैं इस दृष्टिकोण से आज विश्व के औद्योगिक विकसित देश अपने उत्पाद एवं सेवाओं के विभिन्न कामों को संपादन व से लेकर आने लगे हैं जहां उपलब्ध होती है उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में से अधिक का उत्पादन चीन तथा कोरिया में होता है और भारत में भी डाबर कंपनी अपने उत्पाद के कम करने के लिए अपने पड़ोसी देश नेपाल में कारखाना खोल रखे हैं जहां श्रम शक्ति शक्ति है जब बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने संबंधित सेवाएं अपनी कंपनी के जारी किया विदेशी समूह से प्राप्त करती है तो ऐसे सेवाओं को आउटसोर्सिंग कहा जाता हैं ।

सेवा क्षेत्र के विकास में बुनियादी सुविधाएं की भूमिका

सेवा क्षेत्र का संबंध मनुष्य की आवश्यकताएं और सुख सुविधाओं से है आर्थिक विकास एवं आय में वृद्धि के साथ ही इस क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मांग बढ़ती है लेकिन इस क्षेत्र का विकास मुख्य रूप से मानव है तत्वों पर निर्भर है तथा इसके विकास का विस्तार के लिए मानवीय संसाधनों का विकास आवश्यक है योगी कुशल एवं प्रशिक्षण के अभाव में सेवा क्षेत्र का विकास संभव नहीं है एक सक्षम श्रम बल का निर्माण करने के लिए कुछ बुनियादी एवं आधारभूत सुविधाएं आवश्यक है इस प्रकार की सुविधाएं श्रम बल की कार्यकुशलता को बढ़ाती है इन सेवाओं और सुविधाओं में निम्नलिखित महत्वपूर्ण है

वित्त (finance) बैंकिंग क्षेत्र बीमा क्षेत्र अन्य सरकारी विद्या क्षेत्र वित्त क्षेत्र 
ऊर्जा (energy) कोयला विद्युत रेल पेट्रोलियम गैस गैर-पारंपरिक ऊर्जा एवं अन्य।
यातायात (transport) रेलवे सड़कें वायुयान जलयान
संचार (communication) दाक तार टेलीफोन टेली संचार मीडिया एवं अन्य।

गैर आर्थिक संरचना से मनुष्य की क्षमता एवं उत्पादकता में वृद्धि कर अप्रत्यक्ष रुप से उत्पादक एवं अंततः आर्थिक विकास में सहायता प्रदान किया जाता है

शिक्षा (education) मानवीय संसाधनों के विकास की दृष्टि से शिक्षा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है एक उपयुक्त एवं तर्क संगत शिक्षा प्रणाली से देश में कुशल और योग्य श्रम शक्ति का निर्माण होता है और हमारे उत्पादन क्षमता बढ़ती है उचित शिक्षा नागरिकों को मनो बुद्धि ज्ञान एवं क्षमताओं का विकास करो से अधिक योग्य सक्षम तथा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरुप बनाती है केवल व्यक्ति ही नहीं वरन समाज के विकास में भी शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है उचित शिक्षा द्वारा आर्थिक विकास के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं तथा राष्ट्र और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है यही कारण है कि सरकार द्वारा शिक्षा को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है ।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मानव संसाधनों के विकास के लिए स्वास्थ्य सेवाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है हमारे देश में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं ही एक सक्रिय श्रम शक्ति का निर्माण करती है किसी भी व्यक्ति की सतत कार्य करने की क्षमता बहुत आंसुओं में उस के स्वास्थ्य की दशा पर निर्भर है एक स्वस्थ व्यक्ति ही उत्पादन कार्य में सक्रिय रुप से भाग लेकर उत्पादन में वृद्धि कर सकता है वस्तुतः स्वास्थ्य का अधिकार नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है यही कारण है कि हमारे राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवाओं को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य संक्रामक एवं गैर संक्रामक रोगों के उपचार के साथ ही परिवार कल्याण एवं पोषाहार कार्यक्रम का विस्तार करना है पिछले पांच दशक के अंतर्गत भारत में सरकारी एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों में एक वृहद स्वास्थ्य संरचना का निर्माण हुआ है परंतु स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सुविधाओं में वृद्धि होने पर भी इनकी उपलब्धता हमारी आवश्यकताओं की तुलना में बहुत कम है.

आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाए मानवीय संसाधनों के विकास के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के समान ही आवाज तथा कुछ अन्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था भी आवश्यक है परंतु भारत में आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार बहुत निम्न है आवास तथा स्वच्छता जलापूर्ति जैसी सेवाओं का भाव निर्धन वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करता है क्योंकि वे अपने सीमित साधनों से स्वयं की व्यवस्था करने में असमर्थ होते हैं या भारतीय श्रमिकों की कार्य क्षमता कम करने का एक प्रधान कारण है।

सेवा क्षेत्र के विकास की विवेचना कीजिए

हमारा मानवीय संसाधनों के विकास तथा सेवा क्षेत्र के विस्तार में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है 21वीं सदी को ज्ञान की सदी के रूप में देखा जा रहा है भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं एक महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने सेवाओं को लोगों की संपत्ति कहा है विगत वर्षों के अंतर्गत हमारे देश में भी संचार एवं सूचना सेवाओं के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है यह शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले सुधार तथा ज्ञान एवं कौशल के विकास का ही परिणाम है हमारे देश के लिए शिक्षा का महत्व इस कारण और बढ़ जाता है कि भारत की में युवा शक्ति का विशाल भंडार है इनकी उचित शिक्षा और प्रशिक्षण द्वारा हम सेवा क्षेत्र में भविष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं शिक्षा और प्रशिक्षण के तीन मुख्य अंतर है प्रारंभिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा प्रारंभिक शिक्षा युवा वर्ग को न्यूनतम एवं आधारभूत कौशल सिखाती है प्रारंभिक शिक्षा का हमारी उत्पादक क्रियाओं का पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है यही कारण है कि इस प्रकार की शिक्षा को हमारे देश में सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है भारत सरकार की नई शिक्षा नीति की घोषणा 1986 में हुई थी जिसे 1992 में मैं अद्यतन किया गया इस नीति के अंतर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने इसे सर्व सुलभ कराने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा बालिका शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व के अनुसार 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना राज्य का दायित्व है जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया गया है 

प्रारंभ एवं माध्यमिक शिक्षा के साथ ही हमारे देश के एक बहुत बड़े समुदाय को माध्यमिक शिक्षा देने की भी व्यवस्था है आर्थिक विकास एवं संरचनात्मक सुविधाओं को बनाए रखने के लिए हमें बहुत बड़ी मात्रा में प्रशिक्षित श्रम की आवश्यकता पड़ती है माध्यमिक शिक्षा द्वारा ही इस प्रकार की श्रम शक्ति का निर्माण होता है सरकार ने वर्ष 1986 में प्रत्येक जिले में औसतन एक नवोदय विद्यालय स्थापित करने की योजना प्रारंभ की है इसका उद्देश्य मुख्यता ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली छात्रों को अच्छे स्तर की आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है माध्यमिक शिक्षा को व्यवसाय पर बनाने के लिए कुछ चुने हुए संस्थानों में व्यवसायिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं

उच्च शिक्षा के अंतर्गत हमारे सामान्य शिक्षा के साथ ही तकनीकी शिक्षा शामिल है चिकित्सा इंजीनियरिंग पशु विज्ञान कृषि शिक्षा प्रबंधन विधि शिक्षा आदि को तकनीकी शिक्षा की संज्ञा दी जाती है भारत में उच्च शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है इसके लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश उसकी गुणवत्ता में सुधार राज्य सभा क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रमों में संशोधन शिक्षा के व्यवसायीकरण तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी के विस्तार की नीति अपनाई गई है।

· मानव पूंजी के मुख्य घटक-भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य,शिक्षा
आर्थिक मंदी का भारत के सेवा क्षेत्र पर प्रभाव

किसी भी अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियां सदस्य नहीं रहती है तथा इसमें समय-समय पर उतार चढ़ाव होते रहते हैं मंडी एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यवसाय क्रियाएं सामान्य स्तर के नीचे रहती हैं इसके परिणाम स्वरुप उत्पादन एवं आ इ की मात्रा में गिरावट आने लगती है श्रमिक और उत्पादक के अन्य साधन बेरोजगार हो जाते हैं तथा मजदूरों की दरों में कमी हो जाती है विश्व स्तर पर इस प्रकार की मंदी सर्वप्रथम 1930 में हुई या मंदी संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रारंभ हुई जिनसे विश्व के प्राय सभी देशों को प्रभावित किया व्यापार के विस्तार में अब विश्व के विभिन्न निर्देश एक दूसरे के से जुड़ गए हैं चीन से अमेरिका सबसे समृद्ध देश की आर्थिक मंदी से हराया सभी देश प्रभावित हुए थे वर्तमान मंदी का प्रभाव 2008 में अमेरिका से हुआ जिसे सेवा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ है उपभोक्ता की मांग कम हो जाने के कारण बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ भी कम हो गया है और वह श्रमिकों की छटनी कर रहे हैं इसे भारत भी प्रभावित हुआ है तथा हमारे सेवा क्षेत्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है इससे निजी क्षेत्र के उद्योग एवं व्यवसाय में स्थिरता आई है श्रमिकों की छटनी हुई है यहां के तकनीकी कर्मचारी की विदेशों में कम हो गई है परंतु अमेरिका और यूरोप के देश की अपेक्षा भारत इसे कम प्रभावित हुआ है इसका मुख्य कारण वित्तीय संस्थाओं तथा पूंजी बाजार पर सरकार का प्रभाव पूर्ण नियंत्रण है।

इंद्रा आवास योजना


1985 1986 से सरकार द्वारा इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासी हरिजन एवं भूमिहीन श्रमिकों के लिए आवास अर्थात रहने के मकान की व्यवस्था की जा रही है जिसे इंदिरा आवास योजना की संज्ञा दी गई है

सेवा क्षेत्र की महत्व बताएं
आर्थिक विकास तथा रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवाओं में परिवहन संचार विपणन वाणिज्य तथा सभी प्रकार की सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है l 

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हमारी वित्तीय संस्थाएं (अध्याय 4 )

Susmita Mishra

 

हमारी वित्तीय  संस्थाएं 

Our Financial Institutions



वित्तीय संस्थान किसे कहते हैं 

हमारे देश की वह संस्थाएं जो विकास के लिए उद्धम (Enterprise) एवं व्यवसाय के वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता है ऐसी संस्थाओं को वित्तीय संस्थाएं कहते हैं। मुख्यतः यह वित्तीय संस्थाएं राज्य संपोषित होती है एवं देश के केंद्रीय बैंक में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) कहते हैं, के दिशा निर्देश के अंतर्गत एक निश्चित मापदंड पर पर कार्य करती है l 


वित्तीय संस्थाओं से आप क्या समझते हैं इसका मुख्य कार्य क्या है 
आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं के संचालन में साख की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। आज प्राय: सभी प्रकार के उत्पादक क्रियाओं के लिए वित्तीय सा की आवश्यकता होती है। वित्तीय संस्थाओं के अंतर्गत बैंक बीमा कंपनियों सहकारी समितियों एवं महाजन साहूकारों विदेशी बैकरों को सम्मिलित किया जाता है जो साख अथवा ऋण के लेन-देन का कार्य करती है । लोग प्रायः अपनी बचत को बैंक आदि संस्थाओं में जमा अथवा निवेश करते हैं जहां वित्तीय संस्थाएं इस बचत को स्वीकार करती है और इसे ऐसे व्यक्ति को उधार देती है जिन्हें धन की आवश्यकता है इस प्रकार वित्तीय संस्थाएं ऋण लेने और देने वाले व्यक्तियों के बीच मध्यस्थ का कार्य करती है । 

सरकारी वित्तीय संस्थाएं (government Financial Institutions) 
सरकार द्वारा स्थापित एवं संपोषित वित्तीय संस्थाओं को सरकारी वित्तीय संस्थाएं कहते हैं जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ,पंजाब नेशनल बैंक ,इलाहाबाद बैंक आदि.। 

अर्ध सरकारी वित्तीय संस्थाएं (semi government Financial Institutions) 
ऐसी वित्तीय संस्थाएं जो सरकार के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देशन में उनके द्वारा स्थापित मापदंडो पर समाज के लोगों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है इसे इस अर्ध सरकारी वित्तीय संस्थाएं कहते हैं जैसे क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बिहार राज्य कॉपरेटिव बैंक इत्यादि। 

सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं (micro Financial Institutions) 
छोटे पैमाने पर गरीब जरूरतमंद लोगों को स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से कम ब्याज पर साख अथवा ऋण की व्यवस्था करने वाली संस्था को सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं कहते हैं ।

देसी बैंकर कर किसे कहते हैं 
देसी बैंकरों के अंतर्गत व्यापारी महाजन साहूकार आदि जैसे असंगठित क्षेत्र के वित्तीय संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो प्राचीन काल में भारतीय पद्धति के अनुसार कार्य करते आ रहे हैं। 

वित्तीय संस्थाएं के प्रकार kind of Financial Institutions 
वित्तीय संस्थाएं मुख्यता दो प्रकार की होती हैं राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं राज्य स्तरीय वित्तीय संस्थाएं 

राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं 
ऐसी वित्तीय संस्थाएं जो देश के लिए वित्तीय एवं साख नीतियों का निर्धारण एवं निर्देशन करती है तथा राष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय प्रबंधन के कार्यों का संपादन करती है उसे हम राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं कहते हैं । 

राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं के दो अंग हैं 
भारतीय मुद्रा बाजार (Indian money market) 
भारतीय पूंजी बाजार (Indian capital market) 

अपने देश के ऐसे मौद्रिक बाजार जहां उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र के लिए अल्पकालीन एवं मध्यकालीन वित्तीय व्यवस्था एवं प्रबंध किया जाता है उसे भारतीय मुद्रा बाजार कहते हैं 

देश कि संगठित बैंकिंग प्रणाली निम्नलिखित तीन प्रकार के बैंकिंग व्यवस्था के रूप में कार्यशील है 
केंद्रीय बैंक - भारत के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया देश की केंद्रीय बैंक है यह देश की शीर्ष बैंकिंग संस्था के रुप में बैंकिंग वित्तीय एवं आर्थिक क्रियाओं का दिशा निर्देश एवं संचालन में सहयोग देती है 
वाणिज्य बैंक - वाणिज्य बैंक के द्वारा बैंकिंग एवं वित्तीय क्रियाओं का संचालन होता है 

सहकारी बैंक (कॉपरेटिव बैंक) सहकारिता के क्षेत्र में आपसी सहयोग एवं सद्भावना के आधार पर जो वित्तीय संस्थाएं कार्यशील है उसे सहकारी बैंक कहते हैं यद्यपि यह राज्य सरकार के द्वारा संचालित होती है । 

भारतीय पूंजी बाजार 
भारतीय मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाओं में रिजर्व बैंक राष्ट्रीयकृत एवं अन्य व्यवसायिक बैंक सहकारी बैंक तथा भूमि विकास बैंक आदि प्रमुख है इसके विपरीत पूंजी बाजार की संस्थाएं उद्योग और व्यापार की दिव्य कालीन सा की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं बड़ी कंपनियां एवं व्यवसायिक संस्थानों की दीर्घकालीन पूंजी का एक बड़ा भाग अंश पत्रों के हिस्से के विक्रय से प्राप्त होता है तथा इसका क्रय विक्रय पूंजी बाजार में ही होता है 

भारतीय पूंजी बाजार मूल्य 4 वित्तीय संस्थाओं पर आधारित है इसके चलते राष्ट्रस्तरीय सार्वजनिक विकास जैसे सड़क, रेलवे ,अस्पताल, शिक्षण संस्थान, विद्युत उत्पादन संयंत्र एवम बड़े बड़े निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग संचालित किए जाते हैं फल स्वरुप राष्ट्र के निर्माण में वित्तीय संस्थानों का काफी योगदान होता है। 

वित्तीय संस्थाएं किसी भी देश का मेरुदंड माना जाता है 

बिहार के वित्तीय संस्थाओं को कितने भागों में बांटा जा सकता है 
बिहार को वित्तीय संस्थाओं को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है - संगठित क्षेत्र की संस्थागत वित्तीय संस्थाएं एवं असंगठित क्षेत्र की गैर संस्थागत संस्था। संस्थागत वित्तीय संस्थाएं वह हैं जिन पर रिजर्व बैंक अथवा सरकार का नियंत्रण रहता है। इसके विपरीत गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाओं में महाजन, भूस्वामी, व्यापारी आदि शामिल है , जो साख के परंपरागत स्रोत हैं इन संस्थाओं पर सरकार का कोई प्रभाव पूर्ण नियंत्रण नहीं होता राज्य में कार्यरत वित्त एवं संस्थागत साधनों के तीन मुख्य प्रकार हैं बैंकिंग संस्थाएं राज्य के वित्तीय संस्थाएं एवं राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं बैंकिंग संस्थाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्थाओं के क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक को सम्मिलित किया जाता है ।

गैर संस्थागत वित्तीय संस्थाएं
इस प्रकार के वित्तीय संस्थाओं पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता है गैर संस्थागत वित्तीय संस्था के अंतर्गत महाजन भूस्वामी व्यापारी आदि शामिल हैं जो ग्रामीण उत्पाद एवं उपयोग संबंधित सभी कार्य के लिए ऋण उपलब्ध कराते हैं ऋण देने का आधार व्यक्ति की अमानत स्वरूप उनके जमीन जय भारत जय भारत एवं अन्य कीमती सामानों को गिरवी रखते हैं यदि समय पर ऋण का भुगतान नहीं किया जाता है तो अमानत स्वरूप रखे गए सामान गला दिए जाते हैं अथवा बेज दिए जाते हैं। 

संस्थागत वित्तीय स्रोत (source of institutional Finance)
संस्थागत वित्तीय स्रोत के निम्नलिखित रुप हैं
सहकारी बैंक (co-operative Bank) -
भारत की वित्तीय संस्थाओं में सरकारी संस्थाओं का विशेष महत्व है व्यवसायिक बैंक पर आया कृषि ऋणों पर विस्तार करने में विशेष रुचि नहीं लेते हैं। अतः सहकारी बैंक को कृषि ऋण का आदर्श स्रोत माना जाता है, वर्तमान में देश के ग्रामीण साख का एक चौथाई से अधिक सहकारी साख समितियां प्रदान करती हैं, परंतु बिहार के सहकारी समितियों के पास साधनों का अभाव है और इसकी स्थिति अत्यंत असंतोषजनक है हमारे राज्य के कृषि ऋण में सहकारी बैंक हिस्सेदारी 10% है सहकारी बैंक सीमित पहुंच का प्रमुख कारण यह है कि बिहार के 16 जिलों में इन बैंकों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। 

हमारे राज्य में सहकारी बैंक द्वारा उपलब्ध सहकारी साख व्यवस्था त्रि स्तरीय हैं।
  • गांव में प्राथमिक सहकारी साख समितियां 
  • राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक 
  • जिला स्तर पर केंद्रीय सहकारी बैंक

प्राथमिक सहकारी समिति
इस प्रकार के समिति का गठन अल्पकालीन ऋण की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है एक गांव सभा क्षेत्र के कोई भी कम से कम 10 व्यक्ति मिलकर एक प्राथमिक साख समिति का निर्माण कर सकता है सामान्यतया उत्पादन कार्यों के लिए अल्पकालीन 1 वर्ष के लिए ऋण देती है परंतु विशेष परिस्थिति में इनकी अवधि 3 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है l 

राज्य के 10 वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारंभिक प्रारूप के अनुसार बिहार में 6842 प्राथमिक सहकारी कृषि साख समितियों कार्यरत है l 

भूमि विकास बैंक
राज्य में किसानों को दीर्घकालीन ऋण प्रदान करने के लिए भूमि बंधक बैंक खोला गया था जिसे अब भूमि विकास बैंक कहा जाता है यह किसान के भूमि को बंधक रखकर कृषि में अस्थाई सुधार एवं विकास के लिए ब्रिटिश कालीन ऋण प्रदान करता है (इसकी अवधि 15 से 20 वर्ष तक की होती हैं)
राज्य स्तर पर बिहार राज्य भूमि विकास बैंक कार्यरत है जिसे राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक कहा जाता है।

व्यावसायिक बैंक से आप क्या समझते हैं
बैंक व संस्था है जो मुद्रा तथा साख का व्यापार करती है साधारणता बैंक से हमारा अभिप्राय व्यवसायिक बैंक से ही होता है किसी भी देश के उद्योग तथा व्यापार के विकास मैं इन बैंकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है व्यवसाय अथवा व्यापारिक बैंक लाभ कमाने वाली संस्था है इसका मुख्य कार्य जनता की बचत को जमा के रूप में स्वीकार करना व्यापारियों को अल्पकालीन ऋण देना तथा सा का निर्माण करना है भारतीय बैंक कंपनी अधिनियम के अनुसार बैंक किया बैंकिंग कंपनी वह कंपनी है जो उधार देने के लिए या विनियोग करने के लिए जनता के जमा के रूप में मुद्रा स्वीकार करती है और जो मांगने पर चेक ड्रॉप आर्डर तथा अन्य प्रकार से इसका भुगतान करती है 

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
केंद्र सरकार द्वारा 1975 में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों को साफ प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना की गई बिहार के 5 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं और उनमें प्रत्येक बैंक राज्य के एक विशेष क्षेत्र में सेवा प्रदान करता है यह बैंक है मध्य बिहार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक पंजाब नेशनल बैंक द्वारा प्रायोजित समस्तीपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक( भारतीय स्टेट बैंक द्वारा प्रायोजित) उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक और कोसी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा प्रायोजित) तथा बिहार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (यूनाइटेड कमर्शियल बैंक द्वारा प्रायोजित ) वर्ष 2००6-07 में इसकी 1465 शाखाएं थी जिन में लगभग 88% ग्रामीण क्षेत्र में अवस्थित है। 

नाबार्ड NABARD
NABARD National bank for Agriculture and Rural Development

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक देश में कृषि तथा ग्रामीण विकास के लिए पुनर्वित्त प्रदान करने वाले शिखर की संस्था है यह कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए सरकारी संस्थाओं व्यवसायिक बैंको तथा ग्रामीण बैंकों को वित्त की सुविधा प्रदान करता है जो पुनः किसानों को यह सुविधा प्रदान करते हैं। 

व्यवसायिक बैंकों के कार्य
1.जमा राशि को स्वीकार करना
2.ऋण प्रदान करना
3.सामान्य उपयोगिता संबंधी कार्य तथा
४.एजेंसी संबंधी कार्य 

व्यवसायिक बैंक चार प्रकार से जमा राशि स्वीकार करते है

स्थाई जमा- स्थाई जमा खाते में रुपया एक निश्चित अवधि जैसे 1 वर्ष या इससे अधिक के लिए जमा किया जाता है इस निश्चित अवधि के अंतर्गत यह रकम नहीं निकाली जा सकती। 

चालू जमा- चालू जमा खाते में रुपया जमा करने वाला अपनी इच्छा अनुसार रुपया जमा करता है अथवा निकाल सकता है इसमें किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है। 

संचई जमा - इस प्रकार के खाते में रुपया जमा करने वाला जब चाहे रुपया जमा कर सकता है किंतु रुपया निकालने का अधिकार सीमित रहता है वह भी एक निश्चित रकम से अधिक 

आवर्ती जमा – इस इस प्रकार के खाते में व्यवसायिक बैंक साधारणतया अपने ग्राहकों से प्रतिमाह एक निश्चित रकम जमा के रूप में एक निश्चित अवधि जैसे साठ या 72 माह के लिए ग्रहण करता है इसके बाद एक निश्चित रकम भी देता है 

2. ऋण प्रदान करना
व्यावसायिक बैंक का दूसरा मुख्य कार्य लोगों को ऋण प्रदान करना है बैंक के पास जो रुपए जमा के रूप में आता है उसमें से एक निश्चित राशि नगद कोष में रखकर बाकी रूपया बैंक द्वारा दूसरे व्यक्ति को उधार दे दिया जाता है यह बैंक प्राय: उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देते हैं तथा उचित जमानत की मांग करते है।

व्यवसायिक बैंकों द्वारा दिया जाने वाला ऋण के प्रकार
अभियाचित एवं अल्पकालिक ऋण
नगद साख
अधि विकर्ष
(जब कभी भी कोई व्यवसायिक बैंक अपने ग्राहकों को उसके खाते में जमा रकम से अधिक रकम निकालने की सुविधा देता है तो उसे अधिविकर्ष की सुविधा कहते हैं)
विनिमय बिलों को भूनना
ऋण एवं अग्रिम(जब ऋण एक पूर्व निश्चित अवधि के लिए लिया जाता है तो उसे अग्रीम अथवा अग्रिम कहते हैं)

3. सामान्य उपयोगिता संबंधी कार्य
A. यात्री चेक एवं साख प्रमाण पत्र जारी करना
B. लॉकर की सुविधा
C. ATM एवं क्रेडिट कार्ड सुविधा
D. व्यापारिक सूचनाएं तथा आंकड़े एकत्रीकरण
4. एजेंसी संबंधी कार्य
वर्तमान समय में व्यावसायिक बैंक ग्राहकों की एजेंसी के रूप में सेवा करते हैं । इसके अंतर्गत बैंक चेक बिल व ड्राफ्ट का संकलन , ब्याज तथा लाभांश का संकलन तथा वितरण ब्याज ऋण की किस्त बीमा की किस्त भुगतान, प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय तथा प्राप्त तथा डाक द्वारा उसका स्थानांतरण आदि क्रियाएं करती है 

सहकारिता
सहकारिता का अर्थ है एक साथ मिलजुल कर कार्य करना लेकिन अर्थशास्त्र में इस शब्द का प्रयोग अधिक व्यापक अर्थ से किया जाता है सहकारिता व संगठन है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति स्वेच्छा पूर्वक मिल-जुलकर समान स्तर पर आर्थिक हितों की वृद्धि करते हैं। 

सहकारिता का अर्थ- मिलकर कार्य करना है l सहकारिता 116 संगठन है, जो सामान्य आर्थिक एवं सामाजिक हितों की वृद्धि के लिए समानता के अधिकार पर अवस्था स्थापित किया जाता है l इस प्रकार का संगठन सामूहिक हित के लिए कार्य करता है , सरकारी संगठनों के तीन मुख्य तत्व विशेषताएं हैं यह एक ऐसा संगठन है, इसकी स्थापना सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती है तथा इसका संगठन एवं प्रबंध प्रजातांत्रिक सिद्धांत के आधार पर होता है l (इसका सिद्धांत सब प्रत्येक के लिए और प्रत्येक सबके लिए है) 

भारत में सहकारिता के विकास का संक्षिप्त परिचय दीजिए (दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
भारत में सहकारिता का प्रारंभ 1996 सहकारी साख समिति अधिनियम पारित होने के साथ हुआ किस अधिनियम के अनुसार गांव आया नगर में कोई भी 10 व्यक्ति मिलकर सहकारी साख समिति की स्थापना कर सकते थे लेकिन इस अधिनियम का मुख्य दोष यात्रा किस में गैर स्थाई समितियां की स्थापना के लिए कोई प्रावधान नहीं थाl अत: 1912 में यह दूसरा अधिनियम पारित कर देश में गैर साख समितियों के गठन की अनुमति प्रदान की गई सहकारिता के प्रगति के मूल्यांकन इस संबंध में आवश्यक सुझाव देने हेतु सरकार ने 1915 में मगन समिति की नियुक्ति किस समिति ने सरकारी समिति को और अधिक सुंदर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए l 1919 में सहकारिता को प्रांतीय विषय बना दिया गया l 1929,1930 की मंदी का सहकारिता के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा कृषि पदार्थों के मूल्य में कमी आ जाने से किसानों की स्तिथि बिगड़ गई और उन्होंने इस आंदोलन से अपना हाथ खींच लिया l 1937 में रिजर्व बैंक के अधीन खोले गए कृषि विभाग में सहकारिता के विकास को बहुत मिला है l
                                                                                                                                    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के वर्षों में सहकारिता के प्रसार पर इसके सशक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किए गए हैं l  योजना आयोग जो की अब निति आयोग में परावर्तित हो गया है, का उद्देश्य गांव की प्रगति तथा ग्रामीण समाज का पुनर्गठन करने के साथ कुटीर तथा लघु उद्योग का विकास करना भी है, इन प्रयास के फलस्वरुप विगत 40 वर्ष में सहकारिता की काफी प्रगति हुई है। 

सहकारिता के मूल तत्व क्या है
सहकारिता के मूल तत्व अग्रलिखित है १.सहकारिता एवं शैक्षिक संगठन है ‌२. इसमें सभी सदस्य को समान अधिकार प्राप्त होते हैं ३. इसकी स्थापना समान आर्थिक हितों की प्राप्ति के लिए होती है तथा ४.इसका प्रबंधन प्रजातांत्रिक सिद्धांत के आधार पर होता है । 

बिहार राज्य के विकास में भूमिका
बिहार एक पिछड़ा राज्य है तथा वंचित सुविधाओं के कारण सहकारिता का विशेष महत्व है बिहार एक ग्राम प्रधान राज्य है l  यहां लगभग 90% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है इसका एक बड़ा भाग निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बसर करता है हमारे राज्य में विकास में सहकारिता की भूमिका कई प्रकार से महत्वपूर्ण हो सकती है वर्तमान में सहकारी संस्थाएं कृषि ऋण की आवश्यकताओं का एक बहुत छोटा अंश पूरा करती है परिणामित्र महाजनों आदि पर किसानों की निर्भरता बहुत अधिक है बिहार में कुटीर एवं लघु उद्योग में भी सहकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण है विगत वर्षों में बिहार राज्य सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ दूध उद्योग में सफल साबित हुआ है इससे ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर का बहुत विस्तार हुआ है बिहार सब्जी फल तथा मसालों के उत्पादन में देश का एक अग्रणी राज्य है तथा सहकारिता द्वारा इन क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास की काफी संभावनाएं हैं। 

स्वयं सहायता समूह

विगत कुछ बरसो के अंतर्गत गरीब परिवार को करंजिया उधार देने के कुछ नए तरीके अपनाए गए हैं इनमें एक तरीका ग्रामीण क्षेत्र के गरीब व्यक्तियों को छोटे-छोटे स्वयं सहायता समूह में संगठित करना और उनकी बजट पूंजी को एकत्रित करने पर आधारित है एक विशेष सहायता समूह में एक दूसरे के पड़ोसी लगभग 15 से 20 सदस्य होते हैं । सदस्य के यह सदस्य नियमित रूप से बचत करते हैं और इस वजह से ही इसकी पूंजी का निर्माण होता है सदस्य अपने ऋण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए छोटे मोटे कार्य स्वयं सहायता समूह से भी ले सकते हैं। यदि यह समूह नियमित रूप से बचत करता है तो एक 2 वर्ष बाद वह किसी बैंक से ऋण लेने के योग्य हो जाता है बैंक समूह के नाम पर ऋण देता है तथा इसका उद्देश्य स्व रोजगार के अवसरों का सृजन करना होता है l

सुक्ष्म वित्त योजना क्या है
अनेक विकासशील देश या अनुभव कर रहे हैं कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे पारंपरिक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम से निर्धनता की समस्या का समाधान संभव नहीं है इसका प्रमुख कारण यह है कि इस प्रकार की निर्धनता मुख्यता किन देशों के कमजोर ग्रामीण अधोसंरचना के कारण उत्पन्न होती है इस दृष्टि से सूक्ष्म वित्तीय निर्धनता निवारण का एक सक्षम विकल्प है सुक्ष्म वित्त। कार्यक्रम द्वारा स्वयं सहायता समूह को व्यवसायिक बैंक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सरकारी बैंकों से संलग्न करके अर्थात जोड़ने का प्रयास किया जाता है इस प्रकार की योजना में निर्धन परिवार को स्वयं सहायता समूह के माध्यम से बैंक अथवा संस्थागत स्रोतों से ताकतवर इन सुविधा उपलब्ध हो जाती है। 

किसानों को वित्त या साख की आवश्यकता क्यों होती है

भारत में किसानों को अल्पकालीन मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन तीन प्रकार के साख की आवश्यकता होती है अल्पकालीन साख की आवश्यकता पर आया 6 से 12 महीने तक होती है इसलिए इसे मौसमी साख भी कहते हैं इसकी मांग खाद एवं बीज खरीदने मजदूरी चुकाने तथा ब्याज आदि का भुगतान करने के लिए की जाती है प्राय: फसल कटने के बाद इंसान इन्हें लौटा वापस लौटा देता है मध्यकालीन सा कृषि यंत्र हल बैल गाडी खरीदने के लिए ली जाती है इसकी अवधि 1 वर्ष से 5 वर्ष तक की होती है दीर्घकालीन साख का अभिप्राय 5 वर्ष से अधिक की होती है किसानों की सिंचाई की व्यवस्था करने भूमि को समतल बनाने तथा में कृषि यंत्र खरीदने के लिए इस प्रकार स्क्रीन की आवश्यकता होती है यह कृषि क्षेत्र में स्थाई सुधार के लिए होते हैं। 

Keynotes

वित्तीय संस्थाओं में बैंक आदि ऐसी सभी संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो साख अथवा ऋण की लेनदेन का कार्य करती हैं।

यह संस्थाएं ऋण देने तथा ऋण लेने वाले व्यक्तियों के बीच मध्यस्थ का कार्य करती है

हमारे देश की वित्तीय संस्थाओं को प्राय: दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है मुद्रा बाजार की संस्थाएं तथा पूंजी बाजार की संस्थाएं।

मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाएं अल्पकालीन साख का लेनदेन करती है

पूंजी बाजार की संस्थाएं उद्योग एवं व्यापार की दीर्घकालीन साख की आवश्यकताओं को पूरा करती है

मुद्रा बाजार की वित्तीय संस्थाओं में बैंकिंग संस्थाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है

भारतीय बैंकिंग प्रणाली के शीर्ष पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया है जो भारत का केंद्रीय बैंक है

कृषि साख की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले वित्तीय संस्थाओं में सरकारी संस्थाएं महत्वपूर्ण है

कृषि तथा ग्रामीण साख की पूर्ति के लिए सरकार ने 1982 में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की है

यह बैंक कृषि तथा ग्रामीण साख की आपूर्ति के लिए देश की शीर्ष संस्था है

मुद्रा बाजार के असंगठित क्षेत्र में महाजन साहूकार आदि देसी बैंकर कर महत्वपूर्ण है

पूंजी बाजार वह हैं जिनमें व्यवसायिक संस्थानों के हिस्से और ऋण पत्रों का क्रय-विक्रय होता है

पूंजी बाजार के दो प्रमुख अंग होते हैं प्राथमिक बाजार और द्वितीयक बाजार

द्वितीयक बाजार को सटीक एक्सचेंज अथवा शेयर बाजार कहते हैं

मुंबई देश की वित्तीय गतिविधियों का केंद्र है तथा शहर भारत की वित्तीय राजधानी के नाम से विख्यात है

बिहार में पांच क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं जिनमें प्रत्येक राज्य की एक विशेष क्षेत्र में सेवा प्रदान करता है

व्यवसायिक बैंको का मुख्य कार्य लोगों की बचत को जमा करना तथा उद्योग एवं व्यवसाय के लिए ऋण प्रदान करना है

सहकारिता एक एच्छिक संगठन है जिसे सामान्य आर्थिक एवं सामाजिक हितों की वृधि के लिए स्थापित किया जाता है

भारत में सहकारिता का प्रारंभ 1950 में सहकारी साख समिति अधिनियम पारित होने के साथ हुआ

स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्र के निर्धन व्यक्तियों को संगठित कर उसकी बचत पूंजी को एकत्रित करने पर आधारित है

सूक्ष्म वित्त योजना के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से निर्धन परिवारों को बैंक आदि संस्थागत स्रोतों से ऋण सुविधा प्रदान की जाती है

समाप्त 
Special thanks to Rahul ranjan