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लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी अध्याय 1 (ख ) वर्ग 10 के लिए (धर्म और सांप्रदायिकता की परिभाषा और विश्लेषण )

i'msonuamit

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

अध्याय 1 (ख )
खंड (क) के लिए क्लीक करे link01

धर्म और सांप्रदायिकता
यह मानना कि धर्म ही समुदाय या समुदाय का गठन करता है, तो यहीं से संप्रदाय को राजनीति से जोड़कर उसे सांप्रदायिकता की संज्ञा दी जाने लगती हैं। लेकिन वास्तविक रूप से संप्रदाय और धर्म का एक भाग है l  जैसे वैदिक धर्म अर्थात तथाकथित हिंदू धर्म में 3 संप्रदाय वैष्णव शैव तथा शाक्त संप्रदाय हैं तो इस्लाम में शिया और सुननी, बौद्ध धर्म मैं हीनयान और महायान ईसाइयों में कैथोलिक तथा प्रोस्टेट आदि। 
                                                धर्मों के अंदर इसी अंतर पर परस्पर के संघर्ष को संप्रदायिकता कहते हैं लेकिन राजनीतिज्ञों की भाषा में दो धर्मों के बीच टकराव को सांप्रदायिकता का नाम दिया जाता है l  यह अवधारणा अत्यंत गलत है जो देश में अस्थिरता पैदा करती है इसे रोकने का प्रयास होना चाहिए।

वास्तव में सांप्रदायिकता राजनीतिक दलों की स्वार्थ परक तथा अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्म को ही नहीं समझने की भावना का विकास करती है इसका घृणित परिणाम सांप्रदायिक हिंसा है । भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है यह सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है। 

सांप्रदायिकता का सही अर्थ है अपने धर्म को अन्य धर्मों से ऊंचा मानना। अपने धार्मिक हितों के लिए अपने राजनीतिक हितों के लिए राष्ट्रीय हित का बलिदान कर देना भी संप्रदायिकता है संप्रदायिकता धर्म के नाम पर गिरना फैलाती है यह विष के समान है जो मानव को मानव से घृणा करना सिखाता है इस संकुचित मनोवृति के कारण एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म के अनुयायियों अथवा एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं इस प्रकार संप्रदायवाद एक संकीर्ण विचारधारा है जो एक विशेष समुदाय का अन्य समुदाय के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने का निर्देश देती है। 

राजनीति में धर्म एक समस्या के रूप में खड़ी हो जाती है जब 
1. धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है 
2. राजनीतिक में धर्म धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय विशेष के विशिष्टता के लिए की जाती है 
3. राजनीति किसी धर्म विशेष के दावे का पक्ष पोषण करने लगती हैं 
4. किसी धर्म विशेष के अनुयाई दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। 
हम यह भी कह सकते हैं की राजनीतिक में धर्म को इस्तेमाल करना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। 

भारत में धर्मनिरपेक्ष शासन की अवधारणा 
सांप्रदायिकता भारत की आधारभूत चुनौतियों में से एक है किंतु हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को स्थान देकर इसे सिरे से नकारना कर दिया है संवैधानिक उपबंध ों में से निम्नलिखित महत्वपूर्ण है 
राष्ट्र  में किसी भी धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया है भारत किसी भी धर्म को विशेष धर्म का दर्जा नहीं देता है। 
                                            संविधान भारत के हर नागरिक को यह छूट देता है कि वह किसी भी धर्म को अपने विश्वास के आधार पर स्वीकार या अंगीकार कर सकता है धर्म के आधार पर किसी को भी उसके कोई अधिकार या अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता कोई भी स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म का पालन शांतिपूर्ण ढंग से प्रचार प्रसार कर सकता है तथा इस उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों को स्थापित कर संचालित कर सकता है। 

लैंगिक विभाजन और राजनीति 
जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी जानेवाली असमान प्राथमिकताओं से है। 

पुरुष और स्त्री के जैविक घर बनावट में लैंगिक विभिन्नता आती है इसका सही तात्पर्य पुरुष और स्त्री में अंतर है यद्यपि भारत में स्थानीय निकायों में स्त्रियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू हो चुकी है किंतु विधायक या सांसद में अपनी सदस्यता की मांग के लिए महिलाओं के संगठन प्रयासरत है और पुरुष प्रधान भारतीय समाज इसे मानने के लिए तैयार नहीं दिखता यद्यपि घर के कामों से लेकर कृषि कार्य तक में महिलाओं की भागीदारी कोई गम नहीं यह अब हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं यहां तक कि अब यह सेना में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। 

भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति 
भारत के लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 859 तो जरूर हो गई है किंतु यह अभी भी 11% से कम है विकसित राष्ट्रों की भी विधायिकाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अपर्याप्त है ब्रिटेन में 19.3 प्रतिशत अमेरिका में 16.3% इटली में 16.1% आयरलैंड में 16.2% तथा फ्रांस में 13.9 प्रतिशत है भारत में अधिकांश महिला सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है या कुछ मामलों में आपराधिक भी इस बात को प्रमाणित करती है कि सामान्य महिलाओं के लिए अभी भी विधायिका की दहलीज दूर है। 

विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा 
सांप्रदायिकता किसी भी धर्म समुदाय को वह अधिकार देती है जिससे वह अपने आप को प्रमुख राजनीतिक में बनाए रखना चाहते हैं कभी-कभी बहुसंख्यक धर्माराम भी धर्मावलंबी एक जुट होकर अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने हेतु अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को मटियामेट कर देने वाली नीतियां बना देते हैं या बनवा देते हैं श्रीलंका में सिंधियों के बहुसंख्यक धर्मवाद ने बहुसंख्यकवाद का रूप लेकर सिंहली भाषा को एकमात्र राज्य भाषा घोषित करवा डालना शिक्षा और नौकरी में सीनियर को प्राथमिकता दिलवा देना बहुत ही धर्म के संरक्षण हेतु कदम उठाना निश्चय ही अल्पसंख्यक को स्वतंत्रता घाट पहुंचाने वाला कदम था 

सांप्रदायिकता राजनीति गोलबंदी को पैदा करती है इसके लिए संप्रदाय के गुरुओं मुल्लाओं द्वारा पवित्र प्रतीकों का अनुचित उपयोग धर्म गुरुओं द्वारा भावनात्मक अपील आदि सांप्रदायिकता के अन्य रूप हैं कभी जामा मस्जिद के मौलाना बुखारी द्वारा किसी विशेष राजनीतिक दल संप्रदाय के लोगों को वोट के लिए अपील उनका एक बेहतर उदाहरण है 
                                                           संप्रदायिकता अपने भयानक रूप में तब राजनीतिक में उभरती है जब वह हिंसा दंगा और नरसंघार को जन्म देती है भारत में अपने विभाजन को भी एक सांप्रदायिकता के आधार पर एक कलंक पूर्ण विभाजन माना है। आजादी के बाद भी कई जगह दंगे हुए गुजरात का गोधरा कांड दिल्ली का सिख दंगा इसके ज्वलंत उदाहरण है। 
भारत में किस तरह जातिगत असमानताएं जारी है 
भारत के श्रम विभाजन के आधार पर जातिगत असमानताएं जारी है जैसा कि कुछ अन्य देशों में भी है भारत की तरह दूसरे देशों में भी पेशा के आधार पर लगभग वंशानुगत ही हैं पैसा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वता चला जाता है इसी पर आधारित सामुदायिक व्यवस्था ही जाति का रुप ले लेती है या व्यवस्था जब अस्थाई हो जाती है तब वह श्रम विभाजन का अतिवादी रूप कल आने लगती है वास्तव में ऐसे ही हम जाति के नाम से जाने लगते हैं खासकर शादी विवाह और अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट रूप से बिक जाता है इस प्रकार भारत में सदियों से जातिगत असमानताएं जारी है। 

अल्पसंख्यक कौन है 
चाय भाषा के आधार पर ही हो या संस्कृति के अल्पसंख्यक शब्द को भारतीय संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है देश की कुल जनसंख्या के आधे से भी कम जनसंख्या वाले समुदाय को अल्पसंख्यक कहते हैं इस संदर्भ में 1991 की जनगणना के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय भारत की कुल जनसंख्या का 17.0% है राज्य सरकार अल्पसंख्यकों की इस तरह राज्य स्तर पर क्षेत्रीय या स्थानीय अल्पसंख्यकों की बात भी उठाती है इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की अवधारणा राज्य स्तरीय अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है इसका अर्थ यह है कि यदि कोई समुदाय या वर्ग किसी अन्य विशेष में कुल मिलाकर बहुमत में हो तो वह भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक हो सकते हैं तथा इसके विपरीत स्थिति भी हो सकती है। 

भारत की राजनीतिक पर लैंगिक धार्मिक संप्रदाय तथा जातीय विभेद के प्रभावों का वर्णन करें 
लैंगिक विभेद का अर्थ है समाज का लिंग महिला तथा पुरुष के आधार पर बंटवारा समाज में लगभग 48% स्त्रियां हैं प्रारंभ में उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त थे परंतु धीरे-धीरे उनकी दशा खराब होती चली गई लैंगिक विभेद के कारण आज विश्व भर में राजनीति में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कम है अमेरिका में 20.2% यूरोप में 96.6 तथा एशिया के देशों का औसत मात्र 11.7 प्रतिशत है भारत में लोकसभा में सिर्फ 11% राज्यसभा में 9 पॉइंट 3% महिलाएं हैं भारत के राज्य विधानमंडलों में तो यह 4% ही हैं भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में संसद और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा किया है परंतु यह विधेयक अभी संसद में लंबित है l 
                                        धार्मिक एवं सांप्रदायिक प्रभाव आधुनिक युग में धर्म और राजनीति का गहरा संबंध है धर्म के आड़ में राजनीति का घिनौना खेल खेला जा रहा है कुछ राजनीतिक दलों का गठन भी किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है धार्मिक आवंटन नहीं संप्रदायवाद का रूप ले लिया है सांप्रदायिकता के कारण ही भारत का विभाजन हुआ था। 

जातीय विभेद का प्रभाव राजनीतिक में जाति का प्रभाव निम्नलिखित रुप से देखने को मिलता . 
1. राजनीतिक दल अपने अपने जाति आधारित बोर्ड बैंकों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का चयन करते हैं। 
2. सरकार बनाते समय भी सत्तारूढ़ दल अपने प्रांतीय राष्ट्र के जाति आधारित प्रतिनिधित्व का पूरा ख्याल रखते हैं 
3. राजनीतिक में जाति का प्रभाव के कारण ही पिछड़ी जाति के लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ती जा रही है या उनका मानना है कि बिना सत्ता हासिल किए हुए उनका कल्याण संभव नहीं है। 
4. राजनीतिक दल भी चुनावों के समय जाति आधारित भावनाओं को उकसाने का प्रयास करते हैं। 
भ्रूण हत्या से आप क्या समझते हैं? 
वर्तमान में अत्याधुनिक उपकरणों से गर्भ में ही शिशु के लिंग की जानकारी प्राप्त कर ली जाती है और पुत्री के जन्म होने की जानकारी होने पर गर्भ में ही उसकी हत्या कर दी जाती है इसे ही भ्रूण हत्या करते हैं। 

महिलाओं के सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं? 
महिलाएं आज राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी पिछड़ी हुई है नारियों के विकास के बिना समाज के विकास की बात करना असंभव है अतः महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागृत होना महिला सशक्तिकरण है। 

नोट:- सभी विद्यार्थियों से आग्रह है की इस क्लास नोट्स को अत्यंत ध्यानपूर्वक पढ़े। बहुत संभव है कि शब्दों में त्रुटी हो, हालाकि नोट्स को लिखते वक़्त हर संभव त्रुटि रहित रखने का प्रयास किया गया है। धन्यवाद्
 

अध्याय- 07 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Susmita Mishra

 


अध्याय- 07

उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण




व्यक्ति जब कोई वस्तु या सेवा अपने उपभोग या उपयोग के लिए खरीदता है, तो वह, उपभोक्ता कहलाते हैं उपभोक्ता बाजार व्यवस्था का प्रमुख अंग होता है ।
हमारे बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता का स्थान सर्वोपरि है, यदि उपभोक्ता ना रहे तो उत्पादित वस्तुओं को मांगने वाला ही नहीं होगा। उत्पादन के समस्त क्रिया उपभोक्ता के द्वारा ही संचालित होती हैं, क्योंकि उत्पादक के रूप में हम पहले वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं, और फिर हम अपनी आवश्यकता अनुसार उसी वस्तु और सेवाओं से अपनी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं । बाजार व्यवस्था में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही होते हैं और दोनों का अलग अलग महत्व होता है l  वर्तमान युग में उपभोक्ताओं में वस्तु के मूल्य निर्माण एवं गुणवत्ता के प्रति जागरूक बनाया जाता है, उसे उपभोक्ता जागरण के रूप से जानते हैं l
1. उपभोक्ता जागरण 
मनुष्य को अपना जीवन जीने के लिए ढेर सारी वस्तु और सेवा की आवश्यकता होती है। और उन् आवश्यकता पूर्ति के लिए भिन्न भिन्न वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करता है, इस प्रकार हम यह भी कह सकते हैं कि मानव किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है और एक उपभोक्ता प्रतिदिन विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के संपर्क में आता है लेकिन कई बार, कई स्तर पर उनका शोषण हो जाता है जिसका प्रमुख कारण उपभोक्ता को अपने अधिकार का ज्ञान नहीं होना और जागरूकता का अभाव। उपभोक्ता का अधिकार है कि वह जिस वस्तु या सेवा का उपभोग कर रहा है उसका गुण मात्रा वस्तु बनाने में प्रयुक्त तत्व इससे होने वाले प्रभाव तथा सही मूल्य तथा वजन या मात्रा की जांच , आदि का पूर्ण जानकारी प्राप्त करें। 
आज भूमंडलीकरण के इस दौर में उपभोक्ता जहां एक राष्ट्र से नहीं वरन दूसरे देशों के बने वस्तुओं तथा सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं तो उनको जागरूक होना परम आवश्यक है। 
अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होने के कारण उपभोक्ता प्राय: शोषण के शिकार हो जाते हैं उनके हितों की रक्षा के लिए उन्हें जागरुक बनाना आवश्यक है,। उपभोक्ता जागरण हेतु विभिन्न नारे “जागो ग्राहक जागो” उपभोक्ता जागरण का सर्वाधिक प्रचलित नारा है इसके अतिरिक्त कुछ अन्य ना रहे हैं “एक सजग उपभोक्ता सुरक्षित उपभोक्ता” “अपने अधिकारों को जानो ग्राहकों सावधान रहो” “उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करो” “अपने अधिकारों को पहचानो सदर उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है”. 
2. उपभोक्ता शोषण 
उपभोक्ता शोषण का अभिप्राय उत्पादक अथवा विक्रेता द्वारा उपभोक्ताओं को बेची गई वस्तुओं की गुणवत्ता मात्रा शुद्धता एवं मूल्य आदि से संबंधित अनुचित व्यापार व्यवहार है। 
हमारे उपभोक्ता का एक नहीं कई प्रकार से शोषण किया जाता है।कभी माल् या सेवा की घटिया किस्म के कारण तो कभी कम नापतोल के कारण कभी नकली वस्तुएं उपलब्ध होने के कारण कभी वस्तुओं की कालाबाजारी या जमाखोरी के कारण तो कभी स्तरहीन विज्ञापनों के कारण उपभोक्ता के हितों की अनदेखी की जा रही है । 
आजकल उत्पादकों के साथ प्रलोभन देना एक प्रमुख समस्या बनी हुई जैसे एक वस्तु खरीदने पर एक वस्तु मुक्त पुरानी वस्तुओं के बदले नयी बस्तू , नहाने के साबुन में सोने का लॉकेट मिलेगा, चाय की पैकिंग में डायमंड मिलेगा, अन्य वस्तुओं के साथ स्कूटर फ्रीज TV मोबाइल आदि लाखों का इनाम का लालच। 
उपभोक्ता शोषण के प्रमुख कारक 
*मिलावट की समस्या महंगी वस्तुओं में अन्य चीजें मिलावट करके उपभोक्ताओं का शोषण होता है l
*कम तौलने द्वारा वस्तुओं के माप में हेरा फेरा करके भी उपभोक्ता का शोषण होता है l
*कम गुणवत्ता वाली वस्तु उपभोक्ता को धोखे से अच्छी वस्तुओं के स्थान पर कम गुणवत्ता वाली वस्तु देकर शोषण करना । 
*ऊंची कीमत द्वारा ऊंची कीमत वसूल करके भी उपभोक्ता का शोषण किया जाता है l
*डुप्लीकेट वस्तुएं सही कंपनी का डुप्लीकेट वस्तुएं प्रदान करके उपभोक्ता का शोषण होता है। 
भारत में उपभोक्ताओं की शोषण की समस्या बहुत गंभीर है। क्यों? 
भारत में उपभोक्ताओं के शोषण की समस्या बहुत गंभीर है, हमारे देश के अधिकांश उपभोक्ता अशिक्षित है तथा इसकी आज का अस्तर बहुत नियम है इसके फलस्वरुप हुए अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होते। देश के आवश्यक उपभोक्ता पदार्थों का अभाव होने के कारण उंहें अनेक वस्तुओं और सेवाओं को अधिक मूल्य का पर खरीदना पड़ता है अथवा उनके उपयोग से वंचित रह जाना पड़ता है। भारत उपभोक्ता संघ का प्रभाव है उपभोक्ता एवं व्यापारी इसका अनुचित लाभ उठाकर उपभोक्ताओं का कई प्रकार से शोषण करते हैं भारत जैसे विकासशील देशों में कानूनी प्रक्रिया बहुत जटिल और खर्चीली है इसके फलस्वरुप भी इन देशों में उपभोक्ता का शोषण होता है। 

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian standards Institutions, BIs) :
• इसे जिसे पहले भारतीय मानक संस्थान ( indian Standards Institutions, Ist) के नाम से जाना जाता था। इसका मुख्य कार्य विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं का मानक तैयार कर प्रमाणन योजना चलाना है।
औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ISI मार्क का प्रयोग होता है।
कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क का प्रयोग होता है।
 सोने और जेवरों को हॉलमार्क से पहचाना जाता है।
आधुनिक समय में उपभोक्ता के शोषण की समस्या क्यों गंभीर हो गई है
प्राचीन काल से भी उपभोक्ता या विक्रेता वस्तुओं का शोषण करते थे परंतु व्यापार का विस्तार होने के साथ ही आधुनिक समय में यह समस्या अत्यंत गंभीर हो गई है आज अखबार रेडियो टेलीविज़न आदि प्रचार एवं विज्ञापन के कई साधन उपलब्ध हैं उत्पादक इन पर बहुत अधिक धन ख़र्च करते हैं, जिसका भार उपभोक्ताओं को वहन करना पड़ता है। ग्राहको को आकृष्ट करने के लिए उत्पादक प्राय: अपनी वस्तुओं का भ्रामक प्रचार करते हैं । तथा अपनी वस्तुओं की गलत या अधूरी जानकारी देते हैं। बाजार में एकाधिकार एवं अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति होने के कारण भी उपभोक्ताओं का शोषण होता है ऐसी स्थिति में वस्तुओं की आपूर्ति पर बहुत थोड़े से उत्पादकों या विक्रेताओं का नियंत्रण रहता है और वह बाजार को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित कर सकते हैं । 

 → उपभोक्ता संरक्षण एवं सरकार 

उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा संबंधी अधिनियम 
भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कई अधिनियम या कानून लागू किए हैं इससे इसमें नापतोल मानक अधिनियम, खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम आदि महत्वपूर्ण है। 

उपभोक्ताओं के हित की रक्षा के लिए सरकार ने सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उपभोक्ता संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह एक अत्यंत प्रगतिशील और व्यापक कानून है इस अधिनियम के सभी प्रावधान जुलाई 1987 से प्रभावी हुए हैं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सभी प्रकार के वस्तुओं और सेवाओं के विक्रय पर लागू होता है अक्टूबर 2005 में भारत सरकार ने सूचना के अधिकार के नाम से एक अन्य अधिनियम पारित किया है जो जनहित तथा उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 
उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारो सुरक्षा एवं उनके शोषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया है इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं इसके अंतर्गत अनुचित व्यापार तरीकों का प्रयोग करने वाले उत्पादकों तथा विक्रेताओं को दंड देने के स्थान पर उपभोक्ताओं की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई है इसके लिए राष्ट्रीय राज्य एवं जिलास्तर पर एक अर्ध न्यायिक तंत्र गठित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग राज्य स्तर पर राज्य आयोग तथा जिला स्तर पर जिला अदालत कहा जाता है इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों को शीघ्रता से कम खर्च में दूर करना है यह अधिनियम वस्तुओं और सेवाओं के क्रय विक्रय पर लागू होता है 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारों का वर्णन 
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उनकी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है
उपभेक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत उपभोक्ताओं को कुछ अधिकार दिये गये हैं हैं -
1. सुरक्षा का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं से शरीर या संपत्ति को हानि से बचाने के लिए यह अधिकार दिया गया है)।
2. सूचना पाने का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं को खरीदते समय उससे संबंधित जानकारी, जैसे - मूल्य, इस्तेमाल करने की अवधि, गुणवत्ता, अवयवों की सूची इत्यादि) 
3. चुनाव या पसन्द करने का अधिकार (वस्तुओं के ब्रांड, किस्म, गुण, रंग इत्यादि पसन्द करनेका अधिकार) 
4. क्षतिपूर्ति का अधिकार (खरीदी गई वस्तु ठीक ढंग की नहीं होने पर उपभोक्ता को मुआवजे या क्षतिपूर्ति का अधिकार)
5. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (धोखाधड़ी से बचने के लिए एवं एक सजग उपभोक्ता बनने के लिए शिक्षा का अधिकार)

· उपभोक्ताओं के अधिकार की रक्षा एवं हितों के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद एवं राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना की गई 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था दी गई है जिसे तीन स्तर पर स्थापित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग, राज्य स्तर पर राज्य स्तरीय आयोग, जिला स्तर पर जिला मंच (फोरम)। यह न्याय व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्यवहारिक है इस ग्रुप व्यवस्था से उपभोक्ताओं को जल्दी एवं सस्ता न्याय प्राप्त होता है एवं समय एवं धन की बचत होती है पहले शिकायत जिला फोरम में की जाती है शिकायतकर्ता अगर संतुष्ट नहीं है तो मामले को राज्य फोरम फिर राष्ट्रीय फोरम में ले जा सकता है, अगर उपभोक्ता राष्ट्रीय फोरम से भी संतुष्ट नहीं होता है तो आदेश के 30 दिनों के अंदर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है। 

शिकायत कहाँ करें?
1. जिला फोरम : यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख रूपये तक हो।
2. राज्य आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख से 1 करोड़ तक हो 
3. राष्ट्रीय आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 1 करोड़ से अधिक हो
शिकायत दर्ज करने का तरीका 
उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। इस प्रकार की कोई भी शिकायत व्यक्तिगत रूप से या डाक द्वारा भेजी जा सकती है। शिकायत को सादे कागज पर लिखकर निम्नलिखित विवरण जैसे शिकायतकर्ताओं तथा विपरीत पार्टी का नाम का विवरण तथा पता, शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह सब कब हुआ और कहां हुआ, शिकायत में उल्लेखित आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, शिकायत पर शिकायतकर्ताओं अथवा उसके प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को निम्नलिखित राहत देने का प्रावधान है 
i. विक्रय की गई वस्तु या सेवा को बदलना 
ii. विक्रय की जाने वाली वस्तुओं की त्रुटि को दूर करना 
iii. वस्तुओं या सेवाओं के लिए अदा की गई रकम को वापस लौटाना 
iv. उपभोक्ताओं द्वारा सहन की गई हानि की क्षतिपूर्ति करना 

· विश्व के अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी कुछ ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना की गई है जो उपभोक्ताओं के इस शोषण का निराकरण करती है मुख्य रूप से राष्ट्रीय राज्य एवं निम्न प्रशासकीय स्तर पर 2 संस्थाएं महत्वपूर्ण है जो लोगों के जीवन और उपयोग के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है 

मानवाधिकार आयोग :
यह राष्ट्रीय स्तर की उच्चतम संस्था है । यह मानवीय अधिकारों की रक्षा एवं उनके हितों की सुरक्षा प्रदान करती है।
सूचना आयोग :
उपभोक्ताओं को वस्तुओं एवं सेवाओं से संबंधित सूचना प्राप्त कराने के लिए गठित आयोग।
. राज्य स्तर पर राज्य सूचना आयोग।
 राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सूचना आयोग।
सूचना का अधिकार क्या है 
सूचना का अधिकार आम आदमी का अधिकार संपन्न बनाने हेतु सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कदम है सूचना का अधिकार का तात्पर्य है कोई भी व्यक्ति अभिलेख ईमेल आदेश दस्तावेज नमूने और इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े आदि के रूप में ऐसी प्रत्येक सूचना प्राप्त कर सकता है जिसकी उसे आवश्यकता है जिसके लिए आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन करेंगे जिसकी सूचना 30 दिनों में विशेष परिस्थिति में 48 घंटे संबंधित व्यक्तियों को सूचना उपलब्ध करवाया जाएगा। 
एक उपभोक्ता के रुप में बाजार में अपने कर्तव्य का वर्णन करें 
उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए प्रायः सभी देशों में अवश्य कानून बनाए गए हैं परंतु उपभोक्ताओं के भी कुछ कर्तव्य हैं तथा इनके शोषण को रोकने के लिए आवश्यक है कि वे अधिकारों के साथ ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी सचेत हो एक उपभोक्ता के रुप में हमारे लिए निम्नलिखित कर्तव्य को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है 
a. उपभोक्ता को ना केबल वस्तुओं के क्रय विक्रय की व्यवसायिक पक्षों की जानकारी होनी चाहिए वर्णन स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की भी जानकारी आवश्यक है उन्हें कोई भी सामान खरीदते समय उनकी गुणवत्ता और शुद्धता के प्रति पूर्णतया स्वस्थ हो जाना चाहिए यदि यह सामान्य सेवा की गारंटी दीजिए गई है तो गारंटी कार्ड को पूरा करा कर उसे रख लेना चाहिए. 
b. जहां कहीं भी संभव हो खरीदे गए सामान या सेवा की रसीद अवश्य लेनी चाहि 
c. आने का स्थानों पर सरकार अथवा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उपभोक्ता संघ की स्थापना की गई है उपभोक्ता को इस के कार्यक्रम में रुचि लेनी चाहिए। 
d. एक उपभोक्ता द्वारा क्रय की जाने वाली वस्तु है कितनी ही कम मूल्य की क्यों ना हो उसे अपनी वास्तविक समस्या की शिकायत अवश्य करनी चाहिए 
e. उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर इसका प्रयोग भी करना चाहिए 
उपभोक्ताओं की जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से ही उन्हें उत्पादकों और व्यापारियों के शोषण से बचाया जा सकता है। 
नोट :-  इस नोट्स को लिखने के लिए कई किताबो को सन्दर्भ में रखा गया है l किसी भी तथ्यों में शंका हो तो हमारे whatsapp नंबर 9060219579 पर संपर्क करें l 

रोजगार एवं सेवा ( अध्याय 5 ) (वर्ग 10)

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 ( अध्याय 5 

रोजगार एवं सेवा


किसी देश की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका रोजगार होता है  l जब कोई व्यक्ति अपने परिश्रम एवं शिक्षा के आधार पर जीविकोपार्जन के लिए धन एकत्रित करता है अर्थात आर्थिक क्रियाकलाप कर वह अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं जैसे रोटी कपड़ा और मकान प्राप्त कर सके रोजगार कहलाता है l 
अपने परिश्रम व शिक्षा के आधार पर कमाया गया धन को जब पूंजी के रूप में व्यवहार किया जाता है और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश किया जाता है तो सेवा क्षेत्र उत्पन्न होता है अतः रोजगार एवं सेवाएं एक दूसरे के पूरक है अर्थात रोजगार वृद्धि से सेवा क्षेत्र का भी विस्तार होता है l 


रोजगार एवं सेवा में क्या संबंध है

रोजगार एवं सेवाओं में घनिष्ठ संबंध है आर्थिक समृद्धि के साथ सेवा क्षेत्र अब देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इसमें रोजगार की संभावनाएं निरंतर बढ़ती जा रही है l  इस क्षेत्र के अंतर्गत ऐसी अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन संभव है विगत वर्षों के अंतर्गत संचार सेवाओं के प्रसार से सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई हैl भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है, जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर है कृषि पर इस अत्यधिक जनभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है l 

श्रम बल तथा कार्य बल में अंतर

 समाज के जो व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन कर सकते हैं वही श्रमबल का निर्माण करते हैं परिवार के बच्चे एवं बूढ़े तथा मानसिक  शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति इन क्रियाओं में शामिल नहीं होते हैं इसके अतिरिक्त हम श्रमबल में से ऐसे व्यक्तियों को निकाल देते हैं जो परिवारिक अधिकारियों में व्यस्त हैं या कार्य करने के लिए इच्छुक नहीं है इसका अभिप्राय यह है कि जो व्यक्ति वास्तविक रुप से आर्थिक क्रियाकलापों में लगे हैं अथवा उन्हें करने के योग्य हैं वह सभी श्रम बल के सदस्य हैं इसके विपरीत जो इन क्रियाओं में वस्तुतः लगे हुए हैं उन्हें कार्य बल के रूप में जाना जाता है कार्य बल तथा श्रम बल के अंतर को बेरोजगार श्रमबल कहते हैं जनसंख्या के द्वारा ही प्राकृतिक एवं पूंजीगत साधनों के सहयोग से सकल राष्ट्रीय उत्पाद का सृजन होता है 

आर्थिक विकास का क्षेत्र

रोजगार एवं सेवाएं आर्थिक विकास के विकास और विस्तार से उपलब्ध होती है आर्थिक विकास के मुख्य रूप से तीन क्षेत्र हैं A. कृषि क्षेत्र B. उद्योग क्षेत्र C. सेवा क्षेत्र्

कृषि क्षेत्र

भारत एक कृषि प्रधान देश है कृषि क्षेत्र पर कुल जनसंख्या का लगभग 70%  बोझ अत्यधिक जनसंख्या के कारण कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर छीन  हो गया है फल स्वरुप कृषि क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी एवं अन्य बेरोजगारी पाए जाने लगे हैं जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ खेती  के लिए जमीन में वृद्धि नहीं हो पा रहा है और एक ही भूखंड पर आने वाली नई पीढ़ी भी जुड़ता जा चला जा रहा है जिससे उत्पादन की मात्रा प्रति व्यक्ति पर घटता चला जा रहा है

उद्योग क्षेत्र

रोजगार का दूसरा क्षेत्र उद्योग क्षेत्र है इस क्षेत्र के माध्यम से भी रोजगार की प्राप्ति की जा रही है देश की औद्योगिक विकास की गति में तेजी आने के द्वारा ही औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार की वृद्धि होती है

सेवा क्षेत्र

सेवा क्षेत्र को ही आर्थिक विकास का तृतीय क्षेत्र कहा जाता है सेवा क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में 55.1 प्रतिशत योगदान है जबकि कृषि एवं उद्योग का मात्र 44.9 प्रतिशत आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के कारण सेवा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिलती है सेवा क्षेत्र रोजगार का एक व्यापक क्षेत्र है जिसके अंतर्गत आए दिन मानव संसाधन के लिए व्यापक पैमाने पर रोजगार उपलब्ध होने लगे है

सेवा क्षेत्र का महत्व बताएं

आर्थिक विकास एवं रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवा में परिवहन संचार विज्ञापन वाणिज्य तथा सभी प्रकार के सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है विकसित देशों का अधिकांश कार्य बल सेवा क्षेत्र में कार्यरत है इस क्षेत्र की सेवाओं में इन देशों की आर्थिक विकास को बहुत प्रोत्साहन मिला है

                  वर्तमान समय में भारत का सेवा क्षेत्र बहुत विकसित नहीं है लेकिन आज भी हमारे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक है  कृषि के यंत्रीकरण एवं आधुनिक औजरो के प्रयोग से क्षेत्र में रोजगार के अवसर क्रमशः कम हो रहे हैं इसके फलस्वरुप ग्रामीण जनसंख्या रोजगार की खोज में शहरों में पलायन हो रहा है परंतु हमारे देश का औद्योगिक क्षेत्र में बहुत विकसित नहीं है आर्थिक विकास के साथ ही विनी विनिर्माण उद्योग में भी रोजगार के अवसर का विस्तार होगा लेकिन पूंजी तथा अत्याधुनिक तकनीक के अभाव में औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर में बहुत तेजी से वृद्धि होने की संभावना नहीं है यही कारण है कि आप सभी विकासशील देश रोजगार के नए अवसरों के सृजन के लिए सेवा क्षेत्र को महत्व देने लगे l 

                                                         हमारे देश तथा राज्य के लिए सेवा क्षेत्र का विशेष महत्व है इस छेत्र में की जाने वाली विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक सेवाओं और सुविधाओं एक अर्थव्यवस्था को क्रियाशील बनाती है उदाहरण के लिए कच्चे माल मशीन यंत्र को कारखाना तक पहुंचाने तथा उत्पादित वस्तुओं को बाजार तक ले जाने के लिए यातायात के साधन आवश्यक है उसी प्रकार शक्ति औद्योगिक उत्पादन का आधार है आधुनिक उद्योगों के मुख्यता मशीनों का प्रयोग होता है जो शक्ति अथवा बिजली से संचालित होते हैं संरचनात्मक और सेवाओं के अभाव में कृषि एवं उद्योग किसी भी क्षेत्र का विकास संभव नहीं है l 

                                                           भारत एक विकासशील देश के आर्थिक विकास के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की आवश्यकता है उन्हें पूंजी निवेश करना चाहते हैं उद्योग व्यवसाय के लिए सड़क बिजली पानी आदि कि सुविधाएं उपलब्ध है।

सेवा क्षेत्र के भाग

सेवा क्षेत्र को सामान्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-
सरकारी सेवा जब देश व राज्य की सरकार लोगों को काम करने के बदले मासिक वेतन देती है इनसे विभिन्न क्षेत्रों में काम लेती है तो उसे सरकारी सेवा कहा जाता है सरकारी सेवा के कुछ व्यापक क्षेत्र का उदाहरण है इस प्रकार है जनसेवा रेल सेवा वायु यान सेवा स्वास्थ्य वा वित्त सेवा शिक्षा सेवा बस सेवा कृषि सेवा अभियंत्रण सेवा बैंकिंग सेवा आदि।
गैर सरकारी सेवा
जब सरकार अपने द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों को गैर सरकारी संस्थानों के सहयोग से लोगों तक पहुंचाने का काम करती है अथवा लोग स्वयं अपने प्रयास से ऐसी सेवाओं का सृजन से लाभान्वित होते हैं तो उसे गैर सरकारी सेवा कहा जाता है इस क्षेत्र के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं बैंकिंग सेवा दूरसंचार सेवा यातायात सेवा स्वास्थ्य सेवा स्वरोजगार सेवा आदि।
रोजगार सृजन में सेवाओं की भूमिका आज विश्व का लगभग सभी देशो में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र की उत्पादक विधियों एवं तकनीक में परिवर्तन हो रहे हैं इन परिवर्तनों से सेवा क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित किया है सेवा क्षेत्र अब किसी देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना निरंतर बढ़ती जा रही है 

भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर करती हैं कृषि पर से इस अत्यधिक आभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है क्षेत्र के अत्यधिक ऐसे अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सेवा क्षेत्र की पारंपरिक सेवाओं में परिवहन जिनमें शिक्षा एवं सेवाओं को भी सम्मिलित किया जाता है यह बड़े बड़े पैमाने पर रोजगार की व्यवस्था करती है तथा आर्थिक विकास के साथ-साथ में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है भारत की परिवहन सेवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह हमारे देश के माल ढोने और यात्री परिवहन के साधन है सुरक्षा सेवाओं के बाद रेल देश के सबसे अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कराता है हमारा देश विश्व की सबसे बड़ी सड़क प्रणाली वाले देशों में एक है लेकिन अभी भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की बहुत कमी है तथा ग्रामीण क्षेत्र के निर्माण बहुत अधिक रोजगार सृजन संभव है ग्रामीण क्षेत्र में सड़क का विकास प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत किया जा रहा है इस योजना के उद्देश्य से सभी गांव को सड़क से जोड़ना है जिनकी आबादी 500 से अधिक है जहाजरानी और विमान सेवाएं हमारे देश के अन्य परिवहन साधन है तथा आर्थिक विकास के साथ ही इन सेवाओं में भी रोजगार के अवसर में वृद्धि हुई है।
    वर्तमान में रोजगार सृजन की दृष्टि से संसार सेवाएं भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं डाक सेवक टेलीग्राफ टेलीफोन रेडियो संचार के साधन है इसका प्रयोग कर रहे हैं परंतु विगत वर्षों के अंतर्गत संचार उपग्रहों के प्रयोग से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं क्षेत्र में टेलीफोन मोबाइल इंटरनेट सेवाओं का प्रयोग होने लगा है इसके परिणाम स्वरुप क्षेत्र में रोजगार के अवसर में वृधि हो गया हैं।

· राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार के द्वारा रोजगार सृजन करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिसका क्रियान्वन राज्य सरकार के द्वारा भी किया जा रहा है जिसमें सरकार के द्वारा रोजगार हेतु निम्न प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है सरकार के द्वारा चलाई गई योजना 

· काम के बदले अनाज 14 नवंबर 2004
· राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम 1980
· ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण का कार्यक्रम 1979
· ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम 1983 
· समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम 20 अक्टूबर 1890
· जवाहर रोजगार योजना 1889 
· स्वयं सहायता समूह
· नरेगा
आउटसोर्सिंग किसे कहते हैं ?

विगत वर्षों के अंतर्गत सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का बहुत तेजी से विकास हुआ है ।आज दूर संचार सुविधाओं द्वारा पूर्व की अपेक्षा विभिन्न देशों से संपर्क स्थापित करना तथा सूचनाओं का आदान प्रदान करना शुरू हो गया है अतः अब हम अपने देश में रहकर भी विश्व के अन्य देशों को अपनी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं इससे सेवा क्षेत्र को बहुत विस्तार हुआ है तथा अन्य वस्तुओं के समान हैं इस क्षेत्र के उत्पादन का भी निर्यात होने लगा है ,जब कोई कंपनी अपने उत्पादन से संबंधित सेवाएं अन्य स्रोतों अथवा देशों से प्राप्त करती है तो उसे आउटसोर्सिंग कहते हैं हमारे देश में शर्म सस्ता होने के कारण विकसित देशो के अन्ए काव्य अपनी सेवाओं का भारत में आउटसोर्सिंग करने लगी है एक विदेशी फॉर्म द्वारा अपनी पुस्तक के डिजाइन छपाई आदि के कार्य हमारे देश में करवाना आउटसोर्सिंग का उदाहरण है।

 भारत विश्व को सेवा प्रदाता के रूप में

21 वीं शताब्दी के विश्व के सेवा क्षेत्र में भारतीय श्रम पूंजी का महत्व पूर्ण योगदान रहा है । हमारे देश के निवासी बहुत पहले से उत्तरी अमेरिका ऑस्ट्रेलिया ब्रिटेन आदि विकसित देशों में जाकर अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे हैं आज भारत को विश्व का अग्रणी युवा देश कहा जाता है जहां संपूर्ण जनसंख्या में ऊर्जावान युवा वर्ग की संख्या अधिक हो गई है यह विकास की गति को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है अपने देश में अफसरों की कमी तथा उन देशो का उच्च जीवनस्तर है भारतवासियों को विकसित देशों में जाने के लिए प्रेरित करता है 

उदारीकरण के कारण विश्व के सेवाक्षेत्र में जो विकास की गति आई है इसका लाभ सभी देशों को प्राप्त होने के अवसर आने लगे हैं इस दृष्टिकोण से आज विश्व के औद्योगिक विकसित देश अपने उत्पाद एवं सेवाओं के विभिन्न कामों को संपादन व से लेकर आने लगे हैं जहां उपलब्ध होती है उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में से अधिक का उत्पादन चीन तथा कोरिया में होता है और भारत में भी डाबर कंपनी अपने उत्पाद के कम करने के लिए अपने पड़ोसी देश नेपाल में कारखाना खोल रखे हैं जहां श्रम शक्ति शक्ति है जब बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने संबंधित सेवाएं अपनी कंपनी के जारी किया विदेशी समूह से प्राप्त करती है तो ऐसे सेवाओं को आउटसोर्सिंग कहा जाता हैं ।

सेवा क्षेत्र के विकास में बुनियादी सुविधाएं की भूमिका

सेवा क्षेत्र का संबंध मनुष्य की आवश्यकताएं और सुख सुविधाओं से है आर्थिक विकास एवं आय में वृद्धि के साथ ही इस क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मांग बढ़ती है लेकिन इस क्षेत्र का विकास मुख्य रूप से मानव है तत्वों पर निर्भर है तथा इसके विकास का विस्तार के लिए मानवीय संसाधनों का विकास आवश्यक है योगी कुशल एवं प्रशिक्षण के अभाव में सेवा क्षेत्र का विकास संभव नहीं है एक सक्षम श्रम बल का निर्माण करने के लिए कुछ बुनियादी एवं आधारभूत सुविधाएं आवश्यक है इस प्रकार की सुविधाएं श्रम बल की कार्यकुशलता को बढ़ाती है इन सेवाओं और सुविधाओं में निम्नलिखित महत्वपूर्ण है

वित्त (finance) बैंकिंग क्षेत्र बीमा क्षेत्र अन्य सरकारी विद्या क्षेत्र वित्त क्षेत्र 
ऊर्जा (energy) कोयला विद्युत रेल पेट्रोलियम गैस गैर-पारंपरिक ऊर्जा एवं अन्य।
यातायात (transport) रेलवे सड़कें वायुयान जलयान
संचार (communication) दाक तार टेलीफोन टेली संचार मीडिया एवं अन्य।

गैर आर्थिक संरचना से मनुष्य की क्षमता एवं उत्पादकता में वृद्धि कर अप्रत्यक्ष रुप से उत्पादक एवं अंततः आर्थिक विकास में सहायता प्रदान किया जाता है

शिक्षा (education) मानवीय संसाधनों के विकास की दृष्टि से शिक्षा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है एक उपयुक्त एवं तर्क संगत शिक्षा प्रणाली से देश में कुशल और योग्य श्रम शक्ति का निर्माण होता है और हमारे उत्पादन क्षमता बढ़ती है उचित शिक्षा नागरिकों को मनो बुद्धि ज्ञान एवं क्षमताओं का विकास करो से अधिक योग्य सक्षम तथा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरुप बनाती है केवल व्यक्ति ही नहीं वरन समाज के विकास में भी शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है उचित शिक्षा द्वारा आर्थिक विकास के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं तथा राष्ट्र और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है यही कारण है कि सरकार द्वारा शिक्षा को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है ।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मानव संसाधनों के विकास के लिए स्वास्थ्य सेवाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है हमारे देश में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं ही एक सक्रिय श्रम शक्ति का निर्माण करती है किसी भी व्यक्ति की सतत कार्य करने की क्षमता बहुत आंसुओं में उस के स्वास्थ्य की दशा पर निर्भर है एक स्वस्थ व्यक्ति ही उत्पादन कार्य में सक्रिय रुप से भाग लेकर उत्पादन में वृद्धि कर सकता है वस्तुतः स्वास्थ्य का अधिकार नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है यही कारण है कि हमारे राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवाओं को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य संक्रामक एवं गैर संक्रामक रोगों के उपचार के साथ ही परिवार कल्याण एवं पोषाहार कार्यक्रम का विस्तार करना है पिछले पांच दशक के अंतर्गत भारत में सरकारी एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों में एक वृहद स्वास्थ्य संरचना का निर्माण हुआ है परंतु स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सुविधाओं में वृद्धि होने पर भी इनकी उपलब्धता हमारी आवश्यकताओं की तुलना में बहुत कम है.

आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाए मानवीय संसाधनों के विकास के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के समान ही आवाज तथा कुछ अन्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था भी आवश्यक है परंतु भारत में आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार बहुत निम्न है आवास तथा स्वच्छता जलापूर्ति जैसी सेवाओं का भाव निर्धन वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करता है क्योंकि वे अपने सीमित साधनों से स्वयं की व्यवस्था करने में असमर्थ होते हैं या भारतीय श्रमिकों की कार्य क्षमता कम करने का एक प्रधान कारण है।

सेवा क्षेत्र के विकास की विवेचना कीजिए

हमारा मानवीय संसाधनों के विकास तथा सेवा क्षेत्र के विस्तार में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है 21वीं सदी को ज्ञान की सदी के रूप में देखा जा रहा है भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं एक महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने सेवाओं को लोगों की संपत्ति कहा है विगत वर्षों के अंतर्गत हमारे देश में भी संचार एवं सूचना सेवाओं के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है यह शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले सुधार तथा ज्ञान एवं कौशल के विकास का ही परिणाम है हमारे देश के लिए शिक्षा का महत्व इस कारण और बढ़ जाता है कि भारत की में युवा शक्ति का विशाल भंडार है इनकी उचित शिक्षा और प्रशिक्षण द्वारा हम सेवा क्षेत्र में भविष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं शिक्षा और प्रशिक्षण के तीन मुख्य अंतर है प्रारंभिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा प्रारंभिक शिक्षा युवा वर्ग को न्यूनतम एवं आधारभूत कौशल सिखाती है प्रारंभिक शिक्षा का हमारी उत्पादक क्रियाओं का पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है यही कारण है कि इस प्रकार की शिक्षा को हमारे देश में सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है भारत सरकार की नई शिक्षा नीति की घोषणा 1986 में हुई थी जिसे 1992 में मैं अद्यतन किया गया इस नीति के अंतर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने इसे सर्व सुलभ कराने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा बालिका शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व के अनुसार 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना राज्य का दायित्व है जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया गया है 

प्रारंभ एवं माध्यमिक शिक्षा के साथ ही हमारे देश के एक बहुत बड़े समुदाय को माध्यमिक शिक्षा देने की भी व्यवस्था है आर्थिक विकास एवं संरचनात्मक सुविधाओं को बनाए रखने के लिए हमें बहुत बड़ी मात्रा में प्रशिक्षित श्रम की आवश्यकता पड़ती है माध्यमिक शिक्षा द्वारा ही इस प्रकार की श्रम शक्ति का निर्माण होता है सरकार ने वर्ष 1986 में प्रत्येक जिले में औसतन एक नवोदय विद्यालय स्थापित करने की योजना प्रारंभ की है इसका उद्देश्य मुख्यता ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली छात्रों को अच्छे स्तर की आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है माध्यमिक शिक्षा को व्यवसाय पर बनाने के लिए कुछ चुने हुए संस्थानों में व्यवसायिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं

उच्च शिक्षा के अंतर्गत हमारे सामान्य शिक्षा के साथ ही तकनीकी शिक्षा शामिल है चिकित्सा इंजीनियरिंग पशु विज्ञान कृषि शिक्षा प्रबंधन विधि शिक्षा आदि को तकनीकी शिक्षा की संज्ञा दी जाती है भारत में उच्च शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है इसके लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश उसकी गुणवत्ता में सुधार राज्य सभा क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रमों में संशोधन शिक्षा के व्यवसायीकरण तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी के विस्तार की नीति अपनाई गई है।

· मानव पूंजी के मुख्य घटक-भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य,शिक्षा
आर्थिक मंदी का भारत के सेवा क्षेत्र पर प्रभाव

किसी भी अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियां सदस्य नहीं रहती है तथा इसमें समय-समय पर उतार चढ़ाव होते रहते हैं मंडी एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यवसाय क्रियाएं सामान्य स्तर के नीचे रहती हैं इसके परिणाम स्वरुप उत्पादन एवं आ इ की मात्रा में गिरावट आने लगती है श्रमिक और उत्पादक के अन्य साधन बेरोजगार हो जाते हैं तथा मजदूरों की दरों में कमी हो जाती है विश्व स्तर पर इस प्रकार की मंदी सर्वप्रथम 1930 में हुई या मंदी संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रारंभ हुई जिनसे विश्व के प्राय सभी देशों को प्रभावित किया व्यापार के विस्तार में अब विश्व के विभिन्न निर्देश एक दूसरे के से जुड़ गए हैं चीन से अमेरिका सबसे समृद्ध देश की आर्थिक मंदी से हराया सभी देश प्रभावित हुए थे वर्तमान मंदी का प्रभाव 2008 में अमेरिका से हुआ जिसे सेवा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ है उपभोक्ता की मांग कम हो जाने के कारण बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ भी कम हो गया है और वह श्रमिकों की छटनी कर रहे हैं इसे भारत भी प्रभावित हुआ है तथा हमारे सेवा क्षेत्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है इससे निजी क्षेत्र के उद्योग एवं व्यवसाय में स्थिरता आई है श्रमिकों की छटनी हुई है यहां के तकनीकी कर्मचारी की विदेशों में कम हो गई है परंतु अमेरिका और यूरोप के देश की अपेक्षा भारत इसे कम प्रभावित हुआ है इसका मुख्य कारण वित्तीय संस्थाओं तथा पूंजी बाजार पर सरकार का प्रभाव पूर्ण नियंत्रण है।

इंद्रा आवास योजना


1985 1986 से सरकार द्वारा इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासी हरिजन एवं भूमिहीन श्रमिकों के लिए आवास अर्थात रहने के मकान की व्यवस्था की जा रही है जिसे इंदिरा आवास योजना की संज्ञा दी गई है

सेवा क्षेत्र की महत्व बताएं
आर्थिक विकास तथा रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवाओं में परिवहन संचार विपणन वाणिज्य तथा सभी प्रकार की सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है l 

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मुद्रा , बचत एवं साख अध्याय 3

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मुद्रा , बचत एवं साख 
अध्याय 3

 
भूमिका

समाज में विनिमय एवं मुद्रा का विकास सभ्यता के विकास से संबंधित है आदिकाल से मनुष्य की आवश्यकता बहुत कम थी उसकी पूर्ति वह स्वयं कर लेता था ऐसी स्थिति में मुद्रा की आवश्यकता नहीं था l मनुष्य स्वावलंबी था लेकिन सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ती चली गई और विनिमय की जरूरत पड़ने लगी अब वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने आप को असमर्थ होने लगा, इस प्रकार मनुष्य की आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण विनिमय का जन्म हुआl 
आज के युग में मुद्रा की भूमिका काफी बढ़ गई है आज का समस्त आर्थिक ढांचा मुद्रा पर निर्भर है तो हम कह सकते हैं कि आधुनिक युग के प्रगति का श्रेय मुद्रा को ही जाता है l(If money is not the heart of your economic system it can certainly be considered its blood stream.) 

विनिमय के दो रूप है (forms of exchange)

1.वस्तु विनिमय प्रणाली ( barter system)
2.तथा मौद्रिक विनिमय प्रणाली(monetary system)

1.   वस्तु विनिमय प्रणाली 
वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें एक वस्तु के बदले में दूसरी वस्तु का आदान प्रदान होता हैl  दूसरे शब्दों में किसी एक वस्तु का किसी दूसरे वस्तु के साथ बिना मुद्रा के प्रत्यक्ष रुप से लेनदेन वस्तु विनिमय प्रणाली कहलाता है l

उदाहरण के लिए गेहूं से चावल बदलना सब्जी से तेल बदलना दूध से दही बदलना आदि l यह प्रणाली पुराने जमाने में प्रचलित थी व्यवहारिक रुप से इस प्रणाली में लोगों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है l 

वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयां difficulties of barter system 

-वस्तु विनिमय प्रणाली मे मनुष्य को निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था 

· आवश्यकता के दोहरी संयोग का अभाव 
· मूल्य के सामान्य मापक का अभाव 
· मूल्य संचय का अभाव 
· सह विभाजन का अभाव 
· भविष्य के भुगतान की कठिनाई 
· मूल्य हस्तांतरण की समस्या

2. मौद्रिक विनिमय प्रणाली 

वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों के कारण मनुष्य के द्वारा ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता हुई जो बाजार व्यवस्था में लाने के क्रम में ऐसी कठिनाइयों का समाधान दे सकें इन्हीं कठिनाइयों को दूर करने के लिए मुद्रा का आविष्कार किया गया या फिर कह सकते हैं कि वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों ने ही मुद्रा को जन्म दिया l और मुद्रा के आविष्कार मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है l

मुद्रा क्या है 



मुद्रा की परिभाषा सर्वसम्मत देना कठिन है विभिन्न अर्थशास्त्रियों के द्वारा अलग अलग परिभाषा दी गई है l साधारण बोलचाल की भाषा में मुद्रा का अर्थ धातु के बने सिक्के को समझा जाता है मुद्रा शब्द का प्रयोग मोहर या चीन के अर्थ में भी किया जाता है यह कारण है कि जिस वस्तु पर सरकारी चिन्हों के अर्थ में लगाया जाता था उसे मुद्रा कहा जाता था l अर्थशास्त्रियों में मुद्रा की अनेक परिभाषा दी है कुछ परिभाषाएं संकुचित हैं कुछ विस्तृत है तथा कुछ परिभाषाएं अन्य बातों पर निर्धारित है प्रोफैसर हॉट लिरिक्स ने बताया कि मुद्रा वह है जो मुद्रा का कार्य करती है l  नेप (जर्मनी) के अनुसार कोई भी वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा घोषित
की जाती है मुद्रा कहलाते हैं l


वस्तु विनिमय  वस्तु विनिमय प्रणाली के अंतर्गत किसी वस्तु या

सेवा का विनमय  किसी अन्य वस्तु या सेवा के साथ प्रत्यक्ष रुप से

किया जाता है l 


वस्तु मुद्रा 
प्रारंभिक काल में किसी एक वस्तु को मुद्रा के कार्य संपन्न करने के लिए चुन लिया गया था जैसे शिकारी युग में खाल या चमड़ा, कृषि युग में कोई अनाज जैसे कपास गेहूं आदि को मुद्रा का कार्य संपन्न करने के लिए चुना गया ।
Metallic money वस्तु मुद्रा द्वारा विनिमय में करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था तब धातु का प्रयोग मुद्रा के रूप में होने लगा मुद्रा जो पीतल और तांबे इत्यादि से बना होता है उसे metallic money कहते है 
सिक्के धातु मुद्रा के प्रयोग में भी धीरे-धीरे कठिनाइयां आने लगी इंन कठिनाइयों को दूर करने के लिए सिक्के का प्रयोग किया जाने लगा। 
सोने चांदी दि से बना वह वस्तु जो देश की सार्वभौम सरकार की मोहर से प्रचलित होता है उसे सिक्का कहते  हैं 

पत्र मुद्रा 

सिक्का मुद्रा के कुछ दोष के कारण पत्र मुद्रा प्रचलन में आया क्योंकि सिक्का मुद्रा कोई जगह से दूसरी जगह ले जाने में कठिनाई होती थी। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए वर्तमान समय में विश्व के तमाम देश में पद मुद्रा का प्रचलन है l 

देश की सरकार तथा केंद्रीय बैंक द्वारा जो कागज का नोट प्रचलित किया जाता है उसे पत्र मुद्रा कहते हैं यह कागज का बना होता है इसलिए इसे कगजी मुद्रा भी कहा जाता है 

बर्तमान समय में केंद्र सरकार एक रुपया का नॉट जारी करती हैl इससे अधिक सभी नोट देश के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा चलाई जाते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया 2 5 10 20 50 100 200 500 और 2000 का नोट जारी करती है ।


साख मुद्रा 

साख पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ कहा जाता है। साख पर्यायवाची शब्द क्रेडिट है, इसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के क्रेडो शब्द से हुई है जिसका अर्थ है विश्वास करना । इस प्रकार साख का संबंध विश्वास तथा भरोसे से से है परंतु साख शब्द का व्यापक अर्थ है आर्थिक शब्दावली में हम किसी व्यक्ति या संस्था की साख का उल्लेख करते हैं तब इससे उनकी ईमानदारी तथा ऋण लौटाने की क्षमता का बोध होता है जिस व्यक्ति को अधिक आसानी से उधार मिल जाता है हम कहते हैं कि उसका साख अधिक है l 

प्लास्टिक मुद्रा (plastic money) 

ATM सह डेबिट कार्ड - ATM का अर्थ है स्वचालित टेलर मशीन (ऑटोमेटिक टेलर मशीन) यह मशीन 24 घंटे रुपए निकालने तथा जमा करने की सेवा प्रदान कराता है। भारत के सभी बड़े-बड़े व्यवसाई बैंक जैसे स्टेट बैंक इलाहाबाद बैंक ICICI Bank, बंधन बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, केनरा बैंक,‌ पंजाब नेशनल बैंक आदि द्वारा यह सुविधा अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराई जाती है। 

क्रेडिट कार्ड क्रेडिट कार्ड भी प्लास्टिक मुद्रा का एक रुप है । विश्व में प्रचलित कार्डों में वीजा मास्टरककार्ड , अमेरिकनन एक्सप्रेस आदि प्रसिद्ध है। क्रेडिट कार्ड के अंतर्गत ग्राहक की वित्तीय स्थिति को देखते हुए बैंक उसकी साख की एक राशि निर्धारित कर देती है जिसके अंतर्गत वह अपने क्रेडिट कार्ड के माध्यम से निर्धारित धनराशि के अंदर वस्तुओं और सेवाओं को खरीद सकता है 

मुद्रा का आर्थिक महत्व 
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था या समाजवादी अर्थव्यवस्था यह मिश्रित अर्थव्यवस्था सभी में मुद्रा आर्थिक विकास के मार्ग में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है l क्योंकि यदि मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था का हृदय नहीं तो रक्त स्रोत तो अवश्य है 
मुद्रा के लाभ 
मुद्रा हमारे लिए काफी लाभदायक है मुद्रा से पूरे मानव समाज को लाभ पहुंचता है अर्थशास्त्र की सभी शाखा जैसे उपभोक्ता उत्पादन विनिमय वितरण तथा राजस्व मुद्रा का महत्वपूर्ण स्थान है मुद्रा के कुछ कार्य तथा लाभ निम्नलिखित है 

1. मुद्रा से उपभोक्ता को लाभ- प्रत्येक उपभोक्ता मुद्रा से अपनी इच्छा अनुसार वस्तुओं को खरीद सकता है 
2. मुद्रा से उत्पादक को लाभ – मुद्रा की सहायता से उत्पादन के साधनों की आवश्यक मात्रा जुटाने कच्चे माल को खरीदने तथा संचित रखने तथा समय समय पर पूंजी की आधार प्राप्त करने में सहायता मिलती है 
3. मुद्रा और साख – मुद्रा ने साख प्रणाली को संभव बनाया है 
4. वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों का निराकरण 
5. मुद्रा और पूंजी की तरलता – मुद्रा में पूंजी की तरलता प्रदान की है क्योंकि इसको प्रत्येक व्यक्ति स्वीकार कर लेता है l 
6. मुद्रा और पूंजी की गतिशीलता 
7. मुद्रा और पूंजी निर्माण – मुद्रा तरल संपत्ति है इसे बैंक में जमा कर सुरक्षित रखा जा सकता है और ब्याज भी प्राप्त किया जा सकता है l 
8.मुद्रा और बड़े पैमाने के उद्योग – मुद्रा के होने से आज बड़े बड़े उद्योग स्थापित हो सके हैं तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका है l 
9.मुद्रा और आर्थिक प्रगति- मुद्रा किसी देश की आर्थिक प्रगति का सूचक है 
10. मुद्रा और सामाजिक कल्याण – मुद्रा द्वारा किसी देश की राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय की माप होती है यदि प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है तो देश की आर्थिक कल्याण की ओर अग्रसर होता है मुद्रा द्वारा सामाजिक कल्याण को मापा जा सकता है 

बचत 

प्रत्येक व्यक्ति या परिवार को तो कुछ आय होती है इस आय के दो उपयोग हो सकते हैं प्राय: एक बड़ा उपभोग पर खर्च होता है और शेष बचा लिया जाता है उपभोग्य वस्तुओं और सेवाओं पर किया जाने वाला वह है इस वजह से मनुष्य के वर्तमान आवश्यकता की संतुष्टि होती है बचत आय का वह भाग्य है जिसका वर्तमान में उपयोग नहीं किया जाता है उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का मानसिक आय ₹10000 है जिसमें सेवा ₹8000 उपभोग व्यय करता है तो उसे ₹2000 उसकी बचत है। 

दूसरे शब्दों में, किसी देश के आर्थिक जीवन में बचत का विशेष महत्व है बचत द्वारा पूंजी का निर्माण होता है जिसका उद्योग व्यापार तथा अर्थव्यवस्था के अन्य उत्पादक क्रियाकलापों में निवेश किया जाता है 

कुल आय - उपभोग व्यय = आय 

आय तथा उपभोग का अंतर बचत कहलाता है 

बचत दो प्रकार का होता है नगद बचत एवं वस्तु संचय 

किसी व्यक्ति की बचत उसकी आय का वह भाग है जहां उपभोग की वस्तुओं पर व्यय नहीं की जाती है (क्राउथर के अनुसार) 

साख क्या है 
प्रो० जीड के अनुसार साख एक ऐसा विनिमय कार्य है जो एक निश्चित अवधि के बाद भुगतान करने के बाद पूरा हो जाता है 

साख का अर्थ है विश्वास या भरोसा अर्थशास्त्र में साख का मतलब ऋण लौटा ने का भुगतान करने की क्षमता में विश्वास से होती है यदि हम कहें कि आप की साख बाजार में अधिक है तो इसका मतलब है आप ऋण लौटाने की स्थिति में लोगों को अधिक विश्वास है इस विश्वास के आधार पर एक व्यक्ति या संस्था दूसरे व्यक्ति या संस्था को उधार देता है l 

साख में दो पक्ष होते हैं ऋण दाता तथा ऋणी (ऋण दाता ऋणी को कुछ वस्तुएं तथा धन उधार देता है जिसका तत्कालीन भुगतान उसे प्राप्त नहीं होता यह काम विश्वास के आधार पर होता है कुछ समय बाद ऋणी द्वारा उधार लिए गए वस्तुओं तथा रूपए का भुगतान कर दिया जाता है घर अगर ऋणी उधार लिए गए वस्तुओं तथा रुपए का भुगतान नहीं करता है तो उसके साख में हास होता है) 

साख का आधार 
साख का मुख्य आधार निम्न है 
विश्वास –सांख का मुख्य आधार विश्वास है साख देने वाला या ऋणदाता उधार देने को तभी तैयार होता है जब उसे विश्वास होता है की ऋणी समय पर रुपए लौटा देगा 

चरित्र - ऋणी का चरित्र भी उसकी सा का एक महत्वपूर्ण आधार होता है ऋण चरित्रवान तथा ईमानदार है तो उसे ऋण मिलने में दिक्कत नहीं होती दूसरी ओर चरित्रहीन व्यक्तियों की साख कम होती है और कोई उसे ऋण देने के लिए तैयार नहीं होता। 

चुकाने की क्षमता ऋणदाता किसी व्यक्ति को उधार तब देता है जब उसे उस व्यक्ति के भुगतान की क्षमता पर पूरा विश्वास हो । इस तरह किसी व्यक्ति की साख उस व्यक्ति के भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर करती है 

पूंजी एवं संपत्ति – ऋण दाता पूंजी तथा संपत्ति की जमानत के आधार पर ऋण देता है क्योंकि जिस व्यक्ति के पास जितनी अधिक पूंजी तथा संपत्ति होगी उसे उतना ही अधिक ऋण मिल सकेगा 

ऋण की अवधि- ऋण की अवधि का प्रभाव साख पर पड़ता है ऋण दाता दीर्घकालीन ऋण देने से घबराते हैं क्योंकि उन्हें संदेश आता है कि दीर्घकाल मे ऋणी की क्षमता चरित्र और आर्थिक स्थिति में परिवर्तन हो जाए। 
साख पत्र 
साख पत्र से हमारा तात्पर्य उन साधनों से है जिनका उपयोग साख मुद्रा के रूप में किया जाता है साख पत्र के आधार पर ऋण आदान-प्रदान होता है यह वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय विक्रय में वस्तु के माध्यम का कार्य करते हैं अतः साख पत्र ठीक मुद्रा की तरह कार्य करते हैं लेकिन मुद्रा एवं साख पत्र में एक प्रमुख अंतर यह है कि मुद्रा कानूनी ग्रहृ होते हैं जबकि साख पत्र की कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं रहता है 

साख पत्र कई प्रकार के होते हैं a. चेक b. विनिमय बिल c. बैंक ड्राफ्ट d.हुंडी. e. प्रतिज्ञापत्र f. यात्री चेक g. पुस्तकीय साख तथा h. साख प्रमाण पत्र 

चेक - चेक सबसे अधिक प्रचलित साख पत्र है चेक एक प्रकार की लिखित आदेश है जो बैंक में रुपया जमा करने वाला अपने बैंक को देता है उसमें लिखित रकम उसे लिखित व्यक्ति को दे दी जाए। 

बैंक ड्राफ्ट – बैंक ड्राफ्ट वह पत्र है जो एक बैंक अपनी किसी शाखा या अन्य किसी बैंक को आदेश देता है कि उस पत्र में लिखी हुई रकम उसमें अंकित व्यक्ति को दे दी जाए बैंक ड्राफ्ट के द्वारा आसानी से कम खर्च में ही रुपया एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जा सकता है बैंक ड्राफ्ट देसी तथा विदेशी दोनों ही प्रकार का होता है। 

यात्री चेक - यात्रियों की सुविधा के लिए यात्री चेक बैंकों के द्वारा जारी किया जाता है। कोई भी यात्री बैंक में निश्चित रकम जमा कर देने पर यात्री चेक प्राप्त कर सकता है या यात्री चेक पत्र पर एक निश्चित रकम छपी रहती है यात्री बैंक की किसी भी शाखा से यात्री चेक प्रस्तुत कर मुद्रा प्राप्त कर सकता है इस चेक पर यात्री के हस्ताक्षर के नमूने भी अंत अंकित रहते हैं इसके चलते कोई दूसरा व्यक्ति रुपया नहीं प्राप्त कर सकता है 
प्रतिज्ञा पत्र - यह भी एक प्रकार का साख पत्र होता है इस पत्र में ऋणी की मांग पर एक निश्चित अवधि के बाद उसमें अंकित रकम ब्याज सहित देने का वादा किया जाता है 
समाप्त