PATNA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
PATNA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली अध्याय 2 (क ) 10 वी एवं सभी प्रतियोग्याता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स

THE ART WORLD



अध्याय 2 (क )
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली 


सत्ता की साझेदारी से तात्पर्य है कि उसकी जिम्मेदारी ऊपर से नीचे तक बांटी होती है। सत्ता के शक्तियां किसी एक बिंदु पर ही सिमटने नहीं पाती, वह विभिन्न रूपों में बट जाती है । भारत का उदाहरण ले तो यहां केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक अधिकार और कर्तव्य पूर्णता बड़े होते हैं 
सत्ता के साझेदारी का एक रूप
1. कार्यपालिका 2. न्यायपालिका 3. व्यवस्थापिका मे बांटा हुआ होना भी है 
न्यायपालिका यह देखती है कि कोई किसी के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर पाते राज्य सरकारें जिला से लेकर ग्राम पंचायतों तक सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था करती है नगर निगम, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर परिषद, जिला परिषद, पंचायत समिति ग्राम पंचायत आदि इसी के उदाहरण है ।

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्व रखती है ?
सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में बहुत अधिक महत्व रखती है । इसी के चलते कोई किसी को दबाकर नहीं रख सकता, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की एकमात्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें ताकत सभी के हाथों में होती है। सभी को राजनीतिक शक्तियों में हिस्सेदारी या साझेदारी करने की व्यवस्था रहती है। इसका महत्व विशेषताएं इस बात में है कि किसी को असंतोष प्रकट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । यदि बहुमत आपके साथ है तो अर्थ है कि सभी आपसे संतुष्ट है यदि किसी को केंद्र में मौका नहीं मिलता  वो राज्य के शासन में साझेदारी कर सकता है । यदि वह इसमें भी असफल हो जाता है , तो स्थानीय निकायों में अपना भाग आजमाता है यदि वहां भी उसे जीत नहीं मिलती इसका अर्थ है कि जनता उसे इस काबिल नहीं समझती | भले ही वह विरोध का झंडा लहराते रहे | 
सत्ता की साझेदारी के अलग अलग तरीके क्या है ?
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता के भागीदार के रूप में कई स्तर देखने को मिलता है जिनमें चार प्रमुख रुप हैं- 
सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का विभाजन सरकार के तीन अंग होते हैं विधायिका ,  कार्यपालिका एवं न्यायपालिका
किसी एक अंग में सत्ता केंद्रित नहीं कर के सरकार ने तीनों अंगों के बीच जब सत्ता का विभाजन कर दिया जाता है तब उसे शक्तियों का पृथक्करण कहते हैं । इससे किसी एक अंग के द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावना नहीं रहती । एक ही स्तर पर आकर सरकार के तीनों अंग अपनी-अपनी सत्ता का प्रयोग करते हैं इस आधार पर इसे सत्ता का क्षेत्रीय विभाजन कहा जाता है।इससे सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन बना रहता है इसे नियंत्रण एवं संतुलन व्यवस्था भी कहते हैं। 
विभिन्न स्तरों पर संगठित सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी बड़े लोकतांत्रिक शासन एक जगह से नहीं चलाया जा सकता है । सामान्यता शासन व्यवस्था को तीन स्तरों पर विभाजित किया जाता है राष्ट्रीय स्तर पर, केंद्र स्तर पर तथा प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर पर । सत्ता का विभिन्न स्तरों पर गठित सरकारों के बीच बीच विभाजन कर दिया जाता है । भारत में भी दो स्तरों पर सरकार का गठन की व्यवस्था की गई है केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार  संविधान द्वारा सरकार तथा राज्य सरकार के बीच सत्ता का विभाजन कर दिया गया इस उद्देश्य तीन सूचियां बनाई गई हैं संघ सूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची। 

विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं विभिन्न धर्म के लोग रहते हैं अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं जिसको दो आधारों पर मुख्यता बांटा जाता है।अल्पसंख्यक  एवं बहुसंख्यक सत्ता का बंटवारा अल्पसंख्यक समुदाय और बहुसंख्यक समुदाय दोनों के बीच कर दिया जाता है । विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता के विभाजन होने से आपसी एकता बनी रहती है 

सत्ता का साझेदारी का प्रत्यक्ष रुप तब दिखता है 
जब दो या दो से अधिक दल मिलकर चुनाव लड़ती है या सरकार का गठन करती है ।
सत्ता में भागीदारी की आवश्यकता– सत्ता के भागीदारी की आवश्यकता लोकतंत्र में सफल संचालन में सहायक होता है सत्ता में भागीदारी राजनीतिक व्यवस्था को दृढ़ता प्रदान करती हैं एवं विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का विभाजन करके आप आपसी टकराव को कम किया जाता है ।

भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी? 
हमारे भारत में विभिन्न जाति धर्म संप्रदाय भाषा परंपरा और संस्कृति के लोग निवास करते हैं एकात्मक संविधान की व्यवस्था पर उन्हें एकता के सूत्र में नहीं मान सकता था भारत जैसे विशाल भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी  
भारत की संघीय शासन व्यवस्था की किन्हीं विशेषताओं का उल्लेख करें  
भारत की संघात्मक व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं- 
· दोहरी सरकार 
· अधिकार क्षेत्र अलग अलग 
· स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका 
· संविधान की सर्वोच्चता 
· संविधान के मौलिक प्रावधानों में संवैधानिक संशोधन द्वारा ही परिवर्तन 
· छत्रिय विविधताओं का सम्मान 
लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का क्या अर्थ है ?
भारतीय संविधान द्वारा एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई है इसका उद्देश्य समाजवादी समाज की स्थापना करके जनता के जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करना है लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई योजनाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित कराने का प्रयास किया जाता है  
                                                                                        संविधान की सर्वोच्चता संघीय शासन व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि मेरे सरकारी अधिकारियों की सरकार ने संविधान के ऊपर नहीं है सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक बनाया गया है  
संघीय शासन व्यवस्था की एक विशेषता यह है कि इसमें क्षत्रिय विविधताओं का पूरा सम्मान किया जाता है  राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति के उद्देश्य के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दोनों स्तरों की सरकारों के बीच सत्ता विभाजन की व्यवस्था पर समाहित सहमति हो राष्ट्रीय एकता बनी रहे इसलिए केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है  राज्य सरकारों को वह उसके कार्यों के बारे में निश्चित और जोरदार आदेश दिया गया है , तथा विकास की दिशा में समग्र प्रगति करने की बात कह कर राष्ट्रीय एकता के आधार को मजबूत किया गया है 
संघ राज्य का अर्थ 
संघ राज्य का अर्थ है - सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण इस तरह के राज्य के लिए पूरे देश की एक सरकार केंद्र सरकार होती है और राज्य प्रांतों के लिए अलग-अलग केंद्र और राज्यों के बीच संविधान में उल्लेखित सत्ता शक्ति का स्पष्ट बंटवारा रहता है  राज्य के नीचे भी सत्ता के साझेदार रहते हैं जिसे स्थानीय स्वशासन कहते हैं । सत्ता के इसी बंटवारे को संघराज्य संघवाद कहते हैं 
सत्ता की साझेदारी की कार्यप्रणाली को हम दो भागों में बांट सकते हैं संघात्मक शासन व्यवस्था अर्थात दोहरी सरकार एकात्मक शासन व्यवस्था अर्थात इकहरी सरकार | 
संघीय शासन व्यवस्था की पांच मुख्य विशेषताएं 
ü संघीय शासन व्यवस्था में सरकार दो या अधिक स्तर वाली होती है 
ü प्रत्येक स्तर की सरकार का अपना अपना अधिकार क्षेत्र होता है 
ü इसके अंतर्गत अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है 
ü वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए संघीय शासन व्यवस्था में प्रत्येक स्तर की सरकार के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित हैं 

शासन के संघीय और एकात्मक स्वरूपों में अंतर

संघीय शासन

एकात्मक शासन

संघीय शासन व्यवस्था में सरकार के विभिन्न स्तरों में सत्ता की साझेदारी होती है जैसे केंद्र व राज्य सरकार के बीच सत्ता की साझेदारी 

एकात्मक शासन व्यवस्था में शासन की संपूर्ण शक्ति केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के हाथ में होती है  

संघीय शासन व्यवस्था में के केंद्र में राष्ट्रीय अथवा राज्यों के मुद्दे होते हैं 

एकात्मक सत्ता हमेशा सत्ता के केंद्रीयकरण पर बल देती है  

संघीय शासन व्यवस्था में केंद्र व गैर केंद्रीय सरकार के बीच संविधान के अनुसार सत्ता का स्पष्ट विभाजन होता है कनाडा ब्राजील तथा संयुक्त राज्य अमेरिका आदि संघीय शासन व्यवस्था के उदाहरण है 

एकात्मक शासन व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई प्रावधान नहीं होता इटली फ्रांस जापान आदि एकात्मक शासन व्यवस्था के कुछ उदाहरण है 


समाप्त 

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी अध्याय 1 (ख ) वर्ग 10 के लिए (धर्म और सांप्रदायिकता की परिभाषा और विश्लेषण )

i'msonuamit

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

अध्याय 1 (ख )
खंड (क) के लिए क्लीक करे link01

धर्म और सांप्रदायिकता
यह मानना कि धर्म ही समुदाय या समुदाय का गठन करता है, तो यहीं से संप्रदाय को राजनीति से जोड़कर उसे सांप्रदायिकता की संज्ञा दी जाने लगती हैं। लेकिन वास्तविक रूप से संप्रदाय और धर्म का एक भाग है l  जैसे वैदिक धर्म अर्थात तथाकथित हिंदू धर्म में 3 संप्रदाय वैष्णव शैव तथा शाक्त संप्रदाय हैं तो इस्लाम में शिया और सुननी, बौद्ध धर्म मैं हीनयान और महायान ईसाइयों में कैथोलिक तथा प्रोस्टेट आदि। 
                                                धर्मों के अंदर इसी अंतर पर परस्पर के संघर्ष को संप्रदायिकता कहते हैं लेकिन राजनीतिज्ञों की भाषा में दो धर्मों के बीच टकराव को सांप्रदायिकता का नाम दिया जाता है l  यह अवधारणा अत्यंत गलत है जो देश में अस्थिरता पैदा करती है इसे रोकने का प्रयास होना चाहिए।

वास्तव में सांप्रदायिकता राजनीतिक दलों की स्वार्थ परक तथा अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्म को ही नहीं समझने की भावना का विकास करती है इसका घृणित परिणाम सांप्रदायिक हिंसा है । भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है यह सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है। 

सांप्रदायिकता का सही अर्थ है अपने धर्म को अन्य धर्मों से ऊंचा मानना। अपने धार्मिक हितों के लिए अपने राजनीतिक हितों के लिए राष्ट्रीय हित का बलिदान कर देना भी संप्रदायिकता है संप्रदायिकता धर्म के नाम पर गिरना फैलाती है यह विष के समान है जो मानव को मानव से घृणा करना सिखाता है इस संकुचित मनोवृति के कारण एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म के अनुयायियों अथवा एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं इस प्रकार संप्रदायवाद एक संकीर्ण विचारधारा है जो एक विशेष समुदाय का अन्य समुदाय के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने का निर्देश देती है। 

राजनीति में धर्म एक समस्या के रूप में खड़ी हो जाती है जब 
1. धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है 
2. राजनीतिक में धर्म धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय विशेष के विशिष्टता के लिए की जाती है 
3. राजनीति किसी धर्म विशेष के दावे का पक्ष पोषण करने लगती हैं 
4. किसी धर्म विशेष के अनुयाई दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। 
हम यह भी कह सकते हैं की राजनीतिक में धर्म को इस्तेमाल करना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। 

भारत में धर्मनिरपेक्ष शासन की अवधारणा 
सांप्रदायिकता भारत की आधारभूत चुनौतियों में से एक है किंतु हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को स्थान देकर इसे सिरे से नकारना कर दिया है संवैधानिक उपबंध ों में से निम्नलिखित महत्वपूर्ण है 
राष्ट्र  में किसी भी धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया है भारत किसी भी धर्म को विशेष धर्म का दर्जा नहीं देता है। 
                                            संविधान भारत के हर नागरिक को यह छूट देता है कि वह किसी भी धर्म को अपने विश्वास के आधार पर स्वीकार या अंगीकार कर सकता है धर्म के आधार पर किसी को भी उसके कोई अधिकार या अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता कोई भी स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म का पालन शांतिपूर्ण ढंग से प्रचार प्रसार कर सकता है तथा इस उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों को स्थापित कर संचालित कर सकता है। 

लैंगिक विभाजन और राजनीति 
जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी जानेवाली असमान प्राथमिकताओं से है। 

पुरुष और स्त्री के जैविक घर बनावट में लैंगिक विभिन्नता आती है इसका सही तात्पर्य पुरुष और स्त्री में अंतर है यद्यपि भारत में स्थानीय निकायों में स्त्रियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू हो चुकी है किंतु विधायक या सांसद में अपनी सदस्यता की मांग के लिए महिलाओं के संगठन प्रयासरत है और पुरुष प्रधान भारतीय समाज इसे मानने के लिए तैयार नहीं दिखता यद्यपि घर के कामों से लेकर कृषि कार्य तक में महिलाओं की भागीदारी कोई गम नहीं यह अब हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं यहां तक कि अब यह सेना में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। 

भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति 
भारत के लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 859 तो जरूर हो गई है किंतु यह अभी भी 11% से कम है विकसित राष्ट्रों की भी विधायिकाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अपर्याप्त है ब्रिटेन में 19.3 प्रतिशत अमेरिका में 16.3% इटली में 16.1% आयरलैंड में 16.2% तथा फ्रांस में 13.9 प्रतिशत है भारत में अधिकांश महिला सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है या कुछ मामलों में आपराधिक भी इस बात को प्रमाणित करती है कि सामान्य महिलाओं के लिए अभी भी विधायिका की दहलीज दूर है। 

विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा 
सांप्रदायिकता किसी भी धर्म समुदाय को वह अधिकार देती है जिससे वह अपने आप को प्रमुख राजनीतिक में बनाए रखना चाहते हैं कभी-कभी बहुसंख्यक धर्माराम भी धर्मावलंबी एक जुट होकर अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने हेतु अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को मटियामेट कर देने वाली नीतियां बना देते हैं या बनवा देते हैं श्रीलंका में सिंधियों के बहुसंख्यक धर्मवाद ने बहुसंख्यकवाद का रूप लेकर सिंहली भाषा को एकमात्र राज्य भाषा घोषित करवा डालना शिक्षा और नौकरी में सीनियर को प्राथमिकता दिलवा देना बहुत ही धर्म के संरक्षण हेतु कदम उठाना निश्चय ही अल्पसंख्यक को स्वतंत्रता घाट पहुंचाने वाला कदम था 

सांप्रदायिकता राजनीति गोलबंदी को पैदा करती है इसके लिए संप्रदाय के गुरुओं मुल्लाओं द्वारा पवित्र प्रतीकों का अनुचित उपयोग धर्म गुरुओं द्वारा भावनात्मक अपील आदि सांप्रदायिकता के अन्य रूप हैं कभी जामा मस्जिद के मौलाना बुखारी द्वारा किसी विशेष राजनीतिक दल संप्रदाय के लोगों को वोट के लिए अपील उनका एक बेहतर उदाहरण है 
                                                           संप्रदायिकता अपने भयानक रूप में तब राजनीतिक में उभरती है जब वह हिंसा दंगा और नरसंघार को जन्म देती है भारत में अपने विभाजन को भी एक सांप्रदायिकता के आधार पर एक कलंक पूर्ण विभाजन माना है। आजादी के बाद भी कई जगह दंगे हुए गुजरात का गोधरा कांड दिल्ली का सिख दंगा इसके ज्वलंत उदाहरण है। 
भारत में किस तरह जातिगत असमानताएं जारी है 
भारत के श्रम विभाजन के आधार पर जातिगत असमानताएं जारी है जैसा कि कुछ अन्य देशों में भी है भारत की तरह दूसरे देशों में भी पेशा के आधार पर लगभग वंशानुगत ही हैं पैसा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वता चला जाता है इसी पर आधारित सामुदायिक व्यवस्था ही जाति का रुप ले लेती है या व्यवस्था जब अस्थाई हो जाती है तब वह श्रम विभाजन का अतिवादी रूप कल आने लगती है वास्तव में ऐसे ही हम जाति के नाम से जाने लगते हैं खासकर शादी विवाह और अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट रूप से बिक जाता है इस प्रकार भारत में सदियों से जातिगत असमानताएं जारी है। 

अल्पसंख्यक कौन है 
चाय भाषा के आधार पर ही हो या संस्कृति के अल्पसंख्यक शब्द को भारतीय संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है देश की कुल जनसंख्या के आधे से भी कम जनसंख्या वाले समुदाय को अल्पसंख्यक कहते हैं इस संदर्भ में 1991 की जनगणना के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय भारत की कुल जनसंख्या का 17.0% है राज्य सरकार अल्पसंख्यकों की इस तरह राज्य स्तर पर क्षेत्रीय या स्थानीय अल्पसंख्यकों की बात भी उठाती है इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की अवधारणा राज्य स्तरीय अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है इसका अर्थ यह है कि यदि कोई समुदाय या वर्ग किसी अन्य विशेष में कुल मिलाकर बहुमत में हो तो वह भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक हो सकते हैं तथा इसके विपरीत स्थिति भी हो सकती है। 

भारत की राजनीतिक पर लैंगिक धार्मिक संप्रदाय तथा जातीय विभेद के प्रभावों का वर्णन करें 
लैंगिक विभेद का अर्थ है समाज का लिंग महिला तथा पुरुष के आधार पर बंटवारा समाज में लगभग 48% स्त्रियां हैं प्रारंभ में उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त थे परंतु धीरे-धीरे उनकी दशा खराब होती चली गई लैंगिक विभेद के कारण आज विश्व भर में राजनीति में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कम है अमेरिका में 20.2% यूरोप में 96.6 तथा एशिया के देशों का औसत मात्र 11.7 प्रतिशत है भारत में लोकसभा में सिर्फ 11% राज्यसभा में 9 पॉइंट 3% महिलाएं हैं भारत के राज्य विधानमंडलों में तो यह 4% ही हैं भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में संसद और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा किया है परंतु यह विधेयक अभी संसद में लंबित है l 
                                        धार्मिक एवं सांप्रदायिक प्रभाव आधुनिक युग में धर्म और राजनीति का गहरा संबंध है धर्म के आड़ में राजनीति का घिनौना खेल खेला जा रहा है कुछ राजनीतिक दलों का गठन भी किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है धार्मिक आवंटन नहीं संप्रदायवाद का रूप ले लिया है सांप्रदायिकता के कारण ही भारत का विभाजन हुआ था। 

जातीय विभेद का प्रभाव राजनीतिक में जाति का प्रभाव निम्नलिखित रुप से देखने को मिलता . 
1. राजनीतिक दल अपने अपने जाति आधारित बोर्ड बैंकों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का चयन करते हैं। 
2. सरकार बनाते समय भी सत्तारूढ़ दल अपने प्रांतीय राष्ट्र के जाति आधारित प्रतिनिधित्व का पूरा ख्याल रखते हैं 
3. राजनीतिक में जाति का प्रभाव के कारण ही पिछड़ी जाति के लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ती जा रही है या उनका मानना है कि बिना सत्ता हासिल किए हुए उनका कल्याण संभव नहीं है। 
4. राजनीतिक दल भी चुनावों के समय जाति आधारित भावनाओं को उकसाने का प्रयास करते हैं। 
भ्रूण हत्या से आप क्या समझते हैं? 
वर्तमान में अत्याधुनिक उपकरणों से गर्भ में ही शिशु के लिंग की जानकारी प्राप्त कर ली जाती है और पुत्री के जन्म होने की जानकारी होने पर गर्भ में ही उसकी हत्या कर दी जाती है इसे ही भ्रूण हत्या करते हैं। 

महिलाओं के सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं? 
महिलाएं आज राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी पिछड़ी हुई है नारियों के विकास के बिना समाज के विकास की बात करना असंभव है अतः महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागृत होना महिला सशक्तिकरण है। 

नोट:- सभी विद्यार्थियों से आग्रह है की इस क्लास नोट्स को अत्यंत ध्यानपूर्वक पढ़े। बहुत संभव है कि शब्दों में त्रुटी हो, हालाकि नोट्स को लिखते वक़्त हर संभव त्रुटि रहित रखने का प्रयास किया गया है। धन्यवाद्
 

कृषि ( अध्याय -7) वर्ग 10 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स

i'msonuamit


कृषि

Agriculture

भूमिका- वर्तमान समय में भारत कृषि के दृष्टिकोण से एक संपन्न राष्ट्र है। जिस में भारत के लगभग 60% लोग कृषि कार्यों में संलग्न है। यहां विस्तृत समतल भूमि , संपन्न मृदा, अनेक प्रकार के फसलों के लिए उपयुक्त खुली धूप तथा लंबा वर्धन काल से युक्त विविध जलवायविक दशाएं पाई जाती हैं ।हिमालय से निकलने वाली सतत् वाहिनी नदियों में ग्लेशियर के पिघलने से वर्षभर पर्याप्त जल रहता है। इस कारण भारत की कृषि संपदा को प्रकृति का अनूठा उपहार मिला है। 
   वहीं दूसरी तरफ, भारत में 85% से अधिक कृषि वर्षा पर निर्भर है और भारतीय मानसून के स्वभाव के कारण कृषि निर्धारण में वर्षा का बहुत महत्व है। अधिकांश भागों में वर्षा वर्ष में तीन चार महीने ही होती है और वह भी असामान तथा और अनियमित । इस कारण अधिकांश क्षेत्र में साल में एक ही फसलें उगाई जाती है ।जल की कमी के कारण भारत के अधिकांश क्षेत्रों में शुष्क खेती का प्रचलन है।वर्षा की सहायता से विकसित कृषि प्रणाली को शुष्क कृषि (Dry agriculture)कहते हैं।
कृषि किसे कहते हैं?
कृषि का अर्थ है फसल उत्पन्न करने की प्रक्रिया; फसल उत्पादन, पशुपालन आदि की कला, विज्ञानं और तकनीक को कृषि कहते हैं। भूमि के उपयोग द्वारा फसल उत्पादन करने की क्रिया और प्रक्रिया को कृषि कहते हैं। कृषि एक प्राथमिक कार्य है जिसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ती करना है।
भारतीय कृषि की विशेषताएं (महत्व)
भारतीय कृषि की पांच प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं- 
1. भारतीय कृषि आर्थिक जीवन का प्लान है भारत में लगभग दो-तिहाई लोग की जीविका कृषि पर आधारित है
2. भारत के विशाल जनसंख्या के लिए भोजन कृषि से ही प्राप्त होता है।
3. यहां की कृषि से कच्चे माल उद्योगों को प्राप्त होते हैं।जैसे कपास सूती वस्त्र उद्योग चीनी गन्ना उद्योग झूठ झूठ उद्योग एवं अन्य कृषि उत्पाद कृषि प्रसंस्करण उद्योग को कच्चा माल देते हैं। जैसी रसदार फल जेली जैन स्वतंत्र उत्पादन के लिए आधार प्रदान करते हैं। इस तरह की कृषि उद्योगों की मजबूती प्रदान करती है।
4. यहां की जलवायु मिट्टी एवं धरातल की विविधता के कारण भारत में फसलों की विविधता भी पाई जाती है। चाय, गन्ना,मोटे अनाज एवं कुछ तिलहनों के उत्पादन का विश्व में अग्रणी स्थान है ।
5. राष्ट्रीय में भारतीय कृषि का मुख्य योगदान है देश की 18% आय कृषि से प्राप्त होती है। 


भारत में कृषि भूमि उपयोग
कृषि पर आश्रित लोगों के लिए भूमि अत्यंत ही महत्वपूर्ण संसाधन है क्योंकि यह पूरी तरह भूमि पर निर्भर है। इसलिए ग्रामों में भूमि हीनता और गरीबी के बीच संबंध देखने को मिलता है।फसलों के उत्पादन में भूमि की गुणवत्ता का भी व्यापक महत्व होता है, जबकि अन्य आर्थिक क्रियाकलाप जैसे कि उद्योग, परिवहन,आवास में इसका उतना महत्व नहीं है।
           स्थाई संपत्ति होने के कारण भूमि का सामाजिक महत्व भी है। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कर्ज के लिए इसे गिरवी रखा जा सकता है। भूमि ही इन सब लाभों से वंचित रह जाते हैं। 

कृषि योग्य भूमि में 4 तरह की भूमि सम्मिलित की जाती हैं-

a.शुद्ध बोया गया क्षेत्र
b.चालू परती भूमि
c.अन्य परती 
d.कृषि योग्य भूमि 
भूमि उपयोग में परिवर्तन निम्न दो कारणों के चलते हुआ है-
1. जनसंख्या में वृद्धि- देश की जनसंख्या में वृद्धि स्वभाविक है और बढ़ती जनसंख्या के लिए निवास और बस्तियों के निर्माण में पर्याप्त भूमि का उपयोग किया जाता है।
2.उद्योगों का विकास- उद्योगों के विकास में उनकी स्थापना तथा परिवहन के लिए सड़क रेल मार्ग बनाने तथा औद्योगिक बस्तियों के निर्माण में काफी मात्रा में कृषि भूमि का उपयोग किया जाता है।
शस्य गहनता
एक ही कृषि वर्ष में एक ही भूमि पर एक से अधिक फसलों को उठाकर कुल उत्पादन में वृद्धि करना ही शस्य गहनता कहलाता है।

उदाहरण द्वारा इसे समझा जा सकता है-कि यदि आपके पास 3 हेक्टेयर भूमि है।1 वर्ष में धान की फसल बो कर धान उपजाते हैं । उसके बाद रबी के समय उसी 3 हेक्टेयर में गेहूं बो कर गेहूं का उत्पादन करते हैं। फिर जायद के समय कम अवधि में तैयार होने वाली मूंग की फसल बो कर उसकी कटाई कर लेते हैं। 1 वर्ष में तीन बार फसलों का उत्पादन होने से भूमि का 3×3=9 हेक्टेयर उत्पादक जमीन में परिवर्तित हो गया। 
शस्य गहनता को प्रभावित करने वाले कारक
-सिंचाई , उर्वरक , उन्नत बीज , यंत्रीकरण, कीटनाशक 
कृषि उत्पादन का उचित मूल्य
भारत में शुद्ध बोए गए क्षेत्र के बढ़ने की संभावना बहुत ही कम है। लेकिन सबसे घंटा ही वह विकल्प है जिससे भारत में कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
भारत के अधिकांश भागों उष्णकटिबंधीय जलवायु होने के कारण यहां पर यहां पर तापमान और प्रकाश रहता है। वर्षा का वितरण सभी जगह समान नहीं है रहने के कारण आद्रता कृषि के प्रकार और फसलों के प्रकार तथा उत्पादन निर्धारण करने वाली महत्वपूर्ण कारक हो जाता है। जब फसल केवल बरसा द्वारा प्राप्त नमी के आधार पर पैदा की जाती है तब इसे वर्षा पोषित कृषि या वर्षातील कृषि करते हैं यह कृषि दो प्रकार की होती है- शुष्क भूमि कृषि एवं आद्र भूमि कृषि। 
आंद्रा भूमि कृषि- 75 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में होने वाले कृषि को आद्र भूमि कृषि कहते हैं।
शुष्क भूमि कृषि-75 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्र में होने वाले कृषि को शुष्क भूमि कृषि करते हैं।
                                        भारतीय कृषि कुल लगभग 35% भूमि पर वर्षा दिन कृषि होती है मोटे अनाज दाल तिलहन कपास  वर्षा अधीन फसलों के उदाहरण हैं।
शुष्क भूमि कृषि की विशेषताएं-
1.वर्षा जल को संरक्षित करने की विधियों का प्रयोग किया जाता है ताकि शुष्क समय में इसका उपयोग किया जा सके।
2.आवश्यकता से अधिक जल को भूमिगत जल के पुनर्भरण के लिए संरक्षित रखा जाता है।
3. शुष्क होने  कारण यहां की मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा बहुत कम होती है।
4.शुष्क होने  के कारण मिट्टी की ऊपरी परत का वायु द्वारा कटाव होता है।
5.शुष्क भूमि कृषि अधिकांश था गरीब किसान करते हैं जिनके पास उन्नत कृषि करने के लिए पूंजी एवं आवश्यक साधन का अभाव होता है। 
6.कृषि द्वारा यहां आए कम प्राप्त होता है जिसकी क्षतिपूर्ति पशुपालन द्वारा की जाती है । अब जनसंख्या वृद्धि के दबाव के कारण यहां के चारागाहो को खेतों में बदला जा रहा है l 
गरीब किसान उत्थान के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजना
1.समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, सूखा प्रवण क्षेत्र विकास कार्यक्रम, रोजगार के बदले अनाज कार्यक्रम ,नरेगा आदि
2.शीघ्र तैयार होने वाली फसलों का बीज तैयार किया जा रहा है।
3.कृषि की नई तकनीक का विकास।
4.जल छीजन एवं संग्रहण के पत्नी का प्रचार प्रसार।
5.पशुपालन एवं मुर्गी पालन के कृषि के पूरे अंग के रूप में विकसित किया जा रहा है।
6.कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योगों को विकसित किया जा रहा है।
7.अर्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) तथा केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (जोधपुर) शुष्क भूमि एवं अन्य कृषि से संबंधित समस्याओं के निदान के लिए कार्यरत हैं।

कृषि के प्रकार
विश्व में कृषि विभिन्न तरीकों से की जाती है भौगोलिक दशाओं, उत्पाद की मांग, श्रम और प्रौद्योगिकी के स्तर के आधार पर कृषि दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत की जा सकती है ये हैं निर्वाह कृषि और बाणिज्यिक कृषि ।

निर्वाह  कृषि
इस प्रकार की कृषि कृषक परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए की जाती है। पारंपरिक रूप से कम उपज प्राप्त करने के लिए निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी और पारिवारिक श्रम का उपयोग किया जाता है। निर्वाह कृषि को पुनः गहन निर्वाह कृषि और आदिम निर्वाह कृषि में वर्गीकृत किया जा सकता है।
                                         गहन निर्वाह कृषि में किसान एक छोटे भूखंड पर साधारण औज्ञारों और अधिक श्रम से खेती करता है। अधिक धूप वाले दिनों से युक्त जलवायु और उर्वर मृदा वाले खेत में, एक वर्ष में एक से अधिक फ़सलें उगाई जा सकती हैं। चावल मुख्य फ़सल होती है। अन्य फ़सलों में गेहूँ, मक्का, दलहन और तिलहन शामिल हैं। गहन निर्वाह कृषि दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले मानसूनी प्रदेशों में प्रचलित है।
 में स्थानांतरी कृषि और चलवासी पशुचारण शामिल हैं।
                                                                                    आदिम निर्वाह कृषि  अमेजन बेसिन के सघन वन क्षेत्रों, उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी-पूर्वी भारत के भागों में प्रचलित है। ये भारी वर्षा और वनस्पति के तीव्र पुनर्जनन वाले क्षेत्र हैं। वृथों को काटकर और जलाकर भूखंड को साफ़ किया जाता है। तब राख को मुदा में मिलाया जाता है तथा मक्का, रतालू, आलू और कसावा जैसी फ़सलों को उगाया जाता है। भूमि की उर्वरता की समाप्ति के बाद वह भूमि छोड दी जाती है और कृषक नए भूखंड पर चला जाता है। स्थानांतरी कृषि को *कर्तन एवं दहन' कृषि के रूप में भी जाना जाता है।

चलवासी पशुचारण- साहारा के अर्धशुष्क और शुष्क प्रदेशों में, मध्य एशिया और भारत के कुछ भागों जैसे राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में प्रचलित है। इस प्रकार की कृषि में पशुचारक अपने पशुओं के साथ चारे और पानी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर निश्चित मागों से घूमते हैं। इस प्रकार की गतिविधि जलवायविक बाधाओं और भूभाग की प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न होती है। पशुचारक मुख्यतः भेड़, ऊँट, मवेशी, याक और बकरियाँ पालते हैं। ये पशुचारकों और उनके परिवारों के लिए दूध, मांस, ऊन खाल और अन्य उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।
वाणिज्यिक कृषि
वाणिज्यिक कृषि में फ़सल उत्पादन और पशुपालन बाजार में विक्रय हेतु किया जाता है। इसमें विस्तृत कृष्ट क्षेत्र और अधिक पूँजी का उपयोग किया जाता है। अधिकांश कार्य मशीनों के द्वारा किया जाता है। वाणिज्यिक कृषि में वाणिज्यिक अनाज कृषि, मिश्रित कृषि और रोपण कृषि शामिल हैं l 
वाणिज्यिक अनाज कृषि में फ़सलें वाणिज्यिक उद्देश्य से उगाई जाती हैं। गेहूँ और मक्का सामान्य रूप से उगाई जाने वाली फ़सलें हैं। उत्तर अमेरिका, यूरोप और एशिया के शीतोष्ण घास के मैदान वाणिज्यिक अनाज कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र सैकड़ों हेक्टेयर के बड़े फार्मों से युक्त बिरल आबादी वाले हैं। अत्यधिक ठंड वर्धनकाल को बाधित करती है और केवल एक ही फ़सल उगाई जा सकती है।

मिश्रित कृषि में भूमि का उपयोग भोजन व चारे की फ़सलें उगाने और पशुधन पालन के लिए किया जाता है यह यूरोप पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित है।
रोपण कृषि : रोपण कृषि एक विशेष प्रकार की झाड़ी कृषि अथवा वृक्ष कृषि है। इसे 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने प्रारंभ किया था। यह एकल फसल कृषि है। इसमें रबर, चाय, कहवा, कोको, मसाले, नारियल और फलों की फसलें जैसे- सेब, को अंगूर, संतरा, आदि उगाई जाती हैं। इस प्रकार की कृषि में अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। इसके लिए कुशल प्रबंध, तकनीकी ज्ञान, मशीनों, उर्वरकों, सिंचाई और परिवहन सुविधाओं का होना आवश्यक है। कई रोपण कृषि क्षेत्रों जैसे चाय, कहवा और रबर बागानों या उनके निकट ही उन्हें संसाधित करने की फैक्टरी लगी होती हैं। इस प्रकार की कृषि उत्तर-पूर्वी भारत के पर्वतीय क्षेत्रों, पश्चिम - बंगाल के उप-हिमालयी क्षेत्रों, तथा प्रायद्वीपीय भारत की नीलगिरि, की अनामलाई व इलायची की पहाड़ियों में की जाती है।
शस्य प्रारूप
भारत में कृषि की तीन प्रमुख ऋतुएँ हैं जिनमें ये फसलें उगाई जाती हैं
(i) खरीफ-मॉनसूनपूर्व की ऋतु, जिसमें खेत जोतकर धान की रोपाई के लिए खेतों में बीज डाल दिए जाते हैं और वर्षा की प्रतीक्षा की जाती है। वर्षा शुरू होते ही कृषिकार्य जोर पकड़ने लगता है। जून-जुलाई में फसलों की खेती आरंभ होती है और मॉनसूनी वर्षा की समाप्ति तक फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। धान, ज्वार-बाजरा, मकई, मूँगफली, जूट, कपास और अरहर (इस दलहन को पकने में अधिक समय लगता है) की फसलों की खेती इसी ऋतु में की जाती है। ये खरीफ फसलें कहलाती हैं।
(ii) रबी -वर्षाऋतु के बाद और जाड़ा आरंभ होने पर जिन फसलों की खेती की जाती है, वे रबी फसलें कहलाती हैं, जैसे-गेहूँ, चना, मटर, सरसों आदि। यह ऋतु रबी की ऋतु कहलाती है, जिसमें नवंबर में बुआई और अप्रैल-मई में इन फसलों की कटाई की जाती है।
(iii) जायद-कुछ फसलें सिंचाई के बल पर अल्प अवधि में ही पैदा की जाती हैं, जैसे-मूंग और उड़द। भारत में विभिन्न ऋतुओं में फल और सब्जियों की भी खेती की जाती है। मार्च से जून तक की अल्पावधि में भी सिंचाई सुविधा के क्षेत्रों में कुछ फसलें उगाई जाती हैं, परंतु मुख्यतः सब्जियाँ और कुछ  ग्रीष्मकालीन फल- नाशपाती, खरबूजा, तरबूज इत्यादि की खेती प्रमुख रूप से होती है। इस फसल ऋतु को जायद (zaid) कहते हैं।
भारत के कुछ भागों में इस प्रकार की फसल ऋतुएँ नहीं हैं। जलवायु, मिट्टी इत्यादि की स्थानीय स्थिति के अनुसार, फसलों का उत्पादन किया जाता है, जैसे तमिलनाडु में धान की फसल तब बोई जाती है जब उत्तर भारत में उसकी कटाई हो रही होती है।
हरित क्रांति क्या है? 
उत्तर-1967-68 में कृषि उत्पादन बढ़ाने और देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई प्रयास किए गए l  जिसके अन्तर्गत जोत भूमि का विस्तार, नए संकर बीजों का प्रयोग, उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहन, मृदा संरक्षण एवं भूमि सुधार का कार्यक्रम चलाया गया, सिंचाई का विस्तार और कृषि में नई तकनीकों को अपनाया गया। इस प्रयास में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में गेहूँ एवं धान के उत्पादन में जो वृद्धि हुई, जो सफलता मिली इसे ही हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार के प्रयास और तकनीक का प्रयोग कर पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी गेहूँ और चावल के उत्पादन में वृद्धि की गयी l 
भारत में पशुओं के प्रारूप की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां एक 100 सेंटीमीटर की सम वर्षा रेखा हैl  देश को दो बड़े कृषि क्षेत्र में बांटती  है। 100cm से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में चावल जबकि 100 cm से कम वर्षा वाला क्षेत्र में गेहूं प्रमुख फसल है।
इन दो प्रमुख कृषि क्षेत्र के बीच एक क्षेत्र संक्रमण का क्षेत्र है।भारत में शुष्क क्षेत्र का एक विशिष्ट फसल प्रारूप है। यहां प्रमुख फसल ज्वार बाजरा मूंगफली तिलहन और दाल है।
मुख्य फसलें- भारत में कृषि की विजेता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक है वर्षा की मात्रा, मिट्टी के प्रकार, कृषि पद्धति विविधता आदि ।  इनके फल स्वरुप भारत में विविध फसलें उगाई जाती हैं इनमें प्रमुख धान गेहूं मकई , ज्वार, बाजरा, तिलहन- दलहन, पेय फसल, रेशे की फसल, उगाई जाती है।
चावल
हमारे यहाँ कि प्रमुख खाद्यान्न फसल है जिस पर अधिकांश जनसंख्या निर्भर करती है। विश्व का 22% चावल क्षेत्र भारत में है तथा यह कुल कृषि भूमि का 23% । चावल की कृषि के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ निम्नांकित हैं (1) तापमान : यह उष्ण कटिबंधीय फसल है अतः इसकी उपज के लिये अधिक तापमान की आवश्यकता है। इसके लिये कम से कम 24° सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता है। बोते समय इसे 21°C, बढ़ते समय 24°C तथा पकते समय 27°C तापमान की आवश्कता होती है। 
(1) वर्षा - इसकी फसल के लिये 125 सें०मी०-200 सेंमी० वर्षा की आवश्यकता होती इससे कम वर्षा वाले क्षेत्र में सिंचाई की सहायता से फसल उगाई जाती है। 
(i) मिट्टी - इसके लिये अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसकी मिट्टी चीकायुक्त दोमट होनी चाहिए ताकि पौधे की जड़ अच्छी तरह विकसित हो सके। है। 
(iv) श्रम - इसकी कृषि में मानव श्रम की अधिक आवश्यकता होती है। खेत की तैयारी से लेकर रोपनी-कटनी तक का कार्य मानव श्रम द्वारा ही संपादित होता है। भारत के सस्ते श्रमिक इसकी कृषि के लिए अनुकूल मानवीय वातावरण बनाते हैं । 
उत्पादन तथा वितरण : भारत का अधिकांश चावल जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र में तथा डेल्टाई एवं तटीय भागों में उत्पन्न किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह हिमालय पर्वत की निचली घाटियों में सीढ़ीनुमा खेतों में तथा दक्षिणी पठार के कुछ घाटी क्षेत्रों में भी उगाया जाता है।
सतलज-गंगा के मैदान में सिंचाई की सहायता से चावल की कृषि ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके मुख्य उत्पादक राज्य प० बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, केरल, तमिलनाडु आदि है। प० बंगाल में चावल की तीनों ही किस्में उपजाई जाती हैं।
गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों की विवेचना करें।
उत्तर मेहँ- गेहूँ दूसरी महत्त्वपूर्ण खाद्य फसल है। गेहूँ शीतोष्ण फसल है। चावल की तरह ही चीन के बाद भारत गहूँ का दूसरा उत्पादक देश है। इसकी निम्नलिखित दशाएँ उपयुक्त हैं 
(1) फसल- रबी अनाज की फसल। (वर्षा- 75 सेमी से कम। फसल कटते समय वर्षा हानिकारक है।
(2)तापमान- बोते समय ठंडा तथा आर्द्र तापमान आवश्यक है। तापमान 10 cm से 15 cm तक होना चाहिए। गहूँ काटते समय तापमान 20cm से 30cm के मध्य होना चाहिए।
(3) मृदा दोमट मिट्टी। जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। (v) उत्पादक राज्य गेहूँ की कृषि भारत के उत्तरी पश्चिमी भागों तक सीमित है जैसे: पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान, उत्तरी गुजरात तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश।
मोटे अनाज : ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले प्रमुख मोटे अनाज हैं। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से ज्वार भारत का तीसरा महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न है। 18° से 32° से. औसत मासिक तापमान इसके उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसके लिए लगभग 30 से 60 से.मी. वर्षा की आवश्यकता होती है। ज्वार के प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश हैं।
बाजरा 
बाजरा भी शुष्क और उष्ण जलवायु की फसल है। इसके उत्पादन की जलवायु दशाएं ज्वार के समान ही हैं। बाजरा का सर्वप्रमुख उत्पादक राज्य राजस्थान है। बाजरा के अन्य उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा हैं।
रागी
रागी वर्षा पर निर्भर एक खरीफ फसल हैं। इसे अच्छे जल निकास वाली जलोढ़ दुमट और लाल या काली बलुई दुमट मिट्टियों की आवश्यकता होती है। इसके लिए आवश्यक जलवायु दशाएं बाजरा के समान ही हैं। यह कर्नाटक और तमिलनाडु के शुष्क भागों में उगाई जाती हैं।
मक्का : यह एक मोटा अनाज है। इसका उपयोग खाने और चारे, दोनों के लिए होता है। इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु दशाओं और मिट्टियों में उगाया जाता है। यह मुख्यतः खरीफ की फसल है। मक्का 50 से 100 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की मदद से उगाई जाती है। इसके लिए 21° से. 27° तक तापमान की आवश्यकता होती है। इसे अच्छे जल निकास वाली मिट्टी चाहिए। मक्का देश के कुल कृषि क्षेत्र के 4 प्रतिशत भाग पर उगाई जाती है। मक्का उत्पादन के प्रमुख राज्य कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश हैं।
दालें: 
भारत में अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और हमारे भोजन में दाल प्रोटीन का स्रोत है। तूर (अरहर), उड़द, मूंग, मसूर, मटर और चना भारत की मुख्य दलहनी फसलें हैं। दालों के उत्पादन में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है, जिस अनुपात में अनाजों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। वस्तुतः कुल फसल क्षेत्र में दालों की खेती का प्रतिशत घट गया है। दालों को कम नमी की आवश्यकता होती है अतः इन्हें शुष्क परिस्थितियों में भी उगाया जा सकता है और 90% तक इसकी खेती मुख्यतः शुष्क कृषि तकनीक के अंतर्गत की जाती है। तूर (अरहर) को छोड़ कर बाकी अन्य दालें. वायु से नाइट्रोजन ले कर भूमि को उर्वर बनाती है। अतः इनको आम तौर पर अन्य फसलों के साथ फसल आवर्त्तन में रोपा जाता है। दालें खरीफ तथा रबी दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है-अरहर, मूंग, उड़द आदि खरीफ की फसलें हैं जबकि चना, मटर, मसूर आदि रबी की फसलें हैं। दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय दाल विकास कार्यक्रम भी 1986-87 में शुरू किया गया, पर इसके परिणाम संतोषजनक नहीं है।
जारी .........

रोजगार एवं सेवा ( अध्याय 5 ) (वर्ग 10)

i'msonuamit

 




 ( अध्याय 5 

रोजगार एवं सेवा


किसी देश की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका रोजगार होता है  l जब कोई व्यक्ति अपने परिश्रम एवं शिक्षा के आधार पर जीविकोपार्जन के लिए धन एकत्रित करता है अर्थात आर्थिक क्रियाकलाप कर वह अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं जैसे रोटी कपड़ा और मकान प्राप्त कर सके रोजगार कहलाता है l 
अपने परिश्रम व शिक्षा के आधार पर कमाया गया धन को जब पूंजी के रूप में व्यवहार किया जाता है और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश किया जाता है तो सेवा क्षेत्र उत्पन्न होता है अतः रोजगार एवं सेवाएं एक दूसरे के पूरक है अर्थात रोजगार वृद्धि से सेवा क्षेत्र का भी विस्तार होता है l 


रोजगार एवं सेवा में क्या संबंध है

रोजगार एवं सेवाओं में घनिष्ठ संबंध है आर्थिक समृद्धि के साथ सेवा क्षेत्र अब देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इसमें रोजगार की संभावनाएं निरंतर बढ़ती जा रही है l  इस क्षेत्र के अंतर्गत ऐसी अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन संभव है विगत वर्षों के अंतर्गत संचार सेवाओं के प्रसार से सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई हैl भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है, जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर है कृषि पर इस अत्यधिक जनभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है l 

श्रम बल तथा कार्य बल में अंतर

 समाज के जो व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन कर सकते हैं वही श्रमबल का निर्माण करते हैं परिवार के बच्चे एवं बूढ़े तथा मानसिक  शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति इन क्रियाओं में शामिल नहीं होते हैं इसके अतिरिक्त हम श्रमबल में से ऐसे व्यक्तियों को निकाल देते हैं जो परिवारिक अधिकारियों में व्यस्त हैं या कार्य करने के लिए इच्छुक नहीं है इसका अभिप्राय यह है कि जो व्यक्ति वास्तविक रुप से आर्थिक क्रियाकलापों में लगे हैं अथवा उन्हें करने के योग्य हैं वह सभी श्रम बल के सदस्य हैं इसके विपरीत जो इन क्रियाओं में वस्तुतः लगे हुए हैं उन्हें कार्य बल के रूप में जाना जाता है कार्य बल तथा श्रम बल के अंतर को बेरोजगार श्रमबल कहते हैं जनसंख्या के द्वारा ही प्राकृतिक एवं पूंजीगत साधनों के सहयोग से सकल राष्ट्रीय उत्पाद का सृजन होता है 

आर्थिक विकास का क्षेत्र

रोजगार एवं सेवाएं आर्थिक विकास के विकास और विस्तार से उपलब्ध होती है आर्थिक विकास के मुख्य रूप से तीन क्षेत्र हैं A. कृषि क्षेत्र B. उद्योग क्षेत्र C. सेवा क्षेत्र्

कृषि क्षेत्र

भारत एक कृषि प्रधान देश है कृषि क्षेत्र पर कुल जनसंख्या का लगभग 70%  बोझ अत्यधिक जनसंख्या के कारण कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर छीन  हो गया है फल स्वरुप कृषि क्षेत्र में छिपी हुई बेरोजगारी एवं अन्य बेरोजगारी पाए जाने लगे हैं जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ खेती  के लिए जमीन में वृद्धि नहीं हो पा रहा है और एक ही भूखंड पर आने वाली नई पीढ़ी भी जुड़ता जा चला जा रहा है जिससे उत्पादन की मात्रा प्रति व्यक्ति पर घटता चला जा रहा है

उद्योग क्षेत्र

रोजगार का दूसरा क्षेत्र उद्योग क्षेत्र है इस क्षेत्र के माध्यम से भी रोजगार की प्राप्ति की जा रही है देश की औद्योगिक विकास की गति में तेजी आने के द्वारा ही औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार की वृद्धि होती है

सेवा क्षेत्र

सेवा क्षेत्र को ही आर्थिक विकास का तृतीय क्षेत्र कहा जाता है सेवा क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में 55.1 प्रतिशत योगदान है जबकि कृषि एवं उद्योग का मात्र 44.9 प्रतिशत आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के कारण सेवा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिलती है सेवा क्षेत्र रोजगार का एक व्यापक क्षेत्र है जिसके अंतर्गत आए दिन मानव संसाधन के लिए व्यापक पैमाने पर रोजगार उपलब्ध होने लगे है

सेवा क्षेत्र का महत्व बताएं

आर्थिक विकास एवं रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यधिक महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवा में परिवहन संचार विज्ञापन वाणिज्य तथा सभी प्रकार के सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है विकसित देशों का अधिकांश कार्य बल सेवा क्षेत्र में कार्यरत है इस क्षेत्र की सेवाओं में इन देशों की आर्थिक विकास को बहुत प्रोत्साहन मिला है

                  वर्तमान समय में भारत का सेवा क्षेत्र बहुत विकसित नहीं है लेकिन आज भी हमारे सकल राष्ट्रीय उत्पाद में क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक है  कृषि के यंत्रीकरण एवं आधुनिक औजरो के प्रयोग से क्षेत्र में रोजगार के अवसर क्रमशः कम हो रहे हैं इसके फलस्वरुप ग्रामीण जनसंख्या रोजगार की खोज में शहरों में पलायन हो रहा है परंतु हमारे देश का औद्योगिक क्षेत्र में बहुत विकसित नहीं है आर्थिक विकास के साथ ही विनी विनिर्माण उद्योग में भी रोजगार के अवसर का विस्तार होगा लेकिन पूंजी तथा अत्याधुनिक तकनीक के अभाव में औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर में बहुत तेजी से वृद्धि होने की संभावना नहीं है यही कारण है कि आप सभी विकासशील देश रोजगार के नए अवसरों के सृजन के लिए सेवा क्षेत्र को महत्व देने लगे l 

                                                         हमारे देश तथा राज्य के लिए सेवा क्षेत्र का विशेष महत्व है इस छेत्र में की जाने वाली विभिन्न प्रकार की संरचनात्मक सेवाओं और सुविधाओं एक अर्थव्यवस्था को क्रियाशील बनाती है उदाहरण के लिए कच्चे माल मशीन यंत्र को कारखाना तक पहुंचाने तथा उत्पादित वस्तुओं को बाजार तक ले जाने के लिए यातायात के साधन आवश्यक है उसी प्रकार शक्ति औद्योगिक उत्पादन का आधार है आधुनिक उद्योगों के मुख्यता मशीनों का प्रयोग होता है जो शक्ति अथवा बिजली से संचालित होते हैं संरचनात्मक और सेवाओं के अभाव में कृषि एवं उद्योग किसी भी क्षेत्र का विकास संभव नहीं है l 

                                                           भारत एक विकासशील देश के आर्थिक विकास के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की आवश्यकता है उन्हें पूंजी निवेश करना चाहते हैं उद्योग व्यवसाय के लिए सड़क बिजली पानी आदि कि सुविधाएं उपलब्ध है।

सेवा क्षेत्र के भाग

सेवा क्षेत्र को सामान्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-
सरकारी सेवा जब देश व राज्य की सरकार लोगों को काम करने के बदले मासिक वेतन देती है इनसे विभिन्न क्षेत्रों में काम लेती है तो उसे सरकारी सेवा कहा जाता है सरकारी सेवा के कुछ व्यापक क्षेत्र का उदाहरण है इस प्रकार है जनसेवा रेल सेवा वायु यान सेवा स्वास्थ्य वा वित्त सेवा शिक्षा सेवा बस सेवा कृषि सेवा अभियंत्रण सेवा बैंकिंग सेवा आदि।
गैर सरकारी सेवा
जब सरकार अपने द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों को गैर सरकारी संस्थानों के सहयोग से लोगों तक पहुंचाने का काम करती है अथवा लोग स्वयं अपने प्रयास से ऐसी सेवाओं का सृजन से लाभान्वित होते हैं तो उसे गैर सरकारी सेवा कहा जाता है इस क्षेत्र के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं बैंकिंग सेवा दूरसंचार सेवा यातायात सेवा स्वास्थ्य सेवा स्वरोजगार सेवा आदि।
रोजगार सृजन में सेवाओं की भूमिका आज विश्व का लगभग सभी देशो में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र की उत्पादक विधियों एवं तकनीक में परिवर्तन हो रहे हैं इन परिवर्तनों से सेवा क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित किया है सेवा क्षेत्र अब किसी देश का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हो गया है तथा इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना निरंतर बढ़ती जा रही है 

भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का मात्र 22 प्रतिशत योगदान होता है जबकि देश की लगभग 70% जनसंख्या अपने जीवन यापन के लिए इसी पर निर्भर करती हैं कृषि पर से इस अत्यधिक आभार को कम करने के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है क्षेत्र के अत्यधिक ऐसे अनेक व्यवसाय हैं जिनमें अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश के द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार सेवा क्षेत्र की पारंपरिक सेवाओं में परिवहन जिनमें शिक्षा एवं सेवाओं को भी सम्मिलित किया जाता है यह बड़े बड़े पैमाने पर रोजगार की व्यवस्था करती है तथा आर्थिक विकास के साथ-साथ में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है भारत की परिवहन सेवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह हमारे देश के माल ढोने और यात्री परिवहन के साधन है सुरक्षा सेवाओं के बाद रेल देश के सबसे अधिक लोगों को रोजगार प्रदान कराता है हमारा देश विश्व की सबसे बड़ी सड़क प्रणाली वाले देशों में एक है लेकिन अभी भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क की बहुत कमी है तथा ग्रामीण क्षेत्र के निर्माण बहुत अधिक रोजगार सृजन संभव है ग्रामीण क्षेत्र में सड़क का विकास प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत किया जा रहा है इस योजना के उद्देश्य से सभी गांव को सड़क से जोड़ना है जिनकी आबादी 500 से अधिक है जहाजरानी और विमान सेवाएं हमारे देश के अन्य परिवहन साधन है तथा आर्थिक विकास के साथ ही इन सेवाओं में भी रोजगार के अवसर में वृद्धि हुई है।
    वर्तमान में रोजगार सृजन की दृष्टि से संसार सेवाएं भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं डाक सेवक टेलीग्राफ टेलीफोन रेडियो संचार के साधन है इसका प्रयोग कर रहे हैं परंतु विगत वर्षों के अंतर्गत संचार उपग्रहों के प्रयोग से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं क्षेत्र में टेलीफोन मोबाइल इंटरनेट सेवाओं का प्रयोग होने लगा है इसके परिणाम स्वरुप क्षेत्र में रोजगार के अवसर में वृधि हो गया हैं।

· राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार के द्वारा रोजगार सृजन करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिसका क्रियान्वन राज्य सरकार के द्वारा भी किया जा रहा है जिसमें सरकार के द्वारा रोजगार हेतु निम्न प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही है सरकार के द्वारा चलाई गई योजना 

· काम के बदले अनाज 14 नवंबर 2004
· राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम 1980
· ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण का कार्यक्रम 1979
· ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम 1983 
· समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम 20 अक्टूबर 1890
· जवाहर रोजगार योजना 1889 
· स्वयं सहायता समूह
· नरेगा
आउटसोर्सिंग किसे कहते हैं ?

विगत वर्षों के अंतर्गत सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का बहुत तेजी से विकास हुआ है ।आज दूर संचार सुविधाओं द्वारा पूर्व की अपेक्षा विभिन्न देशों से संपर्क स्थापित करना तथा सूचनाओं का आदान प्रदान करना शुरू हो गया है अतः अब हम अपने देश में रहकर भी विश्व के अन्य देशों को अपनी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं इससे सेवा क्षेत्र को बहुत विस्तार हुआ है तथा अन्य वस्तुओं के समान हैं इस क्षेत्र के उत्पादन का भी निर्यात होने लगा है ,जब कोई कंपनी अपने उत्पादन से संबंधित सेवाएं अन्य स्रोतों अथवा देशों से प्राप्त करती है तो उसे आउटसोर्सिंग कहते हैं हमारे देश में शर्म सस्ता होने के कारण विकसित देशो के अन्ए काव्य अपनी सेवाओं का भारत में आउटसोर्सिंग करने लगी है एक विदेशी फॉर्म द्वारा अपनी पुस्तक के डिजाइन छपाई आदि के कार्य हमारे देश में करवाना आउटसोर्सिंग का उदाहरण है।

 भारत विश्व को सेवा प्रदाता के रूप में

21 वीं शताब्दी के विश्व के सेवा क्षेत्र में भारतीय श्रम पूंजी का महत्व पूर्ण योगदान रहा है । हमारे देश के निवासी बहुत पहले से उत्तरी अमेरिका ऑस्ट्रेलिया ब्रिटेन आदि विकसित देशों में जाकर अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे हैं आज भारत को विश्व का अग्रणी युवा देश कहा जाता है जहां संपूर्ण जनसंख्या में ऊर्जावान युवा वर्ग की संख्या अधिक हो गई है यह विकास की गति को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है अपने देश में अफसरों की कमी तथा उन देशो का उच्च जीवनस्तर है भारतवासियों को विकसित देशों में जाने के लिए प्रेरित करता है 

उदारीकरण के कारण विश्व के सेवाक्षेत्र में जो विकास की गति आई है इसका लाभ सभी देशों को प्राप्त होने के अवसर आने लगे हैं इस दृष्टिकोण से आज विश्व के औद्योगिक विकसित देश अपने उत्पाद एवं सेवाओं के विभिन्न कामों को संपादन व से लेकर आने लगे हैं जहां उपलब्ध होती है उदाहरण के लिए इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में से अधिक का उत्पादन चीन तथा कोरिया में होता है और भारत में भी डाबर कंपनी अपने उत्पाद के कम करने के लिए अपने पड़ोसी देश नेपाल में कारखाना खोल रखे हैं जहां श्रम शक्ति शक्ति है जब बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने संबंधित सेवाएं अपनी कंपनी के जारी किया विदेशी समूह से प्राप्त करती है तो ऐसे सेवाओं को आउटसोर्सिंग कहा जाता हैं ।

सेवा क्षेत्र के विकास में बुनियादी सुविधाएं की भूमिका

सेवा क्षेत्र का संबंध मनुष्य की आवश्यकताएं और सुख सुविधाओं से है आर्थिक विकास एवं आय में वृद्धि के साथ ही इस क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मांग बढ़ती है लेकिन इस क्षेत्र का विकास मुख्य रूप से मानव है तत्वों पर निर्भर है तथा इसके विकास का विस्तार के लिए मानवीय संसाधनों का विकास आवश्यक है योगी कुशल एवं प्रशिक्षण के अभाव में सेवा क्षेत्र का विकास संभव नहीं है एक सक्षम श्रम बल का निर्माण करने के लिए कुछ बुनियादी एवं आधारभूत सुविधाएं आवश्यक है इस प्रकार की सुविधाएं श्रम बल की कार्यकुशलता को बढ़ाती है इन सेवाओं और सुविधाओं में निम्नलिखित महत्वपूर्ण है

वित्त (finance) बैंकिंग क्षेत्र बीमा क्षेत्र अन्य सरकारी विद्या क्षेत्र वित्त क्षेत्र 
ऊर्जा (energy) कोयला विद्युत रेल पेट्रोलियम गैस गैर-पारंपरिक ऊर्जा एवं अन्य।
यातायात (transport) रेलवे सड़कें वायुयान जलयान
संचार (communication) दाक तार टेलीफोन टेली संचार मीडिया एवं अन्य।

गैर आर्थिक संरचना से मनुष्य की क्षमता एवं उत्पादकता में वृद्धि कर अप्रत्यक्ष रुप से उत्पादक एवं अंततः आर्थिक विकास में सहायता प्रदान किया जाता है

शिक्षा (education) मानवीय संसाधनों के विकास की दृष्टि से शिक्षा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है एक उपयुक्त एवं तर्क संगत शिक्षा प्रणाली से देश में कुशल और योग्य श्रम शक्ति का निर्माण होता है और हमारे उत्पादन क्षमता बढ़ती है उचित शिक्षा नागरिकों को मनो बुद्धि ज्ञान एवं क्षमताओं का विकास करो से अधिक योग्य सक्षम तथा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरुप बनाती है केवल व्यक्ति ही नहीं वरन समाज के विकास में भी शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है उचित शिक्षा द्वारा आर्थिक विकास के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं तथा राष्ट्र और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है यही कारण है कि सरकार द्वारा शिक्षा को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है ।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मानव संसाधनों के विकास के लिए स्वास्थ्य सेवाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है हमारे देश में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं ही एक सक्रिय श्रम शक्ति का निर्माण करती है किसी भी व्यक्ति की सतत कार्य करने की क्षमता बहुत आंसुओं में उस के स्वास्थ्य की दशा पर निर्भर है एक स्वस्थ व्यक्ति ही उत्पादन कार्य में सक्रिय रुप से भाग लेकर उत्पादन में वृद्धि कर सकता है वस्तुतः स्वास्थ्य का अधिकार नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है यही कारण है कि हमारे राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवाओं को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य संक्रामक एवं गैर संक्रामक रोगों के उपचार के साथ ही परिवार कल्याण एवं पोषाहार कार्यक्रम का विस्तार करना है पिछले पांच दशक के अंतर्गत भारत में सरकारी एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों में एक वृहद स्वास्थ्य संरचना का निर्माण हुआ है परंतु स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सुविधाओं में वृद्धि होने पर भी इनकी उपलब्धता हमारी आवश्यकताओं की तुलना में बहुत कम है.

आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाए मानवीय संसाधनों के विकास के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के समान ही आवाज तथा कुछ अन्य सुविधाओं की समुचित व्यवस्था भी आवश्यक है परंतु भारत में आवास एवं अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार बहुत निम्न है आवास तथा स्वच्छता जलापूर्ति जैसी सेवाओं का भाव निर्धन वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करता है क्योंकि वे अपने सीमित साधनों से स्वयं की व्यवस्था करने में असमर्थ होते हैं या भारतीय श्रमिकों की कार्य क्षमता कम करने का एक प्रधान कारण है।

सेवा क्षेत्र के विकास की विवेचना कीजिए

हमारा मानवीय संसाधनों के विकास तथा सेवा क्षेत्र के विस्तार में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है 21वीं सदी को ज्ञान की सदी के रूप में देखा जा रहा है भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं एक महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने सेवाओं को लोगों की संपत्ति कहा है विगत वर्षों के अंतर्गत हमारे देश में भी संचार एवं सूचना सेवाओं के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है यह शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले सुधार तथा ज्ञान एवं कौशल के विकास का ही परिणाम है हमारे देश के लिए शिक्षा का महत्व इस कारण और बढ़ जाता है कि भारत की में युवा शक्ति का विशाल भंडार है इनकी उचित शिक्षा और प्रशिक्षण द्वारा हम सेवा क्षेत्र में भविष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं शिक्षा और प्रशिक्षण के तीन मुख्य अंतर है प्रारंभिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा तथा उच्च एवं तकनीकी शिक्षा प्रारंभिक शिक्षा युवा वर्ग को न्यूनतम एवं आधारभूत कौशल सिखाती है प्रारंभिक शिक्षा का हमारी उत्पादक क्रियाओं का पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है यही कारण है कि इस प्रकार की शिक्षा को हमारे देश में सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है भारत सरकार की नई शिक्षा नीति की घोषणा 1986 में हुई थी जिसे 1992 में मैं अद्यतन किया गया इस नीति के अंतर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने इसे सर्व सुलभ कराने प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा बालिका शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व के अनुसार 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना राज्य का दायित्व है जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित कर दिया गया है 

प्रारंभ एवं माध्यमिक शिक्षा के साथ ही हमारे देश के एक बहुत बड़े समुदाय को माध्यमिक शिक्षा देने की भी व्यवस्था है आर्थिक विकास एवं संरचनात्मक सुविधाओं को बनाए रखने के लिए हमें बहुत बड़ी मात्रा में प्रशिक्षित श्रम की आवश्यकता पड़ती है माध्यमिक शिक्षा द्वारा ही इस प्रकार की श्रम शक्ति का निर्माण होता है सरकार ने वर्ष 1986 में प्रत्येक जिले में औसतन एक नवोदय विद्यालय स्थापित करने की योजना प्रारंभ की है इसका उद्देश्य मुख्यता ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली छात्रों को अच्छे स्तर की आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है माध्यमिक शिक्षा को व्यवसाय पर बनाने के लिए कुछ चुने हुए संस्थानों में व्यवसायिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं

उच्च शिक्षा के अंतर्गत हमारे सामान्य शिक्षा के साथ ही तकनीकी शिक्षा शामिल है चिकित्सा इंजीनियरिंग पशु विज्ञान कृषि शिक्षा प्रबंधन विधि शिक्षा आदि को तकनीकी शिक्षा की संज्ञा दी जाती है भारत में उच्च शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है इसके लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश उसकी गुणवत्ता में सुधार राज्य सभा क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रमों में संशोधन शिक्षा के व्यवसायीकरण तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी के विस्तार की नीति अपनाई गई है।

· मानव पूंजी के मुख्य घटक-भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य,शिक्षा
आर्थिक मंदी का भारत के सेवा क्षेत्र पर प्रभाव

किसी भी अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियां सदस्य नहीं रहती है तथा इसमें समय-समय पर उतार चढ़ाव होते रहते हैं मंडी एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यवसाय क्रियाएं सामान्य स्तर के नीचे रहती हैं इसके परिणाम स्वरुप उत्पादन एवं आ इ की मात्रा में गिरावट आने लगती है श्रमिक और उत्पादक के अन्य साधन बेरोजगार हो जाते हैं तथा मजदूरों की दरों में कमी हो जाती है विश्व स्तर पर इस प्रकार की मंदी सर्वप्रथम 1930 में हुई या मंदी संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रारंभ हुई जिनसे विश्व के प्राय सभी देशों को प्रभावित किया व्यापार के विस्तार में अब विश्व के विभिन्न निर्देश एक दूसरे के से जुड़ गए हैं चीन से अमेरिका सबसे समृद्ध देश की आर्थिक मंदी से हराया सभी देश प्रभावित हुए थे वर्तमान मंदी का प्रभाव 2008 में अमेरिका से हुआ जिसे सेवा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ है उपभोक्ता की मांग कम हो जाने के कारण बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ भी कम हो गया है और वह श्रमिकों की छटनी कर रहे हैं इसे भारत भी प्रभावित हुआ है तथा हमारे सेवा क्षेत्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है इससे निजी क्षेत्र के उद्योग एवं व्यवसाय में स्थिरता आई है श्रमिकों की छटनी हुई है यहां के तकनीकी कर्मचारी की विदेशों में कम हो गई है परंतु अमेरिका और यूरोप के देश की अपेक्षा भारत इसे कम प्रभावित हुआ है इसका मुख्य कारण वित्तीय संस्थाओं तथा पूंजी बाजार पर सरकार का प्रभाव पूर्ण नियंत्रण है।

इंद्रा आवास योजना


1985 1986 से सरकार द्वारा इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासी हरिजन एवं भूमिहीन श्रमिकों के लिए आवास अर्थात रहने के मकान की व्यवस्था की जा रही है जिसे इंदिरा आवास योजना की संज्ञा दी गई है

सेवा क्षेत्र की महत्व बताएं
आर्थिक विकास तथा रोजगार की दृष्टि से सेवा क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है इस क्षेत्र की सेवाओं में परिवहन संचार विपणन वाणिज्य तथा सभी प्रकार की सरकारी एवं गैर सरकारी सेवाओं को सेवाओं को सम्मिलित किया जाता है l 

-----------------------------------------------------------------------
For the education news or study material, you  follow us on Instagram , Facebook , Telegram , Youtube , Hindi blog
----------------------------------------------------------------------
Head office- Saraswati bhawan, Mohanpur, Punaichak, near pump house, patna- 800023
Phone number- +917667130597