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पंचायती राज व्यवस्था : बिहार ( ग्राम पंचायत, ग्राम कचहरी, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम, महापौर एवं उपमहापौर, नगर आयुक्त)

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 पंचायती राज व्यवस्था : बिहार 

पंचायत हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह हमारी गहन सूझ-बुझ के आधार पर व्यवस्था-निर्माण करने की क्षमता की परिचायक है। यह हमारे समाज में स्वाभाविक रूप से समाहित स्वावलम्बन, आत्मनिर्भरता एवं संपूर्ण स्वंतत्रता के प्रति निष्ठा व लगाव का घोतक है।
                  देश में पंचायत राज को सशक्त बनाने, व्यवस्थित विकास की जिम्मेदारी देने तथा लोकोपयोगी बनाने के लिए राष्ट्र तथा राज्य स्तर पर कई कमिटियों का गठन किया गया।इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण बलवंत राय मेहता कमिटी, अशोक मेहता तथा सिंधवी कमिटी हैं। 
                                                            
राष्ट्रीय स्तर पर पंचायती राज्य प्रणाली की विधिवत शुरुआत बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा ओं के आधार पर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से हुई थी 1959 में ही आंध्र प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई उसके बाद अन्य राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था के स्थापना होने लगी | 

‘‘स्थानीय स्वशासन एक ऐसा शासन है, जो अपने सीमित क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करता हो।’’

                                भारत एक विशाल जनसंख्या वाला लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की मूल भूत मान्यता है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में होनी चाहिए । सभी  व्यक्ति इस व्यवस्था से प्रत्यक्षत: जुडंकर शासन कार्य से सम्बद्ध हो सकें इस प्रकार का अवसर स्थानीय स्वशासन ब्यवस्था द्वारा संभव हो सकता है। स्थानीय स्वशासन जनता द्वारा शासन स्थानीय स्वशासन कहलाता है। स्थानीय स्वशासन के दो क्षत्रे है। (1) ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्र। पंचायती राज ग्रामीण व्यवस्था एवं नगरपालिका नगरीय व्यवस्था को कहा जाता है ।

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन 

भारत में प्राचीन काल से ही भिन्न-भिन्न नामों से पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी के प्रभाव से पंचायती राज व्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया गया। 1993 में 73 वां संविधान संशोधन करके पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता दी गयी  है।

  1. पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होगी। इसमें एक या एक से अधिक गाँव शामिल किये जा सकते है। 
  2. ग्राम पंचायत कर शाक्तियों के सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल द्वारा कानून बनाया जायेगा । जिन राज्यों की जनसंख्या 20लाख से कम है वहॉ दो स्तरीय पंचायत (जिला व ग्राम ) का गठन किय जायेगा  । 
  3. सभी स्तरों की पंचायतो के सभी सदस्यों का चुनाव ‘वयस्क मताधिकार’ के आधार पर पांच वर्ष के लिए किया जायेगा । 
  4. ग्राम स्तर के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्षत: तथा जनपद व जिला स्तर के अध् यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जायेगा । 
  5. पंचायत के सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए उनके सख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जायेगा । 
  6. महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा । 
  7. पांच वर्ष के कार्य काल के पूर्व भी इनका (पंचायतो का) विघटन किया जा सकता है। परन्तु विघटन की दशा में 6 माह के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यकता होगा। 

 ग्राम पंचायत

‘पंचायत’ का शब्दिक अर्थ पाँच पंचो की समिति से है। प्राचीन काल में गाँव के झगड़ों का निपटारा पाँच पंचो की समिति द्वारा किया जाता था। इसी व्यवस्था से पंचायत शब्द का जन्म हुआ। ग्राम पंचायतो का मुख्य उद्देश्य गाँवो की उन्नति करना और ग्राम वासियों का आत्म-निर्भर बनाना है। प्राय: अधिकांश राज्यो के गाँवो में एक ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और न्याय पंचायत होती है।

बिहार पंचायती राज अधिनियम 2000 द्वारा ग्राम पंचायतों का गठन किया गया है अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि बिहार सरकार के आदेश से जिला दंडाधिकारी जिला गजट में अधिसूचना निकाल कर किसी स्थानीय क्षेत्र को जिससे कोई गांव या निकटस्थ  गांव के समूह अथवा किसी गांव के भाग को ग्राम पंचायत घोषित कर सकता है इस क्षेत्र की जनसंख्या लगभग 7000 के करीब होगीl अधिनियम में जिलाधिकारी को यह अधिकार दिया गया है कि वह ग्राम पंचायत में किसी गांव को या उसके विभाग को अलग कर सकता है या उसमें शामिल ही कर सकता है l एक पंचायत क्षेत्र लगभग 500 की आबादी पर वार्डों में विभक्त होता है जिसकी संख्या सामान्यता 15 से 16 तक होती है |

  1. ग्राम सभा गांव के वयस्क नागरिकों को मिलाकर बनायी जाती है। 
  2. ग्राम पंचायत में एक सरपंच, एक उप-संरपच और कुछ पंच होते है ये सभी गा्रम सभा द्वारा चुने प्रतिनिधि होते है। 
  3. न्याय पंचायत का चुनाव सम्बन्धित ग्राम पंचायत करती है। न्याय पंचायत केवल ग्रामीणों के निम्न स्तर के दीवानी और फौजदारी विवादों को सुनती है, न्याय पंचायतों एक निश्चित धन राशि तक जुर्माना वसलू सकती है। किन्तु कारावास की दण्ड नही दे सकती। 

ग्राम पंचायत के कार्य- 

गांव के विकास के लिए बहुत सारे कार्य ग्राम पंचायत के अधीन होते हैं, ग्राम पंचायत इन कार्यों को अपनी जिम्मेदारी से कार्यान्वित करता है| ग्राम पंचायत के कार्य अग्रलिखित हैं-
1- ग्राम पंचायत कृषि संबंधी कार्य की रूपरेखा तैयार करती है और कृषि संबंधी व्यवधानों को अपने स्तर पर ठीक करती है|
2- ग्राम पंचायत गांव के चतुर्मुखी विकास की जिम्मेदारी का निर्वहन करती है|
3- ग्राम पंचायत प्राथमिक विद्यालय, उच्च प्राथमिक विद्यालय व अनौपचारिक शिक्षा संबंधी कार्य करती है|
4- युवा कल्याण सम्बंधी कार्यों की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आती है|
5- राजकीय नलकूपों की मरम्मत व रखरखाव का कार्य ग्राम पंचायत करती है|
6- ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बंधी कार्य की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की होती है|
7- ग्राम पंचायत महिला एवं बाल विकास सम्बंधी कार्य को करती है|
8- पशुधन विकास सम्बंधी कार्य
9- समस्त प्रकार की पेंशन को स्वीकृत करने व वितरण का कार्य ग्राम पंचायत का होता है|
10- छात्रों को प्राप्त समस्त प्रकार की छात्रवृत्तियों को स्वीकृति करने व वितरण का कार्य ग्राम पंचायत का होता है|
11- राशन की दुकान का आवंटन व निरस्तीकरण ग्राम पंचायत के कार्यों के अंतर्गत आती है|
12- पंचायती राज सम्बंधी ग्राम्यस्तरीय कार्य आदि।

ग्राम पंचायत के आय के साधन- 

राज्य व्यवस्थापिका पंचायतों को टैक्स लगाने एवं उनसे प्राप्त धन को व्यय करने का अधिकार देती है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त होता है। इस आय व्यय का जांच करने के लिए वित्त आयोग गठित है जो अपनी रिपार्ट प्रति 5 वर्ष में राज्यपाल को देगा। जिलाधीश को पंचायतों का निरीक्षण एव समय से पवूर् भंग करने का अधिकार दिया गया है।

 ग्राम पंचायत के प्रमुख अंग

ग्राम पंचायत के 4 अंग होते हैं 1.ग्राम सभा 2.मुखिया 3.ग्राम रक्षा/दलपति 4.ग्राम कचहरी
ग्राम सभा ग्राम सभा पंचायत की व्यवस्थापिका सभा हैl ग्राम पंचायत क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्क स्त्री पुरुष जो 18 वर्ष से अधिक उम्र के हैंl ग्राम सभा के सदस्य होंगे ग्राम सभा की बैठक वर्ष भर में कम से कम 4 बार होगी मुखिया ग्राम सभा की बैठक  बुलाएगा और उसकी अध्यक्षता करेगा l

ग्राम रक्षा दल का गठन

सामान्य पहरा, निगरानी एवं आकस्मिक घटनाओं जैसे अगलगी, बाढ़, बांध में दरार, महामारी, चोरी, डकैती आदि का सामना करने,सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने तथा सरकार द्वारा समय-समय पर सौंपे गये कार्यों को सम्पादित करने हेतु विहित रीति से एक दलपति की नियुक्ति की जाएगी।

एक दलपति के अधीन प्रत्येक ग्राम पंचायत के अंतर्गत एक ''ग्राम रक्षा दल'' का गठन किया जाएगा। ग्राम रक्षा दल में ग्राम के 18 वर्ष से 30 वर्ष तक के शारीरिक रूप से सभी योग्य व्यक्ति सदस्य होंगे। ग्राम रक्षा दल के गठन, कर्तव्य एवं उपयोग के लिए सरकार नियम बनाएगी।

ग्राम कचहरी

प्रति ग्राम पंचायत क्षेत्र में न्यायिक कार्यों को संपन्न करने हेतु 1 ग्राम कचहरी का गठन किया जाता है ग्राम कचहरी का गठन प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा किया जाता है जिसमें एक निर्वाचित सरपंच होता है और निश्चित संख्या में प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पंच लगभग 500 की आबादी को प्रतिनिधित्व करता हैl ग्राम कचहरी में भी अनुसूचित जाति जनजाति पिछड़े वर्ग एवं महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हैl ग्राम पंचायत के तरह ग्राम कचहरी का भी कार्यकाल 5 वर्ष का है यदि ग्राम कचहरी को पहले भी गठित किया जाता है तो पुण: निर्वाचन 6 महीने के अंदर करा लेना पड़ता है l ग्राम कचहरी का प्रधान सरपंच होता है अधिनियम के अनुसार ग्राम कचहरी का सरपंच ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में पंजीकृत मतदाताओं के बहुमत द्वारा प्रत्यक्ष ढंग से निर्वाचित किया जाएगा निर्वाचन के बाद ग्राम कचहरी अपनी पहली बैठक में निर्वाचित पंच ओं में से बहुमत द्वारा एक उपसरपंच का चुनाव करती है | ग्राम कचहरी का एक सचिव होता है जिसे न्याय मित्र के नाम से जाना जाता है, उसकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है | न्याय मित्र सरपंच के कार्य में सहयोग देता है, वहीं न्याय सचिव ग्राम कचहरी के कागजात को रखता है| सरपंच सभी प्रकार के अधिनियम 10000 तक के मामले की सुनवाई कर सकता है |

ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में अंतर

1- ग्राम सभा में एक गांव (या गांवों के एक समूह) के सभी वयस्क (18 वर्ष से ऊपर) के सदस्य होते हैं। जबकि ग्राम पंचायत एक छोटी सी संस्था है जिसके सदस्य ग्राम सभा के वयस्कों द्वारा चुने जाते हैं|
2- ग्राम पंचायत का कार्य आम तौर पर 5 वर्ष है, जबकि ग्राम सभा स्थायी निकाय है और इसकी अवधि निर्धारित नहीं है|
3- ग्राम पंचायत ग्राम सभा का कार्यकारी अंग है। ग्राम सभा ग्राम पंचायत के काम का मूल्यांकन करती है और मूल्यांकन करती है।


प्रत्येक प्रखंड के लिए एक पंचायत समिति होती है पंचायत समिति में निम्नलिखित प्रकार के सदस्य होते हैंl

1. निर्वाचित सदस्य प्रखंड को कई निर्वाचन क्षेत्रों में बांट दिया जाता है प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य निर्वाचित होते हैं जो 5000 लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं l अनुसूचित जाति जनजाति तथा पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के हिसाब से स्थान सुरक्षित होते हैं l महिलाओं के लिए 50% स्थान आरक्षित हैl 

2पदेन सदस्य निर्वाचित सदस्यों के अतिरिक्त ग्राम पंचायत का मुखिया पंचायत समिति का पदेन सदस्य होता है l  इसके अलावा सदस्य के रूप में विधानसभा और लोकसभा के सदस्य होते हैं सभी सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है l पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से एक उप प्रमुख निर्वाचित करते हैंl  सामान्यतः प्रखंड विकास पदाधिकारी वीडियो पंचायत समिति का कार्यपालक पदाधिकारी होता है l

पंचायत समिति के कार्य

समिति सभी ग्राम पंचायतों की वार्षिक योजना पर विचार विमर्श करती है तथा समिति योजना को जिला परिषद में  प्रस्तुत करती है l पंचायत समिति ऐसे कार्यों का संपादन एवं निष्पादन करती है, जो राज्य सरकार तथा या जिला परिषद् इस इस होती है l इसके अतिरिक्त सामुदायिक विकास कार्य एवं प्राकृतिक आपदा के समय राहत का प्रबंध करना भी इनकी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है पंचायत समिति अपना अधिकांश कार्य स्थाई समिति द्वारा करती हैl

 उप प्रमुख पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में ही से एक को प्रमुख निर्वाचित करते हैं l प्रमुख की अनुपस्थिति में पंचायत समिति की बैठक की अध्यक्षता उप प्रमुख ही करता हैl


प्रत्येक जिला में से एक जिला परिषद का गठन किया जाता है संपूर्ण जिला को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र में बांट दिया जाता है l प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में से एक सदस्य निर्वाचित होता है जो 50000 की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है जिला परिषद का कार्यकाल उसकी प्रथम बैठक की निर्धारित थी से अगले 5 वर्ष तक के लिए निश्चित होता है जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य भी अपने में से एक को अध्यक्ष और एक को उपाध्यक्ष निर्वाचित करते हैंl जिला अधिकारी की श्रेणी का पदाधिकारी जिला परिषद का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है, उसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है l 

पंचायतों के निर्वाचन नियमावली तैयार करवाने और पंचायतों के सभी निर्वाचन के संचालन निष्पादन एवं नियंत्रण के लिए निर्वाचन आयोग उत्तरदाई हैl पंचायत के लिए निर्वाचन आयोग की नियुक्ति राज्यपाल करता हैl प्रत्येक 5 वर्ष के अवसर पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पूर्वावलोकन करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाता हैl 

बिहार की नगरीय शासन व्यवस्था 

जो कार्य ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत द्वारा किये जाते है, शहरों में इस प्रकार के कार्य नगरपालिका और नगर निगम या नगर परिषद के द्वारा किये जाते हैl शहरों में स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं का स्वरूप वहां की जनसंख्या के अनुसार किया जाता हैl20,000 से अधिक एवं एक लाख से कम जनसंख्या वाले नगर नगरपालिका, एक लाख से अधिक किन्तु पांच लाख से कम जनसंख्या वाले नगर में नगर परिषद तथा पांच लाख या इससे अधिक जनसंख्या वाले नगर में नगर निगम होता हैl

नगर पंचायत 

बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 पारित कर नगर पंचायतों के गठन की व्यवस्था की गई है इस अधिनियम के अनुसार जिस शहर की जनसंख्या 12000 से 40000 के बीच हो तथा उस शहर के व्यस्त की तीन चौथाई जनसंख्या कृषि से भिन्न कार्यों में लगी हो वहां नगर पंचायत की स्थापना की जाती हैl नगर पंचायत के सदस्य की न्यूनतम संख्या 10 से अधिक और अधिकतम 25 हो सकती है l नगर पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन वार्डों के मतदाताओं के द्वारा प्रत्येक जन  से होता है l नगर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का है l इसके निर्वाचित सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को निर्वाचित करते हैं l नगर पंचायतों में भी अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति पिछड़े वर्ग तथा महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है l 
नगर पंचायत के मुख्य कार्य अपने क्षेत्र का आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए योजना तैयार करना 

नगर परिषद 

नगर पंचायत से बड़े शहरों में नगर परिषद का गठन किया जाता है वैसे शहर जिसकी जनसंख्या कम से कम 200000 से 300000 के बीच होती हैl वहां नगर परिषद की स्थापना की जाती है नगर परिषद का गठन व से शहर में की जाती हैl जहां पूरी जनसंख्या का तीन चौथाई भाग अपनी आजीविका के लिए कृषि छोड़े अन्य कार्य में लगे रहते हैं साथ ही इस शहरों में जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति होना चाहिए l

बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के अनुसार नगर परिषद में वार्डों की संख्या 35 से 45 तक हो सकती है प्रत्येक वार्ड में 1 सदस्य चुनकर आते हैं उन्हें वार्ड कमिश्नर भी कहा जाता है l

नगर परिषद के अंग 

1. नगरपर्षद नगर परिषद का एक प्रमुख अभिकरण नगर परिषद होता है इसके सदस्य पार्षद या कमिश्नर कहलाते हैंl इसके सदस्य कम से कम 10 और अधिक से अधिक 40 होती है इसके 80% सदस्य निर्वाचित होते हैं और शेष 20% सदस्य मनोनीत होते हैंl पार्षद का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है राज्य सरकार पूरी परिषद को भंग कर सकती हैl इसके बैठक महीने में एक बार होती है lपार्षद के सदस्य अपने में से एक को अध्यक्ष और एक को उपाध्यक्ष नियुक्त करती है l
2. समितियां नगर परिषद के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए नगर परिषद में कई समितियां होती हैं l समितियां को नगर पार्षद नियुक्त करती हैं जिसमें से 3 से 6 सदस्य होते हैं l
3. अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बिहार के प्रत्येक नगर परिषद की 1 मुख्य पार्षद अध्यक्ष एवं मुख्य पार्षद उपाध्यक्ष होता है l इन दोनों का चुनाव नगर परिषद के सदस्यों द्वारा होता है l नगर परिषद नगर परिषद का प्रधान होता है l 
4. कार्यपालक पदाधिकारी प्रत्येक नगर परिषद में 1 कार्यपालक पदाधिकारी का पद होता हैl  जिसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा होती है l 
बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के अनुसार वैसे ही नगरों में नगर निगम की स्थापना की जाती हैl जिसकी आबादी कम से कम तीन लाख है भारत के कई नगरों में नगर निगम में बिहार की राजधानी पटना में सबसे पहले 15 अगस्त 1952 को नगर निगम की स्थापना की गई वर्तमान में पटना के अतिरिक्त अन्य नगरों में नगर निगम की स्थापना हो चुकी है l वह हैं गया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, बिहारशरीफ, आरा बेगूसराय l

निर्वाचन निर्वाचन के उद्देश्य से नगर निगम को कई भागों में बांट दिया जाता है प्रत्येक वार्ड में से एक सदस्य निर्वाचित होकर आते हैं निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है नगर निगम में कम से कम 45 और अधिक से अधिक 75 बार हो सकते हैंl

 


नगर निगम के प्रमुख अंग

1. निगम परिषद समूचे नगर निगम क्षेत्र को विभिन्न भागों में बांटा जाता है जिसे वार्ड हम कह सकते हैं l इस तरह के विभक्त प्रत्येक क्षेत्र में उस क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा एक-एक प्रतिनिधि निर्वाचित होकर आते हैं, उन्हें वार्ड पार्षद या वार्ड काउंसिल्लोर कहते हैं पार्षद का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है l निर्वाचित सदस्यों के अलावा विशेष हितों के प्रति में भी करने वाले समूह जैसे चेंबर ऑफ कॉमर्स व्यापार संघ एवं निबंधित स्नातक के सदस्य भी परिषद के सदस्य हो सकते हैंl  निर्वाचित सदस्यों के द्वारा मनोनीत सदस्य मिलकर कई संयोजित सदस्य का चयन करते हैं l निगम परिषद की बैठक प्रत्येक महीने होते हैं l जिसका मुख्य काम होता है नियम बनाना निर्णय लेना और टैक्स लगानाl 

महापौर एवं उपमहापौर निगम परिषद अपने सदस्यों के बीच एक महापौर एवं उपमहापौर चुनती है l महापौर निगम परिषद का सभापति होता है तथा निगम की बैठक की अध्यक्षता करता है साथ ही सशक्त स्थाई समिति की अध्यक्षता करता हैl महापौर नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है इस नाते और नगर में आए अतिथियों का स्वागत नगर की ओर से करता है महापौर की अनुपस्थिति में नगर परिषद के सभी कार्यभार उपमहापौर संपादन करते हैंl

2. सशक्त स्थानीय समिति 
नगर परिषद के सभी प्रमुख के कार्य सशक्त समिति द्वारा की जाती है यह समिति कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति करने की ट्रिक नगर आयुक्त पर नियंत्रण रखती है महापौर एवं उपमहापौर इस समिति के सदस्य होते हैं तथा इसकी अध्यक्षता महापौर द्वारा की जाती है l
3. परामर्श दात्री समितियां 
नगर निगम के कुछ परामर्श दाई समितियां भी होती हैं जैसे शिक्षा समिति बाजार एवं उद्यान समिति आदि यह समितियां अपने अपने विषय पर निगम परिषद को सलाह देती है l
4. नगर आयुक्त 
नगर निगम के इस पदाधिकारी की नियुक्ति बिहार सरकार द्वारा की जाती है या पराया भारतीय प्रशासनिक सेवा स्तर का पदाधिकारी होता है l नगर आयुक्त नगर निगम का प्रमुख प्रशासक होता है एवं नगर निगम के सभी कर्मचारियों के कार्यों की देखभाल करता है l मगर नगर आयुक्त कुछ कर्मचारियों की भी नियुक्ति कर सकता है l  नगर आयुक्त निगम परिषद एवं सशक्त स्थाई समिति द्वारा किए गए नियमों के अनुरूप कार्य का संपादन करता है l 

नगर निगम के कार्य 
नगर निगम को भी अपने क्षेत्र में ही कार्य करने पड़ते हैं जो नगर परिषद के हैं फिर भी सुविधा के लिए नगर निगम के मुख्य कार्यो की सूची दी जा रही है -

1. सड़क का निर्माण मरम्मत एवं सफाई
2. नालियों का निर्माण मरम्मत एवं सफाई
3. सार्वजनिक स्थानों के कूड़े करकट की सफाई
4. रोशनी का प्रबंध करना
5. पीने का पानी का प्रबंध करना
6. पशुओं की रक्षा करना तथा इसके इलाज की व्यवस्था करना
7. लोगों के स्वास्थ्य एवं इलाज का प्रबंध करना
8. शिक्षा के लिए स्कूलों के स्थापना करना तथा उसका प्रबंधन करना
9. बाजार हाट मेले इत्यादि का प्रबंध करना
10. पुस्तकालयों तथा कला केंद्र की स्थापना करना
11. पार्क फुलवारी आदि का निर्माण और प्रबंधन करना
समाप्त 


सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली अध्याय 2 (क ) 10 वी एवं सभी प्रतियोग्याता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स

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अध्याय 2 (क )
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली 


सत्ता की साझेदारी से तात्पर्य है कि उसकी जिम्मेदारी ऊपर से नीचे तक बांटी होती है। सत्ता के शक्तियां किसी एक बिंदु पर ही सिमटने नहीं पाती, वह विभिन्न रूपों में बट जाती है । भारत का उदाहरण ले तो यहां केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक अधिकार और कर्तव्य पूर्णता बड़े होते हैं 
सत्ता के साझेदारी का एक रूप
1. कार्यपालिका 2. न्यायपालिका 3. व्यवस्थापिका मे बांटा हुआ होना भी है 
न्यायपालिका यह देखती है कि कोई किसी के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर पाते राज्य सरकारें जिला से लेकर ग्राम पंचायतों तक सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था करती है नगर निगम, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर परिषद, जिला परिषद, पंचायत समिति ग्राम पंचायत आदि इसी के उदाहरण है ।

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्व रखती है ?
सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में बहुत अधिक महत्व रखती है । इसी के चलते कोई किसी को दबाकर नहीं रख सकता, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की एकमात्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें ताकत सभी के हाथों में होती है। सभी को राजनीतिक शक्तियों में हिस्सेदारी या साझेदारी करने की व्यवस्था रहती है। इसका महत्व विशेषताएं इस बात में है कि किसी को असंतोष प्रकट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । यदि बहुमत आपके साथ है तो अर्थ है कि सभी आपसे संतुष्ट है यदि किसी को केंद्र में मौका नहीं मिलता  वो राज्य के शासन में साझेदारी कर सकता है । यदि वह इसमें भी असफल हो जाता है , तो स्थानीय निकायों में अपना भाग आजमाता है यदि वहां भी उसे जीत नहीं मिलती इसका अर्थ है कि जनता उसे इस काबिल नहीं समझती | भले ही वह विरोध का झंडा लहराते रहे | 
सत्ता की साझेदारी के अलग अलग तरीके क्या है ?
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता के भागीदार के रूप में कई स्तर देखने को मिलता है जिनमें चार प्रमुख रुप हैं- 
सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का विभाजन सरकार के तीन अंग होते हैं विधायिका ,  कार्यपालिका एवं न्यायपालिका
किसी एक अंग में सत्ता केंद्रित नहीं कर के सरकार ने तीनों अंगों के बीच जब सत्ता का विभाजन कर दिया जाता है तब उसे शक्तियों का पृथक्करण कहते हैं । इससे किसी एक अंग के द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावना नहीं रहती । एक ही स्तर पर आकर सरकार के तीनों अंग अपनी-अपनी सत्ता का प्रयोग करते हैं इस आधार पर इसे सत्ता का क्षेत्रीय विभाजन कहा जाता है।इससे सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन बना रहता है इसे नियंत्रण एवं संतुलन व्यवस्था भी कहते हैं। 
विभिन्न स्तरों पर संगठित सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी बड़े लोकतांत्रिक शासन एक जगह से नहीं चलाया जा सकता है । सामान्यता शासन व्यवस्था को तीन स्तरों पर विभाजित किया जाता है राष्ट्रीय स्तर पर, केंद्र स्तर पर तथा प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर पर । सत्ता का विभिन्न स्तरों पर गठित सरकारों के बीच बीच विभाजन कर दिया जाता है । भारत में भी दो स्तरों पर सरकार का गठन की व्यवस्था की गई है केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार  संविधान द्वारा सरकार तथा राज्य सरकार के बीच सत्ता का विभाजन कर दिया गया इस उद्देश्य तीन सूचियां बनाई गई हैं संघ सूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची। 

विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं विभिन्न धर्म के लोग रहते हैं अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं जिसको दो आधारों पर मुख्यता बांटा जाता है।अल्पसंख्यक  एवं बहुसंख्यक सत्ता का बंटवारा अल्पसंख्यक समुदाय और बहुसंख्यक समुदाय दोनों के बीच कर दिया जाता है । विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता के विभाजन होने से आपसी एकता बनी रहती है 

सत्ता का साझेदारी का प्रत्यक्ष रुप तब दिखता है 
जब दो या दो से अधिक दल मिलकर चुनाव लड़ती है या सरकार का गठन करती है ।
सत्ता में भागीदारी की आवश्यकता– सत्ता के भागीदारी की आवश्यकता लोकतंत्र में सफल संचालन में सहायक होता है सत्ता में भागीदारी राजनीतिक व्यवस्था को दृढ़ता प्रदान करती हैं एवं विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का विभाजन करके आप आपसी टकराव को कम किया जाता है ।

भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी? 
हमारे भारत में विभिन्न जाति धर्म संप्रदाय भाषा परंपरा और संस्कृति के लोग निवास करते हैं एकात्मक संविधान की व्यवस्था पर उन्हें एकता के सूत्र में नहीं मान सकता था भारत जैसे विशाल भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी  
भारत की संघीय शासन व्यवस्था की किन्हीं विशेषताओं का उल्लेख करें  
भारत की संघात्मक व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं- 
· दोहरी सरकार 
· अधिकार क्षेत्र अलग अलग 
· स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका 
· संविधान की सर्वोच्चता 
· संविधान के मौलिक प्रावधानों में संवैधानिक संशोधन द्वारा ही परिवर्तन 
· छत्रिय विविधताओं का सम्मान 
लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का क्या अर्थ है ?
भारतीय संविधान द्वारा एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई है इसका उद्देश्य समाजवादी समाज की स्थापना करके जनता के जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करना है लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई योजनाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित कराने का प्रयास किया जाता है  
                                                                                        संविधान की सर्वोच्चता संघीय शासन व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि मेरे सरकारी अधिकारियों की सरकार ने संविधान के ऊपर नहीं है सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक बनाया गया है  
संघीय शासन व्यवस्था की एक विशेषता यह है कि इसमें क्षत्रिय विविधताओं का पूरा सम्मान किया जाता है  राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति के उद्देश्य के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दोनों स्तरों की सरकारों के बीच सत्ता विभाजन की व्यवस्था पर समाहित सहमति हो राष्ट्रीय एकता बनी रहे इसलिए केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है  राज्य सरकारों को वह उसके कार्यों के बारे में निश्चित और जोरदार आदेश दिया गया है , तथा विकास की दिशा में समग्र प्रगति करने की बात कह कर राष्ट्रीय एकता के आधार को मजबूत किया गया है 
संघ राज्य का अर्थ 
संघ राज्य का अर्थ है - सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण इस तरह के राज्य के लिए पूरे देश की एक सरकार केंद्र सरकार होती है और राज्य प्रांतों के लिए अलग-अलग केंद्र और राज्यों के बीच संविधान में उल्लेखित सत्ता शक्ति का स्पष्ट बंटवारा रहता है  राज्य के नीचे भी सत्ता के साझेदार रहते हैं जिसे स्थानीय स्वशासन कहते हैं । सत्ता के इसी बंटवारे को संघराज्य संघवाद कहते हैं 
सत्ता की साझेदारी की कार्यप्रणाली को हम दो भागों में बांट सकते हैं संघात्मक शासन व्यवस्था अर्थात दोहरी सरकार एकात्मक शासन व्यवस्था अर्थात इकहरी सरकार | 
संघीय शासन व्यवस्था की पांच मुख्य विशेषताएं 
ü संघीय शासन व्यवस्था में सरकार दो या अधिक स्तर वाली होती है 
ü प्रत्येक स्तर की सरकार का अपना अपना अधिकार क्षेत्र होता है 
ü इसके अंतर्गत अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है 
ü वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए संघीय शासन व्यवस्था में प्रत्येक स्तर की सरकार के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित हैं 

शासन के संघीय और एकात्मक स्वरूपों में अंतर

संघीय शासन

एकात्मक शासन

संघीय शासन व्यवस्था में सरकार के विभिन्न स्तरों में सत्ता की साझेदारी होती है जैसे केंद्र व राज्य सरकार के बीच सत्ता की साझेदारी 

एकात्मक शासन व्यवस्था में शासन की संपूर्ण शक्ति केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के हाथ में होती है  

संघीय शासन व्यवस्था में के केंद्र में राष्ट्रीय अथवा राज्यों के मुद्दे होते हैं 

एकात्मक सत्ता हमेशा सत्ता के केंद्रीयकरण पर बल देती है  

संघीय शासन व्यवस्था में केंद्र व गैर केंद्रीय सरकार के बीच संविधान के अनुसार सत्ता का स्पष्ट विभाजन होता है कनाडा ब्राजील तथा संयुक्त राज्य अमेरिका आदि संघीय शासन व्यवस्था के उदाहरण है 

एकात्मक शासन व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई प्रावधान नहीं होता इटली फ्रांस जापान आदि एकात्मक शासन व्यवस्था के कुछ उदाहरण है 


समाप्त 

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी अध्याय 1 (ख ) वर्ग 10 के लिए (धर्म और सांप्रदायिकता की परिभाषा और विश्लेषण )

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लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

अध्याय 1 (ख )
खंड (क) के लिए क्लीक करे link01

धर्म और सांप्रदायिकता
यह मानना कि धर्म ही समुदाय या समुदाय का गठन करता है, तो यहीं से संप्रदाय को राजनीति से जोड़कर उसे सांप्रदायिकता की संज्ञा दी जाने लगती हैं। लेकिन वास्तविक रूप से संप्रदाय और धर्म का एक भाग है l  जैसे वैदिक धर्म अर्थात तथाकथित हिंदू धर्म में 3 संप्रदाय वैष्णव शैव तथा शाक्त संप्रदाय हैं तो इस्लाम में शिया और सुननी, बौद्ध धर्म मैं हीनयान और महायान ईसाइयों में कैथोलिक तथा प्रोस्टेट आदि। 
                                                धर्मों के अंदर इसी अंतर पर परस्पर के संघर्ष को संप्रदायिकता कहते हैं लेकिन राजनीतिज्ञों की भाषा में दो धर्मों के बीच टकराव को सांप्रदायिकता का नाम दिया जाता है l  यह अवधारणा अत्यंत गलत है जो देश में अस्थिरता पैदा करती है इसे रोकने का प्रयास होना चाहिए।

वास्तव में सांप्रदायिकता राजनीतिक दलों की स्वार्थ परक तथा अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्म को ही नहीं समझने की भावना का विकास करती है इसका घृणित परिणाम सांप्रदायिक हिंसा है । भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है यह सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है। 

सांप्रदायिकता का सही अर्थ है अपने धर्म को अन्य धर्मों से ऊंचा मानना। अपने धार्मिक हितों के लिए अपने राजनीतिक हितों के लिए राष्ट्रीय हित का बलिदान कर देना भी संप्रदायिकता है संप्रदायिकता धर्म के नाम पर गिरना फैलाती है यह विष के समान है जो मानव को मानव से घृणा करना सिखाता है इस संकुचित मनोवृति के कारण एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म के अनुयायियों अथवा एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं इस प्रकार संप्रदायवाद एक संकीर्ण विचारधारा है जो एक विशेष समुदाय का अन्य समुदाय के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने का निर्देश देती है। 

राजनीति में धर्म एक समस्या के रूप में खड़ी हो जाती है जब 
1. धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है 
2. राजनीतिक में धर्म धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय विशेष के विशिष्टता के लिए की जाती है 
3. राजनीति किसी धर्म विशेष के दावे का पक्ष पोषण करने लगती हैं 
4. किसी धर्म विशेष के अनुयाई दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। 
हम यह भी कह सकते हैं की राजनीतिक में धर्म को इस्तेमाल करना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। 

भारत में धर्मनिरपेक्ष शासन की अवधारणा 
सांप्रदायिकता भारत की आधारभूत चुनौतियों में से एक है किंतु हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को स्थान देकर इसे सिरे से नकारना कर दिया है संवैधानिक उपबंध ों में से निम्नलिखित महत्वपूर्ण है 
राष्ट्र  में किसी भी धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया है भारत किसी भी धर्म को विशेष धर्म का दर्जा नहीं देता है। 
                                            संविधान भारत के हर नागरिक को यह छूट देता है कि वह किसी भी धर्म को अपने विश्वास के आधार पर स्वीकार या अंगीकार कर सकता है धर्म के आधार पर किसी को भी उसके कोई अधिकार या अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता कोई भी स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म का पालन शांतिपूर्ण ढंग से प्रचार प्रसार कर सकता है तथा इस उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों को स्थापित कर संचालित कर सकता है। 

लैंगिक विभाजन और राजनीति 
जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी जानेवाली असमान प्राथमिकताओं से है। 

पुरुष और स्त्री के जैविक घर बनावट में लैंगिक विभिन्नता आती है इसका सही तात्पर्य पुरुष और स्त्री में अंतर है यद्यपि भारत में स्थानीय निकायों में स्त्रियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू हो चुकी है किंतु विधायक या सांसद में अपनी सदस्यता की मांग के लिए महिलाओं के संगठन प्रयासरत है और पुरुष प्रधान भारतीय समाज इसे मानने के लिए तैयार नहीं दिखता यद्यपि घर के कामों से लेकर कृषि कार्य तक में महिलाओं की भागीदारी कोई गम नहीं यह अब हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं यहां तक कि अब यह सेना में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। 

भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति 
भारत के लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 859 तो जरूर हो गई है किंतु यह अभी भी 11% से कम है विकसित राष्ट्रों की भी विधायिकाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अपर्याप्त है ब्रिटेन में 19.3 प्रतिशत अमेरिका में 16.3% इटली में 16.1% आयरलैंड में 16.2% तथा फ्रांस में 13.9 प्रतिशत है भारत में अधिकांश महिला सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है या कुछ मामलों में आपराधिक भी इस बात को प्रमाणित करती है कि सामान्य महिलाओं के लिए अभी भी विधायिका की दहलीज दूर है। 

विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा 
सांप्रदायिकता किसी भी धर्म समुदाय को वह अधिकार देती है जिससे वह अपने आप को प्रमुख राजनीतिक में बनाए रखना चाहते हैं कभी-कभी बहुसंख्यक धर्माराम भी धर्मावलंबी एक जुट होकर अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने हेतु अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को मटियामेट कर देने वाली नीतियां बना देते हैं या बनवा देते हैं श्रीलंका में सिंधियों के बहुसंख्यक धर्मवाद ने बहुसंख्यकवाद का रूप लेकर सिंहली भाषा को एकमात्र राज्य भाषा घोषित करवा डालना शिक्षा और नौकरी में सीनियर को प्राथमिकता दिलवा देना बहुत ही धर्म के संरक्षण हेतु कदम उठाना निश्चय ही अल्पसंख्यक को स्वतंत्रता घाट पहुंचाने वाला कदम था 

सांप्रदायिकता राजनीति गोलबंदी को पैदा करती है इसके लिए संप्रदाय के गुरुओं मुल्लाओं द्वारा पवित्र प्रतीकों का अनुचित उपयोग धर्म गुरुओं द्वारा भावनात्मक अपील आदि सांप्रदायिकता के अन्य रूप हैं कभी जामा मस्जिद के मौलाना बुखारी द्वारा किसी विशेष राजनीतिक दल संप्रदाय के लोगों को वोट के लिए अपील उनका एक बेहतर उदाहरण है 
                                                           संप्रदायिकता अपने भयानक रूप में तब राजनीतिक में उभरती है जब वह हिंसा दंगा और नरसंघार को जन्म देती है भारत में अपने विभाजन को भी एक सांप्रदायिकता के आधार पर एक कलंक पूर्ण विभाजन माना है। आजादी के बाद भी कई जगह दंगे हुए गुजरात का गोधरा कांड दिल्ली का सिख दंगा इसके ज्वलंत उदाहरण है। 
भारत में किस तरह जातिगत असमानताएं जारी है 
भारत के श्रम विभाजन के आधार पर जातिगत असमानताएं जारी है जैसा कि कुछ अन्य देशों में भी है भारत की तरह दूसरे देशों में भी पेशा के आधार पर लगभग वंशानुगत ही हैं पैसा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वता चला जाता है इसी पर आधारित सामुदायिक व्यवस्था ही जाति का रुप ले लेती है या व्यवस्था जब अस्थाई हो जाती है तब वह श्रम विभाजन का अतिवादी रूप कल आने लगती है वास्तव में ऐसे ही हम जाति के नाम से जाने लगते हैं खासकर शादी विवाह और अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट रूप से बिक जाता है इस प्रकार भारत में सदियों से जातिगत असमानताएं जारी है। 

अल्पसंख्यक कौन है 
चाय भाषा के आधार पर ही हो या संस्कृति के अल्पसंख्यक शब्द को भारतीय संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है देश की कुल जनसंख्या के आधे से भी कम जनसंख्या वाले समुदाय को अल्पसंख्यक कहते हैं इस संदर्भ में 1991 की जनगणना के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय भारत की कुल जनसंख्या का 17.0% है राज्य सरकार अल्पसंख्यकों की इस तरह राज्य स्तर पर क्षेत्रीय या स्थानीय अल्पसंख्यकों की बात भी उठाती है इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की अवधारणा राज्य स्तरीय अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है इसका अर्थ यह है कि यदि कोई समुदाय या वर्ग किसी अन्य विशेष में कुल मिलाकर बहुमत में हो तो वह भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक हो सकते हैं तथा इसके विपरीत स्थिति भी हो सकती है। 

भारत की राजनीतिक पर लैंगिक धार्मिक संप्रदाय तथा जातीय विभेद के प्रभावों का वर्णन करें 
लैंगिक विभेद का अर्थ है समाज का लिंग महिला तथा पुरुष के आधार पर बंटवारा समाज में लगभग 48% स्त्रियां हैं प्रारंभ में उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त थे परंतु धीरे-धीरे उनकी दशा खराब होती चली गई लैंगिक विभेद के कारण आज विश्व भर में राजनीति में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कम है अमेरिका में 20.2% यूरोप में 96.6 तथा एशिया के देशों का औसत मात्र 11.7 प्रतिशत है भारत में लोकसभा में सिर्फ 11% राज्यसभा में 9 पॉइंट 3% महिलाएं हैं भारत के राज्य विधानमंडलों में तो यह 4% ही हैं भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में संसद और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा किया है परंतु यह विधेयक अभी संसद में लंबित है l 
                                        धार्मिक एवं सांप्रदायिक प्रभाव आधुनिक युग में धर्म और राजनीति का गहरा संबंध है धर्म के आड़ में राजनीति का घिनौना खेल खेला जा रहा है कुछ राजनीतिक दलों का गठन भी किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है धार्मिक आवंटन नहीं संप्रदायवाद का रूप ले लिया है सांप्रदायिकता के कारण ही भारत का विभाजन हुआ था। 

जातीय विभेद का प्रभाव राजनीतिक में जाति का प्रभाव निम्नलिखित रुप से देखने को मिलता . 
1. राजनीतिक दल अपने अपने जाति आधारित बोर्ड बैंकों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का चयन करते हैं। 
2. सरकार बनाते समय भी सत्तारूढ़ दल अपने प्रांतीय राष्ट्र के जाति आधारित प्रतिनिधित्व का पूरा ख्याल रखते हैं 
3. राजनीतिक में जाति का प्रभाव के कारण ही पिछड़ी जाति के लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ती जा रही है या उनका मानना है कि बिना सत्ता हासिल किए हुए उनका कल्याण संभव नहीं है। 
4. राजनीतिक दल भी चुनावों के समय जाति आधारित भावनाओं को उकसाने का प्रयास करते हैं। 
भ्रूण हत्या से आप क्या समझते हैं? 
वर्तमान में अत्याधुनिक उपकरणों से गर्भ में ही शिशु के लिंग की जानकारी प्राप्त कर ली जाती है और पुत्री के जन्म होने की जानकारी होने पर गर्भ में ही उसकी हत्या कर दी जाती है इसे ही भ्रूण हत्या करते हैं। 

महिलाओं के सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं? 
महिलाएं आज राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी पिछड़ी हुई है नारियों के विकास के बिना समाज के विकास की बात करना असंभव है अतः महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागृत होना महिला सशक्तिकरण है। 

नोट:- सभी विद्यार्थियों से आग्रह है की इस क्लास नोट्स को अत्यंत ध्यानपूर्वक पढ़े। बहुत संभव है कि शब्दों में त्रुटी हो, हालाकि नोट्स को लिखते वक़्त हर संभव त्रुटि रहित रखने का प्रयास किया गया है। धन्यवाद्
 

कृषि ( अध्याय -7) वर्ग 10 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स

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कृषि

Agriculture

भूमिका- वर्तमान समय में भारत कृषि के दृष्टिकोण से एक संपन्न राष्ट्र है। जिस में भारत के लगभग 60% लोग कृषि कार्यों में संलग्न है। यहां विस्तृत समतल भूमि , संपन्न मृदा, अनेक प्रकार के फसलों के लिए उपयुक्त खुली धूप तथा लंबा वर्धन काल से युक्त विविध जलवायविक दशाएं पाई जाती हैं ।हिमालय से निकलने वाली सतत् वाहिनी नदियों में ग्लेशियर के पिघलने से वर्षभर पर्याप्त जल रहता है। इस कारण भारत की कृषि संपदा को प्रकृति का अनूठा उपहार मिला है। 
   वहीं दूसरी तरफ, भारत में 85% से अधिक कृषि वर्षा पर निर्भर है और भारतीय मानसून के स्वभाव के कारण कृषि निर्धारण में वर्षा का बहुत महत्व है। अधिकांश भागों में वर्षा वर्ष में तीन चार महीने ही होती है और वह भी असामान तथा और अनियमित । इस कारण अधिकांश क्षेत्र में साल में एक ही फसलें उगाई जाती है ।जल की कमी के कारण भारत के अधिकांश क्षेत्रों में शुष्क खेती का प्रचलन है।वर्षा की सहायता से विकसित कृषि प्रणाली को शुष्क कृषि (Dry agriculture)कहते हैं।
कृषि किसे कहते हैं?
कृषि का अर्थ है फसल उत्पन्न करने की प्रक्रिया; फसल उत्पादन, पशुपालन आदि की कला, विज्ञानं और तकनीक को कृषि कहते हैं। भूमि के उपयोग द्वारा फसल उत्पादन करने की क्रिया और प्रक्रिया को कृषि कहते हैं। कृषि एक प्राथमिक कार्य है जिसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ती करना है।
भारतीय कृषि की विशेषताएं (महत्व)
भारतीय कृषि की पांच प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं- 
1. भारतीय कृषि आर्थिक जीवन का प्लान है भारत में लगभग दो-तिहाई लोग की जीविका कृषि पर आधारित है
2. भारत के विशाल जनसंख्या के लिए भोजन कृषि से ही प्राप्त होता है।
3. यहां की कृषि से कच्चे माल उद्योगों को प्राप्त होते हैं।जैसे कपास सूती वस्त्र उद्योग चीनी गन्ना उद्योग झूठ झूठ उद्योग एवं अन्य कृषि उत्पाद कृषि प्रसंस्करण उद्योग को कच्चा माल देते हैं। जैसी रसदार फल जेली जैन स्वतंत्र उत्पादन के लिए आधार प्रदान करते हैं। इस तरह की कृषि उद्योगों की मजबूती प्रदान करती है।
4. यहां की जलवायु मिट्टी एवं धरातल की विविधता के कारण भारत में फसलों की विविधता भी पाई जाती है। चाय, गन्ना,मोटे अनाज एवं कुछ तिलहनों के उत्पादन का विश्व में अग्रणी स्थान है ।
5. राष्ट्रीय में भारतीय कृषि का मुख्य योगदान है देश की 18% आय कृषि से प्राप्त होती है। 


भारत में कृषि भूमि उपयोग
कृषि पर आश्रित लोगों के लिए भूमि अत्यंत ही महत्वपूर्ण संसाधन है क्योंकि यह पूरी तरह भूमि पर निर्भर है। इसलिए ग्रामों में भूमि हीनता और गरीबी के बीच संबंध देखने को मिलता है।फसलों के उत्पादन में भूमि की गुणवत्ता का भी व्यापक महत्व होता है, जबकि अन्य आर्थिक क्रियाकलाप जैसे कि उद्योग, परिवहन,आवास में इसका उतना महत्व नहीं है।
           स्थाई संपत्ति होने के कारण भूमि का सामाजिक महत्व भी है। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। कर्ज के लिए इसे गिरवी रखा जा सकता है। भूमि ही इन सब लाभों से वंचित रह जाते हैं। 

कृषि योग्य भूमि में 4 तरह की भूमि सम्मिलित की जाती हैं-

a.शुद्ध बोया गया क्षेत्र
b.चालू परती भूमि
c.अन्य परती 
d.कृषि योग्य भूमि 
भूमि उपयोग में परिवर्तन निम्न दो कारणों के चलते हुआ है-
1. जनसंख्या में वृद्धि- देश की जनसंख्या में वृद्धि स्वभाविक है और बढ़ती जनसंख्या के लिए निवास और बस्तियों के निर्माण में पर्याप्त भूमि का उपयोग किया जाता है।
2.उद्योगों का विकास- उद्योगों के विकास में उनकी स्थापना तथा परिवहन के लिए सड़क रेल मार्ग बनाने तथा औद्योगिक बस्तियों के निर्माण में काफी मात्रा में कृषि भूमि का उपयोग किया जाता है।
शस्य गहनता
एक ही कृषि वर्ष में एक ही भूमि पर एक से अधिक फसलों को उठाकर कुल उत्पादन में वृद्धि करना ही शस्य गहनता कहलाता है।

उदाहरण द्वारा इसे समझा जा सकता है-कि यदि आपके पास 3 हेक्टेयर भूमि है।1 वर्ष में धान की फसल बो कर धान उपजाते हैं । उसके बाद रबी के समय उसी 3 हेक्टेयर में गेहूं बो कर गेहूं का उत्पादन करते हैं। फिर जायद के समय कम अवधि में तैयार होने वाली मूंग की फसल बो कर उसकी कटाई कर लेते हैं। 1 वर्ष में तीन बार फसलों का उत्पादन होने से भूमि का 3×3=9 हेक्टेयर उत्पादक जमीन में परिवर्तित हो गया। 
शस्य गहनता को प्रभावित करने वाले कारक
-सिंचाई , उर्वरक , उन्नत बीज , यंत्रीकरण, कीटनाशक 
कृषि उत्पादन का उचित मूल्य
भारत में शुद्ध बोए गए क्षेत्र के बढ़ने की संभावना बहुत ही कम है। लेकिन सबसे घंटा ही वह विकल्प है जिससे भारत में कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।
भारत के अधिकांश भागों उष्णकटिबंधीय जलवायु होने के कारण यहां पर यहां पर तापमान और प्रकाश रहता है। वर्षा का वितरण सभी जगह समान नहीं है रहने के कारण आद्रता कृषि के प्रकार और फसलों के प्रकार तथा उत्पादन निर्धारण करने वाली महत्वपूर्ण कारक हो जाता है। जब फसल केवल बरसा द्वारा प्राप्त नमी के आधार पर पैदा की जाती है तब इसे वर्षा पोषित कृषि या वर्षातील कृषि करते हैं यह कृषि दो प्रकार की होती है- शुष्क भूमि कृषि एवं आद्र भूमि कृषि। 
आंद्रा भूमि कृषि- 75 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में होने वाले कृषि को आद्र भूमि कृषि कहते हैं।
शुष्क भूमि कृषि-75 सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्र में होने वाले कृषि को शुष्क भूमि कृषि करते हैं।
                                        भारतीय कृषि कुल लगभग 35% भूमि पर वर्षा दिन कृषि होती है मोटे अनाज दाल तिलहन कपास  वर्षा अधीन फसलों के उदाहरण हैं।
शुष्क भूमि कृषि की विशेषताएं-
1.वर्षा जल को संरक्षित करने की विधियों का प्रयोग किया जाता है ताकि शुष्क समय में इसका उपयोग किया जा सके।
2.आवश्यकता से अधिक जल को भूमिगत जल के पुनर्भरण के लिए संरक्षित रखा जाता है।
3. शुष्क होने  कारण यहां की मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा बहुत कम होती है।
4.शुष्क होने  के कारण मिट्टी की ऊपरी परत का वायु द्वारा कटाव होता है।
5.शुष्क भूमि कृषि अधिकांश था गरीब किसान करते हैं जिनके पास उन्नत कृषि करने के लिए पूंजी एवं आवश्यक साधन का अभाव होता है। 
6.कृषि द्वारा यहां आए कम प्राप्त होता है जिसकी क्षतिपूर्ति पशुपालन द्वारा की जाती है । अब जनसंख्या वृद्धि के दबाव के कारण यहां के चारागाहो को खेतों में बदला जा रहा है l 
गरीब किसान उत्थान के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजना
1.समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, सूखा प्रवण क्षेत्र विकास कार्यक्रम, रोजगार के बदले अनाज कार्यक्रम ,नरेगा आदि
2.शीघ्र तैयार होने वाली फसलों का बीज तैयार किया जा रहा है।
3.कृषि की नई तकनीक का विकास।
4.जल छीजन एवं संग्रहण के पत्नी का प्रचार प्रसार।
5.पशुपालन एवं मुर्गी पालन के कृषि के पूरे अंग के रूप में विकसित किया जा रहा है।
6.कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योगों को विकसित किया जा रहा है।
7.अर्ध शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) तथा केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (जोधपुर) शुष्क भूमि एवं अन्य कृषि से संबंधित समस्याओं के निदान के लिए कार्यरत हैं।

कृषि के प्रकार
विश्व में कृषि विभिन्न तरीकों से की जाती है भौगोलिक दशाओं, उत्पाद की मांग, श्रम और प्रौद्योगिकी के स्तर के आधार पर कृषि दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत की जा सकती है ये हैं निर्वाह कृषि और बाणिज्यिक कृषि ।

निर्वाह  कृषि
इस प्रकार की कृषि कृषक परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए की जाती है। पारंपरिक रूप से कम उपज प्राप्त करने के लिए निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी और पारिवारिक श्रम का उपयोग किया जाता है। निर्वाह कृषि को पुनः गहन निर्वाह कृषि और आदिम निर्वाह कृषि में वर्गीकृत किया जा सकता है।
                                         गहन निर्वाह कृषि में किसान एक छोटे भूखंड पर साधारण औज्ञारों और अधिक श्रम से खेती करता है। अधिक धूप वाले दिनों से युक्त जलवायु और उर्वर मृदा वाले खेत में, एक वर्ष में एक से अधिक फ़सलें उगाई जा सकती हैं। चावल मुख्य फ़सल होती है। अन्य फ़सलों में गेहूँ, मक्का, दलहन और तिलहन शामिल हैं। गहन निर्वाह कृषि दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले मानसूनी प्रदेशों में प्रचलित है।
 में स्थानांतरी कृषि और चलवासी पशुचारण शामिल हैं।
                                                                                    आदिम निर्वाह कृषि  अमेजन बेसिन के सघन वन क्षेत्रों, उष्ण कटिबंधीय अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी-पूर्वी भारत के भागों में प्रचलित है। ये भारी वर्षा और वनस्पति के तीव्र पुनर्जनन वाले क्षेत्र हैं। वृथों को काटकर और जलाकर भूखंड को साफ़ किया जाता है। तब राख को मुदा में मिलाया जाता है तथा मक्का, रतालू, आलू और कसावा जैसी फ़सलों को उगाया जाता है। भूमि की उर्वरता की समाप्ति के बाद वह भूमि छोड दी जाती है और कृषक नए भूखंड पर चला जाता है। स्थानांतरी कृषि को *कर्तन एवं दहन' कृषि के रूप में भी जाना जाता है।

चलवासी पशुचारण- साहारा के अर्धशुष्क और शुष्क प्रदेशों में, मध्य एशिया और भारत के कुछ भागों जैसे राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में प्रचलित है। इस प्रकार की कृषि में पशुचारक अपने पशुओं के साथ चारे और पानी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर निश्चित मागों से घूमते हैं। इस प्रकार की गतिविधि जलवायविक बाधाओं और भूभाग की प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न होती है। पशुचारक मुख्यतः भेड़, ऊँट, मवेशी, याक और बकरियाँ पालते हैं। ये पशुचारकों और उनके परिवारों के लिए दूध, मांस, ऊन खाल और अन्य उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।
वाणिज्यिक कृषि
वाणिज्यिक कृषि में फ़सल उत्पादन और पशुपालन बाजार में विक्रय हेतु किया जाता है। इसमें विस्तृत कृष्ट क्षेत्र और अधिक पूँजी का उपयोग किया जाता है। अधिकांश कार्य मशीनों के द्वारा किया जाता है। वाणिज्यिक कृषि में वाणिज्यिक अनाज कृषि, मिश्रित कृषि और रोपण कृषि शामिल हैं l 
वाणिज्यिक अनाज कृषि में फ़सलें वाणिज्यिक उद्देश्य से उगाई जाती हैं। गेहूँ और मक्का सामान्य रूप से उगाई जाने वाली फ़सलें हैं। उत्तर अमेरिका, यूरोप और एशिया के शीतोष्ण घास के मैदान वाणिज्यिक अनाज कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र सैकड़ों हेक्टेयर के बड़े फार्मों से युक्त बिरल आबादी वाले हैं। अत्यधिक ठंड वर्धनकाल को बाधित करती है और केवल एक ही फ़सल उगाई जा सकती है।

मिश्रित कृषि में भूमि का उपयोग भोजन व चारे की फ़सलें उगाने और पशुधन पालन के लिए किया जाता है यह यूरोप पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित है।
रोपण कृषि : रोपण कृषि एक विशेष प्रकार की झाड़ी कृषि अथवा वृक्ष कृषि है। इसे 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने प्रारंभ किया था। यह एकल फसल कृषि है। इसमें रबर, चाय, कहवा, कोको, मसाले, नारियल और फलों की फसलें जैसे- सेब, को अंगूर, संतरा, आदि उगाई जाती हैं। इस प्रकार की कृषि में अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। इसके लिए कुशल प्रबंध, तकनीकी ज्ञान, मशीनों, उर्वरकों, सिंचाई और परिवहन सुविधाओं का होना आवश्यक है। कई रोपण कृषि क्षेत्रों जैसे चाय, कहवा और रबर बागानों या उनके निकट ही उन्हें संसाधित करने की फैक्टरी लगी होती हैं। इस प्रकार की कृषि उत्तर-पूर्वी भारत के पर्वतीय क्षेत्रों, पश्चिम - बंगाल के उप-हिमालयी क्षेत्रों, तथा प्रायद्वीपीय भारत की नीलगिरि, की अनामलाई व इलायची की पहाड़ियों में की जाती है।
शस्य प्रारूप
भारत में कृषि की तीन प्रमुख ऋतुएँ हैं जिनमें ये फसलें उगाई जाती हैं
(i) खरीफ-मॉनसूनपूर्व की ऋतु, जिसमें खेत जोतकर धान की रोपाई के लिए खेतों में बीज डाल दिए जाते हैं और वर्षा की प्रतीक्षा की जाती है। वर्षा शुरू होते ही कृषिकार्य जोर पकड़ने लगता है। जून-जुलाई में फसलों की खेती आरंभ होती है और मॉनसूनी वर्षा की समाप्ति तक फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। धान, ज्वार-बाजरा, मकई, मूँगफली, जूट, कपास और अरहर (इस दलहन को पकने में अधिक समय लगता है) की फसलों की खेती इसी ऋतु में की जाती है। ये खरीफ फसलें कहलाती हैं।
(ii) रबी -वर्षाऋतु के बाद और जाड़ा आरंभ होने पर जिन फसलों की खेती की जाती है, वे रबी फसलें कहलाती हैं, जैसे-गेहूँ, चना, मटर, सरसों आदि। यह ऋतु रबी की ऋतु कहलाती है, जिसमें नवंबर में बुआई और अप्रैल-मई में इन फसलों की कटाई की जाती है।
(iii) जायद-कुछ फसलें सिंचाई के बल पर अल्प अवधि में ही पैदा की जाती हैं, जैसे-मूंग और उड़द। भारत में विभिन्न ऋतुओं में फल और सब्जियों की भी खेती की जाती है। मार्च से जून तक की अल्पावधि में भी सिंचाई सुविधा के क्षेत्रों में कुछ फसलें उगाई जाती हैं, परंतु मुख्यतः सब्जियाँ और कुछ  ग्रीष्मकालीन फल- नाशपाती, खरबूजा, तरबूज इत्यादि की खेती प्रमुख रूप से होती है। इस फसल ऋतु को जायद (zaid) कहते हैं।
भारत के कुछ भागों में इस प्रकार की फसल ऋतुएँ नहीं हैं। जलवायु, मिट्टी इत्यादि की स्थानीय स्थिति के अनुसार, फसलों का उत्पादन किया जाता है, जैसे तमिलनाडु में धान की फसल तब बोई जाती है जब उत्तर भारत में उसकी कटाई हो रही होती है।
हरित क्रांति क्या है? 
उत्तर-1967-68 में कृषि उत्पादन बढ़ाने और देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई प्रयास किए गए l  जिसके अन्तर्गत जोत भूमि का विस्तार, नए संकर बीजों का प्रयोग, उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहन, मृदा संरक्षण एवं भूमि सुधार का कार्यक्रम चलाया गया, सिंचाई का विस्तार और कृषि में नई तकनीकों को अपनाया गया। इस प्रयास में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में गेहूँ एवं धान के उत्पादन में जो वृद्धि हुई, जो सफलता मिली इसे ही हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार के प्रयास और तकनीक का प्रयोग कर पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी गेहूँ और चावल के उत्पादन में वृद्धि की गयी l 
भारत में पशुओं के प्रारूप की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां एक 100 सेंटीमीटर की सम वर्षा रेखा हैl  देश को दो बड़े कृषि क्षेत्र में बांटती  है। 100cm से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में चावल जबकि 100 cm से कम वर्षा वाला क्षेत्र में गेहूं प्रमुख फसल है।
इन दो प्रमुख कृषि क्षेत्र के बीच एक क्षेत्र संक्रमण का क्षेत्र है।भारत में शुष्क क्षेत्र का एक विशिष्ट फसल प्रारूप है। यहां प्रमुख फसल ज्वार बाजरा मूंगफली तिलहन और दाल है।
मुख्य फसलें- भारत में कृषि की विजेता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक है वर्षा की मात्रा, मिट्टी के प्रकार, कृषि पद्धति विविधता आदि ।  इनके फल स्वरुप भारत में विविध फसलें उगाई जाती हैं इनमें प्रमुख धान गेहूं मकई , ज्वार, बाजरा, तिलहन- दलहन, पेय फसल, रेशे की फसल, उगाई जाती है।
चावल
हमारे यहाँ कि प्रमुख खाद्यान्न फसल है जिस पर अधिकांश जनसंख्या निर्भर करती है। विश्व का 22% चावल क्षेत्र भारत में है तथा यह कुल कृषि भूमि का 23% । चावल की कृषि के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ निम्नांकित हैं (1) तापमान : यह उष्ण कटिबंधीय फसल है अतः इसकी उपज के लिये अधिक तापमान की आवश्यकता है। इसके लिये कम से कम 24° सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता है। बोते समय इसे 21°C, बढ़ते समय 24°C तथा पकते समय 27°C तापमान की आवश्कता होती है। 
(1) वर्षा - इसकी फसल के लिये 125 सें०मी०-200 सेंमी० वर्षा की आवश्यकता होती इससे कम वर्षा वाले क्षेत्र में सिंचाई की सहायता से फसल उगाई जाती है। 
(i) मिट्टी - इसके लिये अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसकी मिट्टी चीकायुक्त दोमट होनी चाहिए ताकि पौधे की जड़ अच्छी तरह विकसित हो सके। है। 
(iv) श्रम - इसकी कृषि में मानव श्रम की अधिक आवश्यकता होती है। खेत की तैयारी से लेकर रोपनी-कटनी तक का कार्य मानव श्रम द्वारा ही संपादित होता है। भारत के सस्ते श्रमिक इसकी कृषि के लिए अनुकूल मानवीय वातावरण बनाते हैं । 
उत्पादन तथा वितरण : भारत का अधिकांश चावल जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र में तथा डेल्टाई एवं तटीय भागों में उत्पन्न किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह हिमालय पर्वत की निचली घाटियों में सीढ़ीनुमा खेतों में तथा दक्षिणी पठार के कुछ घाटी क्षेत्रों में भी उगाया जाता है।
सतलज-गंगा के मैदान में सिंचाई की सहायता से चावल की कृषि ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके मुख्य उत्पादक राज्य प० बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, केरल, तमिलनाडु आदि है। प० बंगाल में चावल की तीनों ही किस्में उपजाई जाती हैं।
गेहूँ की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों की विवेचना करें।
उत्तर मेहँ- गेहूँ दूसरी महत्त्वपूर्ण खाद्य फसल है। गेहूँ शीतोष्ण फसल है। चावल की तरह ही चीन के बाद भारत गहूँ का दूसरा उत्पादक देश है। इसकी निम्नलिखित दशाएँ उपयुक्त हैं 
(1) फसल- रबी अनाज की फसल। (वर्षा- 75 सेमी से कम। फसल कटते समय वर्षा हानिकारक है।
(2)तापमान- बोते समय ठंडा तथा आर्द्र तापमान आवश्यक है। तापमान 10 cm से 15 cm तक होना चाहिए। गहूँ काटते समय तापमान 20cm से 30cm के मध्य होना चाहिए।
(3) मृदा दोमट मिट्टी। जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। (v) उत्पादक राज्य गेहूँ की कृषि भारत के उत्तरी पश्चिमी भागों तक सीमित है जैसे: पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान, उत्तरी गुजरात तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश।
मोटे अनाज : ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले प्रमुख मोटे अनाज हैं। क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से ज्वार भारत का तीसरा महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न है। 18° से 32° से. औसत मासिक तापमान इसके उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसके लिए लगभग 30 से 60 से.मी. वर्षा की आवश्यकता होती है। ज्वार के प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश हैं।
बाजरा 
बाजरा भी शुष्क और उष्ण जलवायु की फसल है। इसके उत्पादन की जलवायु दशाएं ज्वार के समान ही हैं। बाजरा का सर्वप्रमुख उत्पादक राज्य राजस्थान है। बाजरा के अन्य उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा हैं।
रागी
रागी वर्षा पर निर्भर एक खरीफ फसल हैं। इसे अच्छे जल निकास वाली जलोढ़ दुमट और लाल या काली बलुई दुमट मिट्टियों की आवश्यकता होती है। इसके लिए आवश्यक जलवायु दशाएं बाजरा के समान ही हैं। यह कर्नाटक और तमिलनाडु के शुष्क भागों में उगाई जाती हैं।
मक्का : यह एक मोटा अनाज है। इसका उपयोग खाने और चारे, दोनों के लिए होता है। इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु दशाओं और मिट्टियों में उगाया जाता है। यह मुख्यतः खरीफ की फसल है। मक्का 50 से 100 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की मदद से उगाई जाती है। इसके लिए 21° से. 27° तक तापमान की आवश्यकता होती है। इसे अच्छे जल निकास वाली मिट्टी चाहिए। मक्का देश के कुल कृषि क्षेत्र के 4 प्रतिशत भाग पर उगाई जाती है। मक्का उत्पादन के प्रमुख राज्य कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश हैं।
दालें: 
भारत में अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और हमारे भोजन में दाल प्रोटीन का स्रोत है। तूर (अरहर), उड़द, मूंग, मसूर, मटर और चना भारत की मुख्य दलहनी फसलें हैं। दालों के उत्पादन में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है, जिस अनुपात में अनाजों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। वस्तुतः कुल फसल क्षेत्र में दालों की खेती का प्रतिशत घट गया है। दालों को कम नमी की आवश्यकता होती है अतः इन्हें शुष्क परिस्थितियों में भी उगाया जा सकता है और 90% तक इसकी खेती मुख्यतः शुष्क कृषि तकनीक के अंतर्गत की जाती है। तूर (अरहर) को छोड़ कर बाकी अन्य दालें. वायु से नाइट्रोजन ले कर भूमि को उर्वर बनाती है। अतः इनको आम तौर पर अन्य फसलों के साथ फसल आवर्त्तन में रोपा जाता है। दालें खरीफ तथा रबी दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है-अरहर, मूंग, उड़द आदि खरीफ की फसलें हैं जबकि चना, मटर, मसूर आदि रबी की फसलें हैं। दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय दाल विकास कार्यक्रम भी 1986-87 में शुरू किया गया, पर इसके परिणाम संतोषजनक नहीं है।
जारी .........

अध्याय- 07 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Susmita Mishra

 


अध्याय- 07

उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण




व्यक्ति जब कोई वस्तु या सेवा अपने उपभोग या उपयोग के लिए खरीदता है, तो वह, उपभोक्ता कहलाते हैं उपभोक्ता बाजार व्यवस्था का प्रमुख अंग होता है ।
हमारे बाजार व्यवस्था में उपभोक्ता का स्थान सर्वोपरि है, यदि उपभोक्ता ना रहे तो उत्पादित वस्तुओं को मांगने वाला ही नहीं होगा। उत्पादन के समस्त क्रिया उपभोक्ता के द्वारा ही संचालित होती हैं, क्योंकि उत्पादक के रूप में हम पहले वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करते हैं, और फिर हम अपनी आवश्यकता अनुसार उसी वस्तु और सेवाओं से अपनी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं । बाजार व्यवस्था में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही होते हैं और दोनों का अलग अलग महत्व होता है l  वर्तमान युग में उपभोक्ताओं में वस्तु के मूल्य निर्माण एवं गुणवत्ता के प्रति जागरूक बनाया जाता है, उसे उपभोक्ता जागरण के रूप से जानते हैं l
1. उपभोक्ता जागरण 
मनुष्य को अपना जीवन जीने के लिए ढेर सारी वस्तु और सेवा की आवश्यकता होती है। और उन् आवश्यकता पूर्ति के लिए भिन्न भिन्न वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करता है, इस प्रकार हम यह भी कह सकते हैं कि मानव किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है और एक उपभोक्ता प्रतिदिन विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के संपर्क में आता है लेकिन कई बार, कई स्तर पर उनका शोषण हो जाता है जिसका प्रमुख कारण उपभोक्ता को अपने अधिकार का ज्ञान नहीं होना और जागरूकता का अभाव। उपभोक्ता का अधिकार है कि वह जिस वस्तु या सेवा का उपभोग कर रहा है उसका गुण मात्रा वस्तु बनाने में प्रयुक्त तत्व इससे होने वाले प्रभाव तथा सही मूल्य तथा वजन या मात्रा की जांच , आदि का पूर्ण जानकारी प्राप्त करें। 
आज भूमंडलीकरण के इस दौर में उपभोक्ता जहां एक राष्ट्र से नहीं वरन दूसरे देशों के बने वस्तुओं तथा सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं तो उनको जागरूक होना परम आवश्यक है। 
अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होने के कारण उपभोक्ता प्राय: शोषण के शिकार हो जाते हैं उनके हितों की रक्षा के लिए उन्हें जागरुक बनाना आवश्यक है,। उपभोक्ता जागरण हेतु विभिन्न नारे “जागो ग्राहक जागो” उपभोक्ता जागरण का सर्वाधिक प्रचलित नारा है इसके अतिरिक्त कुछ अन्य ना रहे हैं “एक सजग उपभोक्ता सुरक्षित उपभोक्ता” “अपने अधिकारों को जानो ग्राहकों सावधान रहो” “उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करो” “अपने अधिकारों को पहचानो सदर उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है”. 
2. उपभोक्ता शोषण 
उपभोक्ता शोषण का अभिप्राय उत्पादक अथवा विक्रेता द्वारा उपभोक्ताओं को बेची गई वस्तुओं की गुणवत्ता मात्रा शुद्धता एवं मूल्य आदि से संबंधित अनुचित व्यापार व्यवहार है। 
हमारे उपभोक्ता का एक नहीं कई प्रकार से शोषण किया जाता है।कभी माल् या सेवा की घटिया किस्म के कारण तो कभी कम नापतोल के कारण कभी नकली वस्तुएं उपलब्ध होने के कारण कभी वस्तुओं की कालाबाजारी या जमाखोरी के कारण तो कभी स्तरहीन विज्ञापनों के कारण उपभोक्ता के हितों की अनदेखी की जा रही है । 
आजकल उत्पादकों के साथ प्रलोभन देना एक प्रमुख समस्या बनी हुई जैसे एक वस्तु खरीदने पर एक वस्तु मुक्त पुरानी वस्तुओं के बदले नयी बस्तू , नहाने के साबुन में सोने का लॉकेट मिलेगा, चाय की पैकिंग में डायमंड मिलेगा, अन्य वस्तुओं के साथ स्कूटर फ्रीज TV मोबाइल आदि लाखों का इनाम का लालच। 
उपभोक्ता शोषण के प्रमुख कारक 
*मिलावट की समस्या महंगी वस्तुओं में अन्य चीजें मिलावट करके उपभोक्ताओं का शोषण होता है l
*कम तौलने द्वारा वस्तुओं के माप में हेरा फेरा करके भी उपभोक्ता का शोषण होता है l
*कम गुणवत्ता वाली वस्तु उपभोक्ता को धोखे से अच्छी वस्तुओं के स्थान पर कम गुणवत्ता वाली वस्तु देकर शोषण करना । 
*ऊंची कीमत द्वारा ऊंची कीमत वसूल करके भी उपभोक्ता का शोषण किया जाता है l
*डुप्लीकेट वस्तुएं सही कंपनी का डुप्लीकेट वस्तुएं प्रदान करके उपभोक्ता का शोषण होता है। 
भारत में उपभोक्ताओं की शोषण की समस्या बहुत गंभीर है। क्यों? 
भारत में उपभोक्ताओं के शोषण की समस्या बहुत गंभीर है, हमारे देश के अधिकांश उपभोक्ता अशिक्षित है तथा इसकी आज का अस्तर बहुत नियम है इसके फलस्वरुप हुए अपने अधिकारों के प्रति जागरुक नहीं होते। देश के आवश्यक उपभोक्ता पदार्थों का अभाव होने के कारण उंहें अनेक वस्तुओं और सेवाओं को अधिक मूल्य का पर खरीदना पड़ता है अथवा उनके उपयोग से वंचित रह जाना पड़ता है। भारत उपभोक्ता संघ का प्रभाव है उपभोक्ता एवं व्यापारी इसका अनुचित लाभ उठाकर उपभोक्ताओं का कई प्रकार से शोषण करते हैं भारत जैसे विकासशील देशों में कानूनी प्रक्रिया बहुत जटिल और खर्चीली है इसके फलस्वरुप भी इन देशों में उपभोक्ता का शोषण होता है। 

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian standards Institutions, BIs) :
• इसे जिसे पहले भारतीय मानक संस्थान ( indian Standards Institutions, Ist) के नाम से जाना जाता था। इसका मुख्य कार्य विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं का मानक तैयार कर प्रमाणन योजना चलाना है।
औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ISI मार्क का प्रयोग होता है।
कृषि उत्पादों के लिए एगमार्क का प्रयोग होता है।
 सोने और जेवरों को हॉलमार्क से पहचाना जाता है।
आधुनिक समय में उपभोक्ता के शोषण की समस्या क्यों गंभीर हो गई है
प्राचीन काल से भी उपभोक्ता या विक्रेता वस्तुओं का शोषण करते थे परंतु व्यापार का विस्तार होने के साथ ही आधुनिक समय में यह समस्या अत्यंत गंभीर हो गई है आज अखबार रेडियो टेलीविज़न आदि प्रचार एवं विज्ञापन के कई साधन उपलब्ध हैं उत्पादक इन पर बहुत अधिक धन ख़र्च करते हैं, जिसका भार उपभोक्ताओं को वहन करना पड़ता है। ग्राहको को आकृष्ट करने के लिए उत्पादक प्राय: अपनी वस्तुओं का भ्रामक प्रचार करते हैं । तथा अपनी वस्तुओं की गलत या अधूरी जानकारी देते हैं। बाजार में एकाधिकार एवं अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति होने के कारण भी उपभोक्ताओं का शोषण होता है ऐसी स्थिति में वस्तुओं की आपूर्ति पर बहुत थोड़े से उत्पादकों या विक्रेताओं का नियंत्रण रहता है और वह बाजार को अपनी इच्छा अनुसार प्रभावित कर सकते हैं । 

 → उपभोक्ता संरक्षण एवं सरकार 

उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा संबंधी अधिनियम 
भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कई अधिनियम या कानून लागू किए हैं इससे इसमें नापतोल मानक अधिनियम, खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम आदि महत्वपूर्ण है। 

उपभोक्ताओं के हित की रक्षा के लिए सरकार ने सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उपभोक्ता संरक्षण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यह एक अत्यंत प्रगतिशील और व्यापक कानून है इस अधिनियम के सभी प्रावधान जुलाई 1987 से प्रभावी हुए हैं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सभी प्रकार के वस्तुओं और सेवाओं के विक्रय पर लागू होता है अक्टूबर 2005 में भारत सरकार ने सूचना के अधिकार के नाम से एक अन्य अधिनियम पारित किया है जो जनहित तथा उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 
उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारो सुरक्षा एवं उनके शोषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया है इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं इसके अंतर्गत अनुचित व्यापार तरीकों का प्रयोग करने वाले उत्पादकों तथा विक्रेताओं को दंड देने के स्थान पर उपभोक्ताओं की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई है इसके लिए राष्ट्रीय राज्य एवं जिलास्तर पर एक अर्ध न्यायिक तंत्र गठित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग राज्य स्तर पर राज्य आयोग तथा जिला स्तर पर जिला अदालत कहा जाता है इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों को शीघ्रता से कम खर्च में दूर करना है यह अधिनियम वस्तुओं और सेवाओं के क्रय विक्रय पर लागू होता है 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपभोक्ताओं को दिए गए अधिकारों का वर्णन 
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया जो उनकी सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है
उपभेक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत उपभोक्ताओं को कुछ अधिकार दिये गये हैं हैं -
1. सुरक्षा का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं से शरीर या संपत्ति को हानि से बचाने के लिए यह अधिकार दिया गया है)।
2. सूचना पाने का अधिकार (वस्तुओं या सेवाओं को खरीदते समय उससे संबंधित जानकारी, जैसे - मूल्य, इस्तेमाल करने की अवधि, गुणवत्ता, अवयवों की सूची इत्यादि) 
3. चुनाव या पसन्द करने का अधिकार (वस्तुओं के ब्रांड, किस्म, गुण, रंग इत्यादि पसन्द करनेका अधिकार) 
4. क्षतिपूर्ति का अधिकार (खरीदी गई वस्तु ठीक ढंग की नहीं होने पर उपभोक्ता को मुआवजे या क्षतिपूर्ति का अधिकार)
5. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (धोखाधड़ी से बचने के लिए एवं एक सजग उपभोक्ता बनने के लिए शिक्षा का अधिकार)

· उपभोक्ताओं के अधिकार की रक्षा एवं हितों के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद एवं राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना की गई 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था दी गई है जिसे तीन स्तर पर स्थापित किया गया है राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग, राज्य स्तर पर राज्य स्तरीय आयोग, जिला स्तर पर जिला मंच (फोरम)। यह न्याय व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्यवहारिक है इस ग्रुप व्यवस्था से उपभोक्ताओं को जल्दी एवं सस्ता न्याय प्राप्त होता है एवं समय एवं धन की बचत होती है पहले शिकायत जिला फोरम में की जाती है शिकायतकर्ता अगर संतुष्ट नहीं है तो मामले को राज्य फोरम फिर राष्ट्रीय फोरम में ले जा सकता है, अगर उपभोक्ता राष्ट्रीय फोरम से भी संतुष्ट नहीं होता है तो आदेश के 30 दिनों के अंदर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है। 

शिकायत कहाँ करें?
1. जिला फोरम : यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख रूपये तक हो।
2. राज्य आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख से 1 करोड़ तक हो 
3. राष्ट्रीय आयोग यदि क्षतिपूर्ति की राशि 1 करोड़ से अधिक हो
शिकायत दर्ज करने का तरीका 
उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है। इस प्रकार की कोई भी शिकायत व्यक्तिगत रूप से या डाक द्वारा भेजी जा सकती है। शिकायत को सादे कागज पर लिखकर निम्नलिखित विवरण जैसे शिकायतकर्ताओं तथा विपरीत पार्टी का नाम का विवरण तथा पता, शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह सब कब हुआ और कहां हुआ, शिकायत में उल्लेखित आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, शिकायत पर शिकायतकर्ताओं अथवा उसके प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए। 

· उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को निम्नलिखित राहत देने का प्रावधान है 
i. विक्रय की गई वस्तु या सेवा को बदलना 
ii. विक्रय की जाने वाली वस्तुओं की त्रुटि को दूर करना 
iii. वस्तुओं या सेवाओं के लिए अदा की गई रकम को वापस लौटाना 
iv. उपभोक्ताओं द्वारा सहन की गई हानि की क्षतिपूर्ति करना 

· विश्व के अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी कुछ ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना की गई है जो उपभोक्ताओं के इस शोषण का निराकरण करती है मुख्य रूप से राष्ट्रीय राज्य एवं निम्न प्रशासकीय स्तर पर 2 संस्थाएं महत्वपूर्ण है जो लोगों के जीवन और उपयोग के अधिकार को संरक्षण प्रदान करती है 

मानवाधिकार आयोग :
यह राष्ट्रीय स्तर की उच्चतम संस्था है । यह मानवीय अधिकारों की रक्षा एवं उनके हितों की सुरक्षा प्रदान करती है।
सूचना आयोग :
उपभोक्ताओं को वस्तुओं एवं सेवाओं से संबंधित सूचना प्राप्त कराने के लिए गठित आयोग।
. राज्य स्तर पर राज्य सूचना आयोग।
 राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सूचना आयोग।
सूचना का अधिकार क्या है 
सूचना का अधिकार आम आदमी का अधिकार संपन्न बनाने हेतु सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कदम है सूचना का अधिकार का तात्पर्य है कोई भी व्यक्ति अभिलेख ईमेल आदेश दस्तावेज नमूने और इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े आदि के रूप में ऐसी प्रत्येक सूचना प्राप्त कर सकता है जिसकी उसे आवश्यकता है जिसके लिए आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी के समक्ष आवेदन करेंगे जिसकी सूचना 30 दिनों में विशेष परिस्थिति में 48 घंटे संबंधित व्यक्तियों को सूचना उपलब्ध करवाया जाएगा। 
एक उपभोक्ता के रुप में बाजार में अपने कर्तव्य का वर्णन करें 
उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए प्रायः सभी देशों में अवश्य कानून बनाए गए हैं परंतु उपभोक्ताओं के भी कुछ कर्तव्य हैं तथा इनके शोषण को रोकने के लिए आवश्यक है कि वे अधिकारों के साथ ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी सचेत हो एक उपभोक्ता के रुप में हमारे लिए निम्नलिखित कर्तव्य को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है 
a. उपभोक्ता को ना केबल वस्तुओं के क्रय विक्रय की व्यवसायिक पक्षों की जानकारी होनी चाहिए वर्णन स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की भी जानकारी आवश्यक है उन्हें कोई भी सामान खरीदते समय उनकी गुणवत्ता और शुद्धता के प्रति पूर्णतया स्वस्थ हो जाना चाहिए यदि यह सामान्य सेवा की गारंटी दीजिए गई है तो गारंटी कार्ड को पूरा करा कर उसे रख लेना चाहिए. 
b. जहां कहीं भी संभव हो खरीदे गए सामान या सेवा की रसीद अवश्य लेनी चाहि 
c. आने का स्थानों पर सरकार अथवा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उपभोक्ता संघ की स्थापना की गई है उपभोक्ता को इस के कार्यक्रम में रुचि लेनी चाहिए। 
d. एक उपभोक्ता द्वारा क्रय की जाने वाली वस्तु है कितनी ही कम मूल्य की क्यों ना हो उसे अपनी वास्तविक समस्या की शिकायत अवश्य करनी चाहिए 
e. उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर इसका प्रयोग भी करना चाहिए 
उपभोक्ताओं की जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से ही उन्हें उत्पादकों और व्यापारियों के शोषण से बचाया जा सकता है। 
नोट :-  इस नोट्स को लिखने के लिए कई किताबो को सन्दर्भ में रखा गया है l किसी भी तथ्यों में शंका हो तो हमारे whatsapp नंबर 9060219579 पर संपर्क करें l