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पंचायती राज व्यवस्था : बिहार ( ग्राम पंचायत, ग्राम कचहरी, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम, महापौर एवं उपमहापौर, नगर आयुक्त)

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 पंचायती राज व्यवस्था : बिहार 

पंचायत हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह हमारी गहन सूझ-बुझ के आधार पर व्यवस्था-निर्माण करने की क्षमता की परिचायक है। यह हमारे समाज में स्वाभाविक रूप से समाहित स्वावलम्बन, आत्मनिर्भरता एवं संपूर्ण स्वंतत्रता के प्रति निष्ठा व लगाव का घोतक है।
                  देश में पंचायत राज को सशक्त बनाने, व्यवस्थित विकास की जिम्मेदारी देने तथा लोकोपयोगी बनाने के लिए राष्ट्र तथा राज्य स्तर पर कई कमिटियों का गठन किया गया।इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण बलवंत राय मेहता कमिटी, अशोक मेहता तथा सिंधवी कमिटी हैं। 
                                                            
राष्ट्रीय स्तर पर पंचायती राज्य प्रणाली की विधिवत शुरुआत बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा ओं के आधार पर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से हुई थी 1959 में ही आंध्र प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई उसके बाद अन्य राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था के स्थापना होने लगी | 

‘‘स्थानीय स्वशासन एक ऐसा शासन है, जो अपने सीमित क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करता हो।’’

                                भारत एक विशाल जनसंख्या वाला लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की मूल भूत मान्यता है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में होनी चाहिए । सभी  व्यक्ति इस व्यवस्था से प्रत्यक्षत: जुडंकर शासन कार्य से सम्बद्ध हो सकें इस प्रकार का अवसर स्थानीय स्वशासन ब्यवस्था द्वारा संभव हो सकता है। स्थानीय स्वशासन जनता द्वारा शासन स्थानीय स्वशासन कहलाता है। स्थानीय स्वशासन के दो क्षत्रे है। (1) ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्र। पंचायती राज ग्रामीण व्यवस्था एवं नगरपालिका नगरीय व्यवस्था को कहा जाता है ।

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन 

भारत में प्राचीन काल से ही भिन्न-भिन्न नामों से पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी के प्रभाव से पंचायती राज व्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया गया। 1993 में 73 वां संविधान संशोधन करके पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता दी गयी  है।

  1. पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होगी। इसमें एक या एक से अधिक गाँव शामिल किये जा सकते है। 
  2. ग्राम पंचायत कर शाक्तियों के सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल द्वारा कानून बनाया जायेगा । जिन राज्यों की जनसंख्या 20लाख से कम है वहॉ दो स्तरीय पंचायत (जिला व ग्राम ) का गठन किय जायेगा  । 
  3. सभी स्तरों की पंचायतो के सभी सदस्यों का चुनाव ‘वयस्क मताधिकार’ के आधार पर पांच वर्ष के लिए किया जायेगा । 
  4. ग्राम स्तर के अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्षत: तथा जनपद व जिला स्तर के अध् यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जायेगा । 
  5. पंचायत के सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए उनके सख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जायेगा । 
  6. महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा । 
  7. पांच वर्ष के कार्य काल के पूर्व भी इनका (पंचायतो का) विघटन किया जा सकता है। परन्तु विघटन की दशा में 6 माह के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यकता होगा। 

 ग्राम पंचायत

‘पंचायत’ का शब्दिक अर्थ पाँच पंचो की समिति से है। प्राचीन काल में गाँव के झगड़ों का निपटारा पाँच पंचो की समिति द्वारा किया जाता था। इसी व्यवस्था से पंचायत शब्द का जन्म हुआ। ग्राम पंचायतो का मुख्य उद्देश्य गाँवो की उन्नति करना और ग्राम वासियों का आत्म-निर्भर बनाना है। प्राय: अधिकांश राज्यो के गाँवो में एक ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और न्याय पंचायत होती है।

बिहार पंचायती राज अधिनियम 2000 द्वारा ग्राम पंचायतों का गठन किया गया है अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि बिहार सरकार के आदेश से जिला दंडाधिकारी जिला गजट में अधिसूचना निकाल कर किसी स्थानीय क्षेत्र को जिससे कोई गांव या निकटस्थ  गांव के समूह अथवा किसी गांव के भाग को ग्राम पंचायत घोषित कर सकता है इस क्षेत्र की जनसंख्या लगभग 7000 के करीब होगीl अधिनियम में जिलाधिकारी को यह अधिकार दिया गया है कि वह ग्राम पंचायत में किसी गांव को या उसके विभाग को अलग कर सकता है या उसमें शामिल ही कर सकता है l एक पंचायत क्षेत्र लगभग 500 की आबादी पर वार्डों में विभक्त होता है जिसकी संख्या सामान्यता 15 से 16 तक होती है |

  1. ग्राम सभा गांव के वयस्क नागरिकों को मिलाकर बनायी जाती है। 
  2. ग्राम पंचायत में एक सरपंच, एक उप-संरपच और कुछ पंच होते है ये सभी गा्रम सभा द्वारा चुने प्रतिनिधि होते है। 
  3. न्याय पंचायत का चुनाव सम्बन्धित ग्राम पंचायत करती है। न्याय पंचायत केवल ग्रामीणों के निम्न स्तर के दीवानी और फौजदारी विवादों को सुनती है, न्याय पंचायतों एक निश्चित धन राशि तक जुर्माना वसलू सकती है। किन्तु कारावास की दण्ड नही दे सकती। 

ग्राम पंचायत के कार्य- 

गांव के विकास के लिए बहुत सारे कार्य ग्राम पंचायत के अधीन होते हैं, ग्राम पंचायत इन कार्यों को अपनी जिम्मेदारी से कार्यान्वित करता है| ग्राम पंचायत के कार्य अग्रलिखित हैं-
1- ग्राम पंचायत कृषि संबंधी कार्य की रूपरेखा तैयार करती है और कृषि संबंधी व्यवधानों को अपने स्तर पर ठीक करती है|
2- ग्राम पंचायत गांव के चतुर्मुखी विकास की जिम्मेदारी का निर्वहन करती है|
3- ग्राम पंचायत प्राथमिक विद्यालय, उच्च प्राथमिक विद्यालय व अनौपचारिक शिक्षा संबंधी कार्य करती है|
4- युवा कल्याण सम्बंधी कार्यों की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आती है|
5- राजकीय नलकूपों की मरम्मत व रखरखाव का कार्य ग्राम पंचायत करती है|
6- ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बंधी कार्य की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की होती है|
7- ग्राम पंचायत महिला एवं बाल विकास सम्बंधी कार्य को करती है|
8- पशुधन विकास सम्बंधी कार्य
9- समस्त प्रकार की पेंशन को स्वीकृत करने व वितरण का कार्य ग्राम पंचायत का होता है|
10- छात्रों को प्राप्त समस्त प्रकार की छात्रवृत्तियों को स्वीकृति करने व वितरण का कार्य ग्राम पंचायत का होता है|
11- राशन की दुकान का आवंटन व निरस्तीकरण ग्राम पंचायत के कार्यों के अंतर्गत आती है|
12- पंचायती राज सम्बंधी ग्राम्यस्तरीय कार्य आदि।

ग्राम पंचायत के आय के साधन- 

राज्य व्यवस्थापिका पंचायतों को टैक्स लगाने एवं उनसे प्राप्त धन को व्यय करने का अधिकार देती है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त होता है। इस आय व्यय का जांच करने के लिए वित्त आयोग गठित है जो अपनी रिपार्ट प्रति 5 वर्ष में राज्यपाल को देगा। जिलाधीश को पंचायतों का निरीक्षण एव समय से पवूर् भंग करने का अधिकार दिया गया है।

 ग्राम पंचायत के प्रमुख अंग

ग्राम पंचायत के 4 अंग होते हैं 1.ग्राम सभा 2.मुखिया 3.ग्राम रक्षा/दलपति 4.ग्राम कचहरी
ग्राम सभा ग्राम सभा पंचायत की व्यवस्थापिका सभा हैl ग्राम पंचायत क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्क स्त्री पुरुष जो 18 वर्ष से अधिक उम्र के हैंl ग्राम सभा के सदस्य होंगे ग्राम सभा की बैठक वर्ष भर में कम से कम 4 बार होगी मुखिया ग्राम सभा की बैठक  बुलाएगा और उसकी अध्यक्षता करेगा l

ग्राम रक्षा दल का गठन

सामान्य पहरा, निगरानी एवं आकस्मिक घटनाओं जैसे अगलगी, बाढ़, बांध में दरार, महामारी, चोरी, डकैती आदि का सामना करने,सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने तथा सरकार द्वारा समय-समय पर सौंपे गये कार्यों को सम्पादित करने हेतु विहित रीति से एक दलपति की नियुक्ति की जाएगी।

एक दलपति के अधीन प्रत्येक ग्राम पंचायत के अंतर्गत एक ''ग्राम रक्षा दल'' का गठन किया जाएगा। ग्राम रक्षा दल में ग्राम के 18 वर्ष से 30 वर्ष तक के शारीरिक रूप से सभी योग्य व्यक्ति सदस्य होंगे। ग्राम रक्षा दल के गठन, कर्तव्य एवं उपयोग के लिए सरकार नियम बनाएगी।

ग्राम कचहरी

प्रति ग्राम पंचायत क्षेत्र में न्यायिक कार्यों को संपन्न करने हेतु 1 ग्राम कचहरी का गठन किया जाता है ग्राम कचहरी का गठन प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा किया जाता है जिसमें एक निर्वाचित सरपंच होता है और निश्चित संख्या में प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पंच लगभग 500 की आबादी को प्रतिनिधित्व करता हैl ग्राम कचहरी में भी अनुसूचित जाति जनजाति पिछड़े वर्ग एवं महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हैl ग्राम पंचायत के तरह ग्राम कचहरी का भी कार्यकाल 5 वर्ष का है यदि ग्राम कचहरी को पहले भी गठित किया जाता है तो पुण: निर्वाचन 6 महीने के अंदर करा लेना पड़ता है l ग्राम कचहरी का प्रधान सरपंच होता है अधिनियम के अनुसार ग्राम कचहरी का सरपंच ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में पंजीकृत मतदाताओं के बहुमत द्वारा प्रत्यक्ष ढंग से निर्वाचित किया जाएगा निर्वाचन के बाद ग्राम कचहरी अपनी पहली बैठक में निर्वाचित पंच ओं में से बहुमत द्वारा एक उपसरपंच का चुनाव करती है | ग्राम कचहरी का एक सचिव होता है जिसे न्याय मित्र के नाम से जाना जाता है, उसकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है | न्याय मित्र सरपंच के कार्य में सहयोग देता है, वहीं न्याय सचिव ग्राम कचहरी के कागजात को रखता है| सरपंच सभी प्रकार के अधिनियम 10000 तक के मामले की सुनवाई कर सकता है |

ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में अंतर

1- ग्राम सभा में एक गांव (या गांवों के एक समूह) के सभी वयस्क (18 वर्ष से ऊपर) के सदस्य होते हैं। जबकि ग्राम पंचायत एक छोटी सी संस्था है जिसके सदस्य ग्राम सभा के वयस्कों द्वारा चुने जाते हैं|
2- ग्राम पंचायत का कार्य आम तौर पर 5 वर्ष है, जबकि ग्राम सभा स्थायी निकाय है और इसकी अवधि निर्धारित नहीं है|
3- ग्राम पंचायत ग्राम सभा का कार्यकारी अंग है। ग्राम सभा ग्राम पंचायत के काम का मूल्यांकन करती है और मूल्यांकन करती है।


प्रत्येक प्रखंड के लिए एक पंचायत समिति होती है पंचायत समिति में निम्नलिखित प्रकार के सदस्य होते हैंl

1. निर्वाचित सदस्य प्रखंड को कई निर्वाचन क्षेत्रों में बांट दिया जाता है प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य निर्वाचित होते हैं जो 5000 लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं l अनुसूचित जाति जनजाति तथा पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के हिसाब से स्थान सुरक्षित होते हैं l महिलाओं के लिए 50% स्थान आरक्षित हैl 

2पदेन सदस्य निर्वाचित सदस्यों के अतिरिक्त ग्राम पंचायत का मुखिया पंचायत समिति का पदेन सदस्य होता है l  इसके अलावा सदस्य के रूप में विधानसभा और लोकसभा के सदस्य होते हैं सभी सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है l पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से एक उप प्रमुख निर्वाचित करते हैंl  सामान्यतः प्रखंड विकास पदाधिकारी वीडियो पंचायत समिति का कार्यपालक पदाधिकारी होता है l

पंचायत समिति के कार्य

समिति सभी ग्राम पंचायतों की वार्षिक योजना पर विचार विमर्श करती है तथा समिति योजना को जिला परिषद में  प्रस्तुत करती है l पंचायत समिति ऐसे कार्यों का संपादन एवं निष्पादन करती है, जो राज्य सरकार तथा या जिला परिषद् इस इस होती है l इसके अतिरिक्त सामुदायिक विकास कार्य एवं प्राकृतिक आपदा के समय राहत का प्रबंध करना भी इनकी महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है पंचायत समिति अपना अधिकांश कार्य स्थाई समिति द्वारा करती हैl

 उप प्रमुख पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में ही से एक को प्रमुख निर्वाचित करते हैं l प्रमुख की अनुपस्थिति में पंचायत समिति की बैठक की अध्यक्षता उप प्रमुख ही करता हैl


प्रत्येक जिला में से एक जिला परिषद का गठन किया जाता है संपूर्ण जिला को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र में बांट दिया जाता है l प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में से एक सदस्य निर्वाचित होता है जो 50000 की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है जिला परिषद का कार्यकाल उसकी प्रथम बैठक की निर्धारित थी से अगले 5 वर्ष तक के लिए निश्चित होता है जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य भी अपने में से एक को अध्यक्ष और एक को उपाध्यक्ष निर्वाचित करते हैंl जिला अधिकारी की श्रेणी का पदाधिकारी जिला परिषद का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होता है, उसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है l 

पंचायतों के निर्वाचन नियमावली तैयार करवाने और पंचायतों के सभी निर्वाचन के संचालन निष्पादन एवं नियंत्रण के लिए निर्वाचन आयोग उत्तरदाई हैl पंचायत के लिए निर्वाचन आयोग की नियुक्ति राज्यपाल करता हैl प्रत्येक 5 वर्ष के अवसर पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पूर्वावलोकन करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाता हैl 

बिहार की नगरीय शासन व्यवस्था 

जो कार्य ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत द्वारा किये जाते है, शहरों में इस प्रकार के कार्य नगरपालिका और नगर निगम या नगर परिषद के द्वारा किये जाते हैl शहरों में स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं का स्वरूप वहां की जनसंख्या के अनुसार किया जाता हैl20,000 से अधिक एवं एक लाख से कम जनसंख्या वाले नगर नगरपालिका, एक लाख से अधिक किन्तु पांच लाख से कम जनसंख्या वाले नगर में नगर परिषद तथा पांच लाख या इससे अधिक जनसंख्या वाले नगर में नगर निगम होता हैl

नगर पंचायत 

बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 पारित कर नगर पंचायतों के गठन की व्यवस्था की गई है इस अधिनियम के अनुसार जिस शहर की जनसंख्या 12000 से 40000 के बीच हो तथा उस शहर के व्यस्त की तीन चौथाई जनसंख्या कृषि से भिन्न कार्यों में लगी हो वहां नगर पंचायत की स्थापना की जाती हैl नगर पंचायत के सदस्य की न्यूनतम संख्या 10 से अधिक और अधिकतम 25 हो सकती है l नगर पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन वार्डों के मतदाताओं के द्वारा प्रत्येक जन  से होता है l नगर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का है l इसके निर्वाचित सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को निर्वाचित करते हैं l नगर पंचायतों में भी अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति पिछड़े वर्ग तथा महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है l 
नगर पंचायत के मुख्य कार्य अपने क्षेत्र का आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए योजना तैयार करना 

नगर परिषद 

नगर पंचायत से बड़े शहरों में नगर परिषद का गठन किया जाता है वैसे शहर जिसकी जनसंख्या कम से कम 200000 से 300000 के बीच होती हैl वहां नगर परिषद की स्थापना की जाती है नगर परिषद का गठन व से शहर में की जाती हैl जहां पूरी जनसंख्या का तीन चौथाई भाग अपनी आजीविका के लिए कृषि छोड़े अन्य कार्य में लगे रहते हैं साथ ही इस शहरों में जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति होना चाहिए l

बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के अनुसार नगर परिषद में वार्डों की संख्या 35 से 45 तक हो सकती है प्रत्येक वार्ड में 1 सदस्य चुनकर आते हैं उन्हें वार्ड कमिश्नर भी कहा जाता है l

नगर परिषद के अंग 

1. नगरपर्षद नगर परिषद का एक प्रमुख अभिकरण नगर परिषद होता है इसके सदस्य पार्षद या कमिश्नर कहलाते हैंl इसके सदस्य कम से कम 10 और अधिक से अधिक 40 होती है इसके 80% सदस्य निर्वाचित होते हैं और शेष 20% सदस्य मनोनीत होते हैंl पार्षद का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है राज्य सरकार पूरी परिषद को भंग कर सकती हैl इसके बैठक महीने में एक बार होती है lपार्षद के सदस्य अपने में से एक को अध्यक्ष और एक को उपाध्यक्ष नियुक्त करती है l
2. समितियां नगर परिषद के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए नगर परिषद में कई समितियां होती हैं l समितियां को नगर पार्षद नियुक्त करती हैं जिसमें से 3 से 6 सदस्य होते हैं l
3. अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बिहार के प्रत्येक नगर परिषद की 1 मुख्य पार्षद अध्यक्ष एवं मुख्य पार्षद उपाध्यक्ष होता है l इन दोनों का चुनाव नगर परिषद के सदस्यों द्वारा होता है l नगर परिषद नगर परिषद का प्रधान होता है l 
4. कार्यपालक पदाधिकारी प्रत्येक नगर परिषद में 1 कार्यपालक पदाधिकारी का पद होता हैl  जिसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा होती है l 
बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के अनुसार वैसे ही नगरों में नगर निगम की स्थापना की जाती हैl जिसकी आबादी कम से कम तीन लाख है भारत के कई नगरों में नगर निगम में बिहार की राजधानी पटना में सबसे पहले 15 अगस्त 1952 को नगर निगम की स्थापना की गई वर्तमान में पटना के अतिरिक्त अन्य नगरों में नगर निगम की स्थापना हो चुकी है l वह हैं गया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, बिहारशरीफ, आरा बेगूसराय l

निर्वाचन निर्वाचन के उद्देश्य से नगर निगम को कई भागों में बांट दिया जाता है प्रत्येक वार्ड में से एक सदस्य निर्वाचित होकर आते हैं निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है नगर निगम में कम से कम 45 और अधिक से अधिक 75 बार हो सकते हैंl

 


नगर निगम के प्रमुख अंग

1. निगम परिषद समूचे नगर निगम क्षेत्र को विभिन्न भागों में बांटा जाता है जिसे वार्ड हम कह सकते हैं l इस तरह के विभक्त प्रत्येक क्षेत्र में उस क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा एक-एक प्रतिनिधि निर्वाचित होकर आते हैं, उन्हें वार्ड पार्षद या वार्ड काउंसिल्लोर कहते हैं पार्षद का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है l निर्वाचित सदस्यों के अलावा विशेष हितों के प्रति में भी करने वाले समूह जैसे चेंबर ऑफ कॉमर्स व्यापार संघ एवं निबंधित स्नातक के सदस्य भी परिषद के सदस्य हो सकते हैंl  निर्वाचित सदस्यों के द्वारा मनोनीत सदस्य मिलकर कई संयोजित सदस्य का चयन करते हैं l निगम परिषद की बैठक प्रत्येक महीने होते हैं l जिसका मुख्य काम होता है नियम बनाना निर्णय लेना और टैक्स लगानाl 

महापौर एवं उपमहापौर निगम परिषद अपने सदस्यों के बीच एक महापौर एवं उपमहापौर चुनती है l महापौर निगम परिषद का सभापति होता है तथा निगम की बैठक की अध्यक्षता करता है साथ ही सशक्त स्थाई समिति की अध्यक्षता करता हैl महापौर नगर का प्रथम नागरिक माना जाता है इस नाते और नगर में आए अतिथियों का स्वागत नगर की ओर से करता है महापौर की अनुपस्थिति में नगर परिषद के सभी कार्यभार उपमहापौर संपादन करते हैंl

2. सशक्त स्थानीय समिति 
नगर परिषद के सभी प्रमुख के कार्य सशक्त समिति द्वारा की जाती है यह समिति कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति करने की ट्रिक नगर आयुक्त पर नियंत्रण रखती है महापौर एवं उपमहापौर इस समिति के सदस्य होते हैं तथा इसकी अध्यक्षता महापौर द्वारा की जाती है l
3. परामर्श दात्री समितियां 
नगर निगम के कुछ परामर्श दाई समितियां भी होती हैं जैसे शिक्षा समिति बाजार एवं उद्यान समिति आदि यह समितियां अपने अपने विषय पर निगम परिषद को सलाह देती है l
4. नगर आयुक्त 
नगर निगम के इस पदाधिकारी की नियुक्ति बिहार सरकार द्वारा की जाती है या पराया भारतीय प्रशासनिक सेवा स्तर का पदाधिकारी होता है l नगर आयुक्त नगर निगम का प्रमुख प्रशासक होता है एवं नगर निगम के सभी कर्मचारियों के कार्यों की देखभाल करता है l मगर नगर आयुक्त कुछ कर्मचारियों की भी नियुक्ति कर सकता है l  नगर आयुक्त निगम परिषद एवं सशक्त स्थाई समिति द्वारा किए गए नियमों के अनुरूप कार्य का संपादन करता है l 

नगर निगम के कार्य 
नगर निगम को भी अपने क्षेत्र में ही कार्य करने पड़ते हैं जो नगर परिषद के हैं फिर भी सुविधा के लिए नगर निगम के मुख्य कार्यो की सूची दी जा रही है -

1. सड़क का निर्माण मरम्मत एवं सफाई
2. नालियों का निर्माण मरम्मत एवं सफाई
3. सार्वजनिक स्थानों के कूड़े करकट की सफाई
4. रोशनी का प्रबंध करना
5. पीने का पानी का प्रबंध करना
6. पशुओं की रक्षा करना तथा इसके इलाज की व्यवस्था करना
7. लोगों के स्वास्थ्य एवं इलाज का प्रबंध करना
8. शिक्षा के लिए स्कूलों के स्थापना करना तथा उसका प्रबंधन करना
9. बाजार हाट मेले इत्यादि का प्रबंध करना
10. पुस्तकालयों तथा कला केंद्र की स्थापना करना
11. पार्क फुलवारी आदि का निर्माण और प्रबंधन करना
समाप्त 


सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली अध्याय 2 (क ) 10 वी एवं सभी प्रतियोग्याता परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण नोट्स

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अध्याय 2 (क )
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली 


सत्ता की साझेदारी से तात्पर्य है कि उसकी जिम्मेदारी ऊपर से नीचे तक बांटी होती है। सत्ता के शक्तियां किसी एक बिंदु पर ही सिमटने नहीं पाती, वह विभिन्न रूपों में बट जाती है । भारत का उदाहरण ले तो यहां केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक अधिकार और कर्तव्य पूर्णता बड़े होते हैं 
सत्ता के साझेदारी का एक रूप
1. कार्यपालिका 2. न्यायपालिका 3. व्यवस्थापिका मे बांटा हुआ होना भी है 
न्यायपालिका यह देखती है कि कोई किसी के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर पाते राज्य सरकारें जिला से लेकर ग्राम पंचायतों तक सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था करती है नगर निगम, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर परिषद, जिला परिषद, पंचायत समिति ग्राम पंचायत आदि इसी के उदाहरण है ।

सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्व रखती है ?
सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में बहुत अधिक महत्व रखती है । इसी के चलते कोई किसी को दबाकर नहीं रख सकता, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की एकमात्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें ताकत सभी के हाथों में होती है। सभी को राजनीतिक शक्तियों में हिस्सेदारी या साझेदारी करने की व्यवस्था रहती है। इसका महत्व विशेषताएं इस बात में है कि किसी को असंतोष प्रकट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । यदि बहुमत आपके साथ है तो अर्थ है कि सभी आपसे संतुष्ट है यदि किसी को केंद्र में मौका नहीं मिलता  वो राज्य के शासन में साझेदारी कर सकता है । यदि वह इसमें भी असफल हो जाता है , तो स्थानीय निकायों में अपना भाग आजमाता है यदि वहां भी उसे जीत नहीं मिलती इसका अर्थ है कि जनता उसे इस काबिल नहीं समझती | भले ही वह विरोध का झंडा लहराते रहे | 
सत्ता की साझेदारी के अलग अलग तरीके क्या है ?
आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता के भागीदार के रूप में कई स्तर देखने को मिलता है जिनमें चार प्रमुख रुप हैं- 
सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का विभाजन सरकार के तीन अंग होते हैं विधायिका ,  कार्यपालिका एवं न्यायपालिका
किसी एक अंग में सत्ता केंद्रित नहीं कर के सरकार ने तीनों अंगों के बीच जब सत्ता का विभाजन कर दिया जाता है तब उसे शक्तियों का पृथक्करण कहते हैं । इससे किसी एक अंग के द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की संभावना नहीं रहती । एक ही स्तर पर आकर सरकार के तीनों अंग अपनी-अपनी सत्ता का प्रयोग करते हैं इस आधार पर इसे सत्ता का क्षेत्रीय विभाजन कहा जाता है।इससे सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन बना रहता है इसे नियंत्रण एवं संतुलन व्यवस्था भी कहते हैं। 
विभिन्न स्तरों पर संगठित सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी बड़े लोकतांत्रिक शासन एक जगह से नहीं चलाया जा सकता है । सामान्यता शासन व्यवस्था को तीन स्तरों पर विभाजित किया जाता है राष्ट्रीय स्तर पर, केंद्र स्तर पर तथा प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर पर । सत्ता का विभिन्न स्तरों पर गठित सरकारों के बीच बीच विभाजन कर दिया जाता है । भारत में भी दो स्तरों पर सरकार का गठन की व्यवस्था की गई है केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार  संविधान द्वारा सरकार तथा राज्य सरकार के बीच सत्ता का विभाजन कर दिया गया इस उद्देश्य तीन सूचियां बनाई गई हैं संघ सूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची। 

विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता का विभाजन किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं विभिन्न धर्म के लोग रहते हैं अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं जिसको दो आधारों पर मुख्यता बांटा जाता है।अल्पसंख्यक  एवं बहुसंख्यक सत्ता का बंटवारा अल्पसंख्यक समुदाय और बहुसंख्यक समुदाय दोनों के बीच कर दिया जाता है । विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता के विभाजन होने से आपसी एकता बनी रहती है 

सत्ता का साझेदारी का प्रत्यक्ष रुप तब दिखता है 
जब दो या दो से अधिक दल मिलकर चुनाव लड़ती है या सरकार का गठन करती है ।
सत्ता में भागीदारी की आवश्यकता– सत्ता के भागीदारी की आवश्यकता लोकतंत्र में सफल संचालन में सहायक होता है सत्ता में भागीदारी राजनीतिक व्यवस्था को दृढ़ता प्रदान करती हैं एवं विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का विभाजन करके आप आपसी टकराव को कम किया जाता है ।

भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी? 
हमारे भारत में विभिन्न जाति धर्म संप्रदाय भाषा परंपरा और संस्कृति के लोग निवास करते हैं एकात्मक संविधान की व्यवस्था पर उन्हें एकता के सूत्र में नहीं मान सकता था भारत जैसे विशाल भारत में संघीय शासन व्यवस्था की आवश्यकता पड़ी  
भारत की संघीय शासन व्यवस्था की किन्हीं विशेषताओं का उल्लेख करें  
भारत की संघात्मक व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं- 
· दोहरी सरकार 
· अधिकार क्षेत्र अलग अलग 
· स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका 
· संविधान की सर्वोच्चता 
· संविधान के मौलिक प्रावधानों में संवैधानिक संशोधन द्वारा ही परिवर्तन 
· छत्रिय विविधताओं का सम्मान 
लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का क्या अर्थ है ?
भारतीय संविधान द्वारा एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई है इसका उद्देश्य समाजवादी समाज की स्थापना करके जनता के जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करना है लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई योजनाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं द्वारा क्रियान्वित कराने का प्रयास किया जाता है  
                                                                                        संविधान की सर्वोच्चता संघीय शासन व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि मेरे सरकारी अधिकारियों की सरकार ने संविधान के ऊपर नहीं है सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक बनाया गया है  
संघीय शासन व्यवस्था की एक विशेषता यह है कि इसमें क्षत्रिय विविधताओं का पूरा सम्मान किया जाता है  राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति के उद्देश्य के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दोनों स्तरों की सरकारों के बीच सत्ता विभाजन की व्यवस्था पर समाहित सहमति हो राष्ट्रीय एकता बनी रहे इसलिए केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है  राज्य सरकारों को वह उसके कार्यों के बारे में निश्चित और जोरदार आदेश दिया गया है , तथा विकास की दिशा में समग्र प्रगति करने की बात कह कर राष्ट्रीय एकता के आधार को मजबूत किया गया है 
संघ राज्य का अर्थ 
संघ राज्य का अर्थ है - सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण इस तरह के राज्य के लिए पूरे देश की एक सरकार केंद्र सरकार होती है और राज्य प्रांतों के लिए अलग-अलग केंद्र और राज्यों के बीच संविधान में उल्लेखित सत्ता शक्ति का स्पष्ट बंटवारा रहता है  राज्य के नीचे भी सत्ता के साझेदार रहते हैं जिसे स्थानीय स्वशासन कहते हैं । सत्ता के इसी बंटवारे को संघराज्य संघवाद कहते हैं 
सत्ता की साझेदारी की कार्यप्रणाली को हम दो भागों में बांट सकते हैं संघात्मक शासन व्यवस्था अर्थात दोहरी सरकार एकात्मक शासन व्यवस्था अर्थात इकहरी सरकार | 
संघीय शासन व्यवस्था की पांच मुख्य विशेषताएं 
ü संघीय शासन व्यवस्था में सरकार दो या अधिक स्तर वाली होती है 
ü प्रत्येक स्तर की सरकार का अपना अपना अधिकार क्षेत्र होता है 
ü इसके अंतर्गत अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है 
ü वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए संघीय शासन व्यवस्था में प्रत्येक स्तर की सरकार के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित हैं 

शासन के संघीय और एकात्मक स्वरूपों में अंतर

संघीय शासन

एकात्मक शासन

संघीय शासन व्यवस्था में सरकार के विभिन्न स्तरों में सत्ता की साझेदारी होती है जैसे केंद्र व राज्य सरकार के बीच सत्ता की साझेदारी 

एकात्मक शासन व्यवस्था में शासन की संपूर्ण शक्ति केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के हाथ में होती है  

संघीय शासन व्यवस्था में के केंद्र में राष्ट्रीय अथवा राज्यों के मुद्दे होते हैं 

एकात्मक सत्ता हमेशा सत्ता के केंद्रीयकरण पर बल देती है  

संघीय शासन व्यवस्था में केंद्र व गैर केंद्रीय सरकार के बीच संविधान के अनुसार सत्ता का स्पष्ट विभाजन होता है कनाडा ब्राजील तथा संयुक्त राज्य अमेरिका आदि संघीय शासन व्यवस्था के उदाहरण है 

एकात्मक शासन व्यवस्था में किसी प्रकार का कोई प्रावधान नहीं होता इटली फ्रांस जापान आदि एकात्मक शासन व्यवस्था के कुछ उदाहरण है 


समाप्त 

लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी अध्याय 1 (ख ) वर्ग 10 के लिए (धर्म और सांप्रदायिकता की परिभाषा और विश्लेषण )

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लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

अध्याय 1 (ख )
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धर्म और सांप्रदायिकता
यह मानना कि धर्म ही समुदाय या समुदाय का गठन करता है, तो यहीं से संप्रदाय को राजनीति से जोड़कर उसे सांप्रदायिकता की संज्ञा दी जाने लगती हैं। लेकिन वास्तविक रूप से संप्रदाय और धर्म का एक भाग है l  जैसे वैदिक धर्म अर्थात तथाकथित हिंदू धर्म में 3 संप्रदाय वैष्णव शैव तथा शाक्त संप्रदाय हैं तो इस्लाम में शिया और सुननी, बौद्ध धर्म मैं हीनयान और महायान ईसाइयों में कैथोलिक तथा प्रोस्टेट आदि। 
                                                धर्मों के अंदर इसी अंतर पर परस्पर के संघर्ष को संप्रदायिकता कहते हैं लेकिन राजनीतिज्ञों की भाषा में दो धर्मों के बीच टकराव को सांप्रदायिकता का नाम दिया जाता है l  यह अवधारणा अत्यंत गलत है जो देश में अस्थिरता पैदा करती है इसे रोकने का प्रयास होना चाहिए।

वास्तव में सांप्रदायिकता राजनीतिक दलों की स्वार्थ परक तथा अपने धर्म को श्रेष्ठ तथा दूसरे धर्म को ही नहीं समझने की भावना का विकास करती है इसका घृणित परिणाम सांप्रदायिक हिंसा है । भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है यह सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है। 

सांप्रदायिकता का सही अर्थ है अपने धर्म को अन्य धर्मों से ऊंचा मानना। अपने धार्मिक हितों के लिए अपने राजनीतिक हितों के लिए राष्ट्रीय हित का बलिदान कर देना भी संप्रदायिकता है संप्रदायिकता धर्म के नाम पर गिरना फैलाती है यह विष के समान है जो मानव को मानव से घृणा करना सिखाता है इस संकुचित मनोवृति के कारण एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म के अनुयायियों अथवा एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं इस प्रकार संप्रदायवाद एक संकीर्ण विचारधारा है जो एक विशेष समुदाय का अन्य समुदाय के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने का निर्देश देती है। 

राजनीति में धर्म एक समस्या के रूप में खड़ी हो जाती है जब 
1. धर्म को राष्ट्र का आधार मान लिया जाता है 
2. राजनीतिक में धर्म धर्म की अभिव्यक्ति एक समुदाय विशेष के विशिष्टता के लिए की जाती है 
3. राजनीति किसी धर्म विशेष के दावे का पक्ष पोषण करने लगती हैं 
4. किसी धर्म विशेष के अनुयाई दूसरे धर्मावलंबियों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगते हैं। 
हम यह भी कह सकते हैं की राजनीतिक में धर्म को इस्तेमाल करना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। 

भारत में धर्मनिरपेक्ष शासन की अवधारणा 
सांप्रदायिकता भारत की आधारभूत चुनौतियों में से एक है किंतु हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता को स्थान देकर इसे सिरे से नकारना कर दिया है संवैधानिक उपबंध ों में से निम्नलिखित महत्वपूर्ण है 
राष्ट्र  में किसी भी धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया है भारत किसी भी धर्म को विशेष धर्म का दर्जा नहीं देता है। 
                                            संविधान भारत के हर नागरिक को यह छूट देता है कि वह किसी भी धर्म को अपने विश्वास के आधार पर स्वीकार या अंगीकार कर सकता है धर्म के आधार पर किसी को भी उसके कोई अधिकार या अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता कोई भी स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म का पालन शांतिपूर्ण ढंग से प्रचार प्रसार कर सकता है तथा इस उद्देश्य से शिक्षण संस्थानों को स्थापित कर संचालित कर सकता है। 

लैंगिक विभाजन और राजनीति 
जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी जानेवाली असमान प्राथमिकताओं से है। 

पुरुष और स्त्री के जैविक घर बनावट में लैंगिक विभिन्नता आती है इसका सही तात्पर्य पुरुष और स्त्री में अंतर है यद्यपि भारत में स्थानीय निकायों में स्त्रियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू हो चुकी है किंतु विधायक या सांसद में अपनी सदस्यता की मांग के लिए महिलाओं के संगठन प्रयासरत है और पुरुष प्रधान भारतीय समाज इसे मानने के लिए तैयार नहीं दिखता यद्यपि घर के कामों से लेकर कृषि कार्य तक में महिलाओं की भागीदारी कोई गम नहीं यह अब हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगी हैं यहां तक कि अब यह सेना में भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। 

भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति 
भारत के लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 859 तो जरूर हो गई है किंतु यह अभी भी 11% से कम है विकसित राष्ट्रों की भी विधायिकाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या अपर्याप्त है ब्रिटेन में 19.3 प्रतिशत अमेरिका में 16.3% इटली में 16.1% आयरलैंड में 16.2% तथा फ्रांस में 13.9 प्रतिशत है भारत में अधिकांश महिला सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है या कुछ मामलों में आपराधिक भी इस बात को प्रमाणित करती है कि सामान्य महिलाओं के लिए अभी भी विधायिका की दहलीज दूर है। 

विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा 
सांप्रदायिकता किसी भी धर्म समुदाय को वह अधिकार देती है जिससे वह अपने आप को प्रमुख राजनीतिक में बनाए रखना चाहते हैं कभी-कभी बहुसंख्यक धर्माराम भी धर्मावलंबी एक जुट होकर अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने हेतु अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय को मटियामेट कर देने वाली नीतियां बना देते हैं या बनवा देते हैं श्रीलंका में सिंधियों के बहुसंख्यक धर्मवाद ने बहुसंख्यकवाद का रूप लेकर सिंहली भाषा को एकमात्र राज्य भाषा घोषित करवा डालना शिक्षा और नौकरी में सीनियर को प्राथमिकता दिलवा देना बहुत ही धर्म के संरक्षण हेतु कदम उठाना निश्चय ही अल्पसंख्यक को स्वतंत्रता घाट पहुंचाने वाला कदम था 

सांप्रदायिकता राजनीति गोलबंदी को पैदा करती है इसके लिए संप्रदाय के गुरुओं मुल्लाओं द्वारा पवित्र प्रतीकों का अनुचित उपयोग धर्म गुरुओं द्वारा भावनात्मक अपील आदि सांप्रदायिकता के अन्य रूप हैं कभी जामा मस्जिद के मौलाना बुखारी द्वारा किसी विशेष राजनीतिक दल संप्रदाय के लोगों को वोट के लिए अपील उनका एक बेहतर उदाहरण है 
                                                           संप्रदायिकता अपने भयानक रूप में तब राजनीतिक में उभरती है जब वह हिंसा दंगा और नरसंघार को जन्म देती है भारत में अपने विभाजन को भी एक सांप्रदायिकता के आधार पर एक कलंक पूर्ण विभाजन माना है। आजादी के बाद भी कई जगह दंगे हुए गुजरात का गोधरा कांड दिल्ली का सिख दंगा इसके ज्वलंत उदाहरण है। 
भारत में किस तरह जातिगत असमानताएं जारी है 
भारत के श्रम विभाजन के आधार पर जातिगत असमानताएं जारी है जैसा कि कुछ अन्य देशों में भी है भारत की तरह दूसरे देशों में भी पेशा के आधार पर लगभग वंशानुगत ही हैं पैसा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वता चला जाता है इसी पर आधारित सामुदायिक व्यवस्था ही जाति का रुप ले लेती है या व्यवस्था जब अस्थाई हो जाती है तब वह श्रम विभाजन का अतिवादी रूप कल आने लगती है वास्तव में ऐसे ही हम जाति के नाम से जाने लगते हैं खासकर शादी विवाह और अन्य अनिवार्य व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट रूप से बिक जाता है इस प्रकार भारत में सदियों से जातिगत असमानताएं जारी है। 

अल्पसंख्यक कौन है 
चाय भाषा के आधार पर ही हो या संस्कृति के अल्पसंख्यक शब्द को भारतीय संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है देश की कुल जनसंख्या के आधे से भी कम जनसंख्या वाले समुदाय को अल्पसंख्यक कहते हैं इस संदर्भ में 1991 की जनगणना के अनुसार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय भारत की कुल जनसंख्या का 17.0% है राज्य सरकार अल्पसंख्यकों की इस तरह राज्य स्तर पर क्षेत्रीय या स्थानीय अल्पसंख्यकों की बात भी उठाती है इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों की अवधारणा राज्य स्तरीय अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है इसका अर्थ यह है कि यदि कोई समुदाय या वर्ग किसी अन्य विशेष में कुल मिलाकर बहुमत में हो तो वह भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक हो सकते हैं तथा इसके विपरीत स्थिति भी हो सकती है। 

भारत की राजनीतिक पर लैंगिक धार्मिक संप्रदाय तथा जातीय विभेद के प्रभावों का वर्णन करें 
लैंगिक विभेद का अर्थ है समाज का लिंग महिला तथा पुरुष के आधार पर बंटवारा समाज में लगभग 48% स्त्रियां हैं प्रारंभ में उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त थे परंतु धीरे-धीरे उनकी दशा खराब होती चली गई लैंगिक विभेद के कारण आज विश्व भर में राजनीति में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कम है अमेरिका में 20.2% यूरोप में 96.6 तथा एशिया के देशों का औसत मात्र 11.7 प्रतिशत है भारत में लोकसभा में सिर्फ 11% राज्यसभा में 9 पॉइंट 3% महिलाएं हैं भारत के राज्य विधानमंडलों में तो यह 4% ही हैं भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में संसद और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा किया है परंतु यह विधेयक अभी संसद में लंबित है l 
                                        धार्मिक एवं सांप्रदायिक प्रभाव आधुनिक युग में धर्म और राजनीति का गहरा संबंध है धर्म के आड़ में राजनीति का घिनौना खेल खेला जा रहा है कुछ राजनीतिक दलों का गठन भी किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है धार्मिक आवंटन नहीं संप्रदायवाद का रूप ले लिया है सांप्रदायिकता के कारण ही भारत का विभाजन हुआ था। 

जातीय विभेद का प्रभाव राजनीतिक में जाति का प्रभाव निम्नलिखित रुप से देखने को मिलता . 
1. राजनीतिक दल अपने अपने जाति आधारित बोर्ड बैंकों का ध्यान रखते हुए उम्मीदवारों का चयन करते हैं। 
2. सरकार बनाते समय भी सत्तारूढ़ दल अपने प्रांतीय राष्ट्र के जाति आधारित प्रतिनिधित्व का पूरा ख्याल रखते हैं 
3. राजनीतिक में जाति का प्रभाव के कारण ही पिछड़ी जाति के लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ती जा रही है या उनका मानना है कि बिना सत्ता हासिल किए हुए उनका कल्याण संभव नहीं है। 
4. राजनीतिक दल भी चुनावों के समय जाति आधारित भावनाओं को उकसाने का प्रयास करते हैं। 
भ्रूण हत्या से आप क्या समझते हैं? 
वर्तमान में अत्याधुनिक उपकरणों से गर्भ में ही शिशु के लिंग की जानकारी प्राप्त कर ली जाती है और पुत्री के जन्म होने की जानकारी होने पर गर्भ में ही उसकी हत्या कर दी जाती है इसे ही भ्रूण हत्या करते हैं। 

महिलाओं के सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं? 
महिलाएं आज राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी पिछड़ी हुई है नारियों के विकास के बिना समाज के विकास की बात करना असंभव है अतः महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागृत होना महिला सशक्तिकरण है। 

नोट:- सभी विद्यार्थियों से आग्रह है की इस क्लास नोट्स को अत्यंत ध्यानपूर्वक पढ़े। बहुत संभव है कि शब्दों में त्रुटी हो, हालाकि नोट्स को लिखते वक़्त हर संभव त्रुटि रहित रखने का प्रयास किया गया है। धन्यवाद्
 

राज्य एवं राष्ट्र की आय (अध्याय 2)

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राज्य एवं राष्ट्र की  आय 
अध्याय 2 

आय (Income) 

लोगों को अपने परिश्रम के फलस्वरूप जो धन अथवा वस्तु प्राप्त होती है, उसे उनकी आय कहते हैं। लोगों की आय के द्वारा देश के आर्थिक विकास की स्थिति का आकलन किया जता है।

राष्ट्रीय आय (National Income)

देश के लोगों को प्राप्त होने वाली आयों का योग राष्ट्रीय आय कहलाता है। चाहे वे देश में प्राप्त किए हों या विदेशों में जाकर प्राप्त किए हों। किसी भी देश का आर्थिक विकास उसकी राष्ट्रीय आय पर निर्भर होता है।


भारत का राष्ट्रीय आय - ऐतिहासिक परिवेश

भारत में सबसे पहले 1868 ई0 में दादा भाई नौरोजी ने राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाया था। उन्होंने अपनी पुस्तक 'Poverty and Un-British Rule in India' में प्रति व्यक्ति आय 20 रूपये बताया।

राष्ट्रीय आय के आंकड़ों को एकत्र (इकट्ठा) करने के लिए सरकार ने 1951 में केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (Central Statistical organisation) की स्थापना की। इस कार्य में राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (National Sample Survey organisation) सहायता करता है।

प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income)

राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर लोगों को उपभोग वस्तुएँ और सेवाएँ अधिक मात्रा में उपलब्ध होती हैं। केवल आय में होने वाली वृद्धि किसी देश की आर्थिक स्थिति को नहीं व्यक्त करती हैं। यदि राष्ट्रीय आय बढ़ने के साथ जनसंख्या में भी वृद्धि हो जाए तो जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं होता।

किसी देश का राष्ट्रीय आय में कुल जनसंख्या से भाग देने पर जो भागफल होता है, वह उस देश का प्रति व्यक्ति आय होता है। प्रति व्यक्ति आय को औसत आय भी कहते हैं।

प्रति व्यक्ति आय (औसत आय) = राष्ट्रीय आय / कुल जनसंख्या

राष्ट्रीय आय की धारणा (concept of National Income) :

राष्ट्रीय आय की धारणा को निम्नलिखित आयामों के द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।

1.सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product)

2. सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product)

3. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product)

1. सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product)

एक देश की सीमा के अन्दर, एक वर्ष में, उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।

[अन्तिम वस्तुएँ एवं सेवाएँ - वे सभी वस्तुएँ एवं सेवाएँ जो उपभोग या निवेश के लिए खरीदी जाती है। इसमें परिवारों द्वारा की गई खरीद (भोजन, वस्त आदि) और पूंजीगत वस्तुएँ (मशीन फर्नीचर एवं परिवहन के लिए गाड़ियाँ इत्यादि) शामिल हैं।]

2. सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product) 

किसी देश के लोगों द्वारा (चाहे वे अपने देश में हो या विदेश में) एक वर्ष के अन्तर्गत जितनी वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन होता है, उनके मौद्रिक मूल्य को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल घरेलु उत्पाद + (देशवासियों द्वारा विदेशों में अर्जित आय - विदेशियों द्वारा देश में अर्जित आय)।

शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product) :

सकल राष्ट्रीय उत्पाद एक निश्चित अवधि में देश के 'सम्पूर्ण उत्पादन' का मौद्रिक मूल्य है। इसके उत्पादन में मशीन, औजार, कारखाने का भवन इत्यादि का एक अंश नष्ट हो जाता है और उनकी समय-समय पर मरम्मत करानी पडती है या बदलना पड़ता है। इसे घिसावट एवं प्रतिस्थापन व्यय (Depreciation and replacement cost) कहते हैं।

अतः सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से घिसावट एवं प्रतिस्थापन व्यय को घटा देने से जो शेष बचता है उसे शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।

शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद = सकल राष्ट्रीय उत्पाद घिसावट एवं प्रतिस्थापन व्यय

राष्ट्रीय आय की गणना तथा माप (Measurement of National Income) :

राष्ट्रीय आय की गणना तीन प्रकार से की जाती है, जो निम्नलिखित हैं -

1. उत्पादन गणना विधि (census of Production Method)

2. आय गणना विधि (Census of Income Method)

3. व्यय गणना विधि (census of Exdpenditure Method)

1. उत्पादन गणना विधि

उत्पादन गणना विधि के अन्तर्गत देश की अर्थव्यवस्था को कृषि, उद्योग, व्यापार, परिवहन इत्यादि क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। इन सभी क्षेत्रों द्वारा एक वर्ष के अन्तर्गत उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य तथा निर्यात (विदेशों को भेजने वाली वस्तु) एवं आयात (विदेशों से आने वाली वस्तु) के अन्तर को जोड़ दिया जाता है।

2.आय गणना विधि

व्यक्तियों को आय के आधार पर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है तो उस विधि को आय गणना विधि कहते हैं।

3. व्यय गणना विधि

व्यक्ति अपनी आय को वस्तुओं और सेवाओं पर व्यय (खर्च) करता है इसलिए राष्ट्रीय आय की गणना लोगों के व्यय को जोड़कर किया जाता है।

राष्ट्रीय आय की गणना में कठिनाइयाँ (Difficulties in Measurement of National Income):

1. आंकड़ों को एकत्र करने में कठिनाई

पूरे देश में लोगों की आय को उत्पादन के रूप में या उनकी आय के रूप में आँकते हैं। इन्हें एकत्र करना मुश्किल है।

यदि सही आँकड़े उपलब्ध नहीं हों तो राष्ट्रीय आय की गणना सही नहीं हो सकती।

2. दोहरी गणना की सम्भावना

राष्ट्रीय आय की गणना करते समय कई बार एक ही आय को दुबारा गिन लिया जाता है। उदाहरण के लिए एक डॉक्टर को मासिक आय 20,000 रूपये है, जिसमें से वह 5,000 रूपये कम्पाउन्डर को देता है। यहाँ कम्पाउन्डर की आय की पृथक रूप से गणना नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसकी गणना डॉक्टर की आय में हो चुकी है।

3. मौद्रिक विनिमय प्रणाली का अभाव

देश में उत्पादित बहुत सी वस्तुओं का मुद्रा के द्वारा विनिमय (लेन-देन) नहीं होता है। कछ वस्तुओं का उत्पादक स्वयं उपभोग कर लेते हैं या उनका अन्य वस्तुओं से लेन-देन किया जाता है। राष्ट्रीय आय को मापने में ऐसी वस्तुओं का मूल्यांकन करने में कठिनाई आती है।

4. मूल्य को मापने में कठिनाई

कोई भी वस्तु पहले कारखाने से थोक विक्रेता और इसके बाद खुदरा विक्रेता के पास आता है। प्रत्येक चरण में वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है। अतः इसको मापने में कठिनाई होती है।

विकास में राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय का योगदान (contribution of National and per Capita Income in Development)

आर्थिक विकास का राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय से गहरा सम्बन्ध है।विकास का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि द्वारा देश के लोगों का जीवन-स्तर ऊँचा उठाना है।

 राष्ट्रीय आय वास्तव में देश के अन्दर पूरे वर्ष में हुए उत्पादन को कहते हैं। जैसे-जैसे लोगों को रोजगार मिलेगा, वैसे-वैसे उत्पादन में वृद्धि होगी, श्रमिकों का वेतन बढ़ेगा, उनकी आय बढ़ेगी तथा उनक जीवन-स्तर पहले की अपेक्षा बेहतर होगा। इस प्रकार प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से व्यक्तियों का विकास होगा।

बिहार की आय (Income of Bihar)

किसी भी देश या राज्य की आय का मुख्य स्रोत उसकी उत्पादक क्रियाएँ होती हैं। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के उत्पादन में वृद्धि होने से राज्य की आय में वृद्धि होती है। विगत वर्षों के अन्तर्गत बिहार में प्राथमिक क्षेत्र के उत्पादन में वृद्धि हुई है। द्वितियक अथवा औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। राज्य की आय में इस क्षेत्र का योगदान काफी कम है।

वर्तमान में बिहार के सकल घरेलू उत्पाद में तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्र का योगदान अधिक बिहार राज्य की प्रति व्यक्ति आय देश भर में न्यूनतम (सबसे कम) हैं।

बिहार के कुल 38 जिलों में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय पटना एवं न्यूनतम (सबसे कम)

प्रति व्यक्ति आय शिवहर जिले का है।

समाप्त


वैश्वीकरण (वर्ग 10 )

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वैश्वीकरण  

Globalization 

वैश्वीकरण क्या है  

वैश्वीकरण का अभिप्राय विश्व के विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को एक दूसरे के साथ जोड़ने से है इसके अंतर्गत विश्व के सभी अर्थव्यवस्था एक अर्थव्यवस्था या एक बाजार का रुप ले लेती है 

 वैश्वीकरण का अर्थ हमारी अर्थव्यवस्था और विश्व् अर्थव्यवस्था में सामंजस्य स्थापित करना इस प्रक्रिया में हम आर्थिक रुप से वैश्विक अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पारस्परिक रूप से निर्भर होते हैं ऐसा कई स्तरों पर होता है अनेक विदेशी उत्पादक अपना माल और सेवाएं भारत में भेज सकते हैं हम भी अपना निर्मित माल और सेवाएं दूसरे देशों को भेज सकते हैं वैश्वीकरण उस व्यक्तियों के लिए भी सहायक होता है जिनके पास भारत में उद्योग लगाने के लिए धन उपलब्ध है इस प्रकार का उत्पादन देश में बिक्री के लिए अथवा निर्यात के लिए हो सकता है इसी प्रकार भारत के उद्यमी भी दूसरे देशों में जाकर के पूंजी निवेश कर सकते हैं वैश्वीकरण में केवल पूंजी ही नहीं वरन एक देश से दूसरे देश में श्रमिकों का आदान-प्रदान भी सम्मिलित है 

Globalisation means free moment of capital goods Technology Idea and people . Any globalisation that means last one is partial and non sustainable. 

दूसरे शब्द में हम कह सकते हैं वैश्वीकरण निजीकरण तथा उदारीकरण की नीतियों का परिणाम है 

 निजीकरण (private station)  का अभिप्राय निजी क्षेत्र द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर पूर्ण रुप से या आंशिक रूप से शामिल प्राप्त करना तथा उसका प्रबंधन करना है। आर्थिक सुधारों के अंतर्गत भारत सरकार ने सन 1991 से निजी करण की नीति अपनाई। 

 उदारीकरण (liberalisation) 

उदारीकरण का अर्थ सरकार द्वारा लगाए गए सभी अनावश्यक नियंत्रण तथा प्रतिबंधों जैसे लाइसेंस कोटा आदि को हटाना है आर्थिक सुधारों के अंतर्गत सन 1991 से भारत सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई। 

वैश्वीकरण के इतिहास का संक्षिप्त परिचय 

वैश्वीकरण की धारणा  एक नई धारणा नहीं मध्यकालीन युग में भी विश्व के अनेक देश के पार के मध्य से परस्पर जुड़े हुए थे और उनकी भी वस्तु एवं विचारों एवं कौशल का आदान प्रदान होता रहा है परंतु इस काल में परिवहन तथा संचार के साधन बहुत विकसित नहीं थे इसके फलस्वरुप विश्व व्यापार कुछ विशेष देशों और वस्तुओं तक ही सीमित था वास्तव में वैश्वीकरण की प्रक्रिया आधुनिक युग की देन है जो आधुनिक क्रांति के पश्चात हुई है शताब्दी शताब्दी के प्रारंभ में इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्र में औद्योगिक क्रांति की संज्ञा दी जाती है  

 

1769 हमारा जेम्स वाट के द्वारा भाप इंजन का आविष्कार एक ऐतिहासिक घटना में मानी जाती है जिसने आधुनिक कारखाना प्रणाली को जन्म दिया  इसके पूर्व वस्तुओं का उत्पादन मुख्य रुप से स्थानीय घरेलू मांग को पूरा करने के लिए कारीगऱ के घरों में होता था लेकिन अब कारखानों में आधुनिक मशीनों द्वारा बृहत पैमाने पर उत्पादन होने लगा इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्र में होने वाले यह परिवर्तन कुछ ही समय में यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गए और उनके उत्पादन एवं व्यापार का क्रम विस्तार हो रहा था रेलवे और वास्तु चलित जहाजों ने उनके द्वारा उत्पादित भारी और नाशवान वस्तुओं को भी एशिया अफ्रीका और अमेरिका के सुदूर स्थान में भेजना प्रारंभ कर दिया था  टेलीग्राफ और टेलीफोन के प्रयोग से व्यापारियों के लिए संदेश भेजना और एक दूसरे से संपर्क स्थापित करना सरल हो गया इस प्रकार वैश्वीकरण को तीव्र बनाने वाले कारकों में आधुनिक मशीन द्वारा बृहद पैमाने पर उत्पादन तथा परिवहन और संचार के क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार की नीति इंग्लैंड का भी समर्थन मिला जो उन्नीसवीं शताब्दी विश्व का सबसे प्रभावशाली राष्ट्र था 

                  परंतु 1945 में  विश्व को  भयंकर युद्ध का सामना करना पड़ा इन में विभिन्न देशों की उत्पादन एवं आर्थिक क्षेत्र अत्यंत संकुचित हो गया था। युद्ध के पश्चात विश्व व्यापार को स्थापित करने में संयुक्त राष्ट्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस संघ ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के स्थापना की जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सहायक  सिद्ध हुए हैं।                         

वैश्वीकरण के मुख्य अंग क्या है ? 

अथवा वैश्वीकरण की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करें 

 मुक्त व्यापार वैश्वीकरण का आधार है। मुक्त व्यापार का अभिप्राय विदेश अथवा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की स्वतंत्रता से हैजब विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं के आवागमन पर कोई प्रतिबंध नहीं होता तब इसे मुक्त व्यापार या स्वतंत्र व्यापार की नीति कहते हैं ।आर्थिक सुधारों के क्रम में भारत ने भी वैश्वीकरण यार मुक्त व्यापार नीति अपनाई है या आशा की जाती है कि यदि या नीति देश के विकास दर को अति तीव्र बनाने में सहायक होगी वैश्वीकरण के मुख्य अंग या इसकी विशेषताएं निम्नलिखित है 

A. व्यवसाय और व्यापार संबंधी अवरोधों की कमी(laser the of Business and trade) 

B. पूंजी तथा निर्बंध प्रभाव (free flow of capital) 

C. प्रौद्योगिकी का निर्माण पर प्रभाव( free flow of Technology) 

D. श्रम का मुक्त प्रवाह (free flow of labour) 

E. पूंजी का पूर्ण परिवर्तनशीलता (free convertibility of

capital) 

वैश्वीकरण के लाभ  

कुशलता में सुधार.  मुक्त व्यापार वैश्वीकरण का आधार है इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक देश के अपने उपलब्ध साधनों के अनुसार वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में विशिष्टीकरण प्राप्त करता है इससे उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती है तथा कम लागत में ही अधिकतम उत्तम कोटि की प्रमाणिक वस्तु का उत्पादन होता है  

साधनों की आय में समानता वैश्वीकरण के फलस्वरुप एक दूसरे के साथ व्यापार करने वाले देशों के बीज उत्पादन के साधनों की आय में समानता आती है  

वित्तीय साधनों में वृद्धि वैश्वीकरण से वित्तीय साधनों की पूर्ति में भी वृद्धि होती है एक विश्व अर्थव्यवस्था में बैंक एवम् अन्य वित्तीय संस्थाएं एक देश से दूसरे देश में पूंजी का स्थानांतरण करती है इससे भारत जैसे विकासशील देशों को अधिक लाभ होता है 

 श्रम की गतिशीलता में वृद्धि वैश्वीकरण से श्रम की गतिशीलता में वृद्धि होती है इससे फल स्वरुप केबल पूंजी का ही नहीं वरन एक देश से दूसरे देश में श्रमिकों का भी आदान-प्रदान होता है इससे विकसित और विकासशील देश दोनों को  लाभ होता है 

 बहुराष्ट्रीय कंपनियां (multinational company) 

बहुराष्ट्रीय कंपनियां वह है जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण व स्वामी पर रखती है जैसे Honda पेप्सी कोका कोला कोलगेट Nokia oppo samsung redme  आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उदाहरण हैं इनका मुख्यालय किसी अन्य देश में है तथा यह भारत सहित अनेक देशों में उत्पादन एवं व्यापार करती है। 

वैश्वीकरण की प्रक्रिया में बहुराष्ट्रीय कंपनी की भूमिका  

एक बहुराष्ट्रीय कंपनियां बहुराष्ट्रीय निगम हुआ है जिसका एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण या स्वामित्व तो होता है इनकी उत्पादक क्रियाएं किसी एक देश में सीमित ना होकर अनेक राष्ट्रों में फैली रहती है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ अर्जित करना होता है अतः अन्य स्थानों में कार्यालय एवं उत्पादन संयंत्र स्थापित करती है जहां उन्हें सस्ते श्रम तथा अन्य संसाधन उपलब्ध होते हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का सबसे सामान्य तरीका अन्य देशों की स्थानीय कंपनियों को खरीदना है तथा इसके बाद उत्पादन का विस्तार करना है कई बार स्थानीय कंपनियों के साथ मिलकर संयुक्त रुप से उत्पादन करती है बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादक गतिविधियों से सुदूर देशों का उत्पादन एक दूसरे के साथ जुड़ता रहता है इससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया तीव्र होती है। 

 (ग्लोबल कनेक्शन ऑफ प्रोडक्ट्स

 बहुराष्ट्रीय कंपनियां कई प्रकार से अपने उत्पादन कार्य का प्रसार करती है जैसे  

स्थानीय कंपनी को खरीदना और उसके बाद उत्पादन का प्रचार करना। इसका उदाहरण है पार्ले समूह के thumbs  up  ब्रांड को coco cola जो बहुराष्ट्रीय कंपनी है ने खरीद लिया। 

कभी कभी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन देशों की स्थानी कंपनियों के साथ संयुक्त रुप से उत्पादन करती है। इससे स्थानीय कंपनियों को एक नई नवीन प्रौद्योगिकी मिलता हैक्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ अपने साथ लाती है दूसरा ज्यादा उत्पादन करने के लिए पूंजी मिलता है क्यो की राष्ट्रीय कंपनियों के पास काफी ज्यादा पूंजी होता है 

 बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां माल के उत्पादन के लिए छोटे उत्पादकों का सहारा लेती है जैसे वस्त्र जूते खेल के सामान खिलौने आदि का उत्पादन बड़ी संख्या में छोटे उत्पादकों द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए किया जाता है दो राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद के नाम से दुनिया भर में बेचती है 

                                          इस प्रकार हम देखते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां संजू उपकरण के माध्यम से या कंपनियों के विलय से या विभिन्न देशों की ओर छोटे उत्पादकों से माल आपूर्ति ले करके अपना उत्पादन जाल फैलाते हैं इस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा विश्व के दूर-दूर स्थानों पर फैला उत्पादन एक दूसरे से संबंधित हो रहा है एवं वैश्वीकरण की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभा रहा है 

विदेशी व्यापार एवं बाजारों का एकत्रीकरण(foreign trade and integration of market) 

 विदेशी व्यापार विश्व के देशों के बाजार को जोड़ने या एकत्रीकरण का कार्य करते हैं वैश्वीकरण के फलस्वरुप विदेशी व्यापार का दायरा बढ़ा है। पूर्व से ही विदेश व्यापार विभिन्न निर्देशों को आपस में जोड़ने का मुख्य साधन रहा है  व्यापार करने के लिए ही ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई समानता दो देशों के बीच मुक्त व्यापार होने से वस्तुओं का एक बाजार से दूसरे बाजार में आगमन होता है बाजार में वस्तुओं के विकल्प  बढ़ जाते हैंतथा दो बाजार में एक ही वस्तु का मूल्य एक समान होने लगता है। अब से दूर देशों के उत्पादक एक दूसरे से हजारों मील दूर होकर भी आपस में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं इस प्रकार विदेश व्यापार विभिन्न देशों के बाजारों को जोड़ने आसपास के एकीकरण में सहायक होता है। 

वैश्वीकरण को प्रभावित या संभव बनाने वाले कारक    

1. प्रौद्योगिकी में प्रगति वैश्वीकरण और विभिन्न क्षेत्रों की एकीकरण को संभव बनाने वाले कारकों में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाले प्रगति एक प्रमुख कारण है उदाहरण के लिए पिछले लगभग 50 वर्ष के परिवहन में बहुत सुधार हुए हैं इससे भारी और नाशवान वस्तुओ को भी सुदूर स्थानों पर भेजना संभव हो गया है। इस प्रकार वायु परिवहन की लागत में गिरावट आने से अब वायु मार्ग द्वारा अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में वस्तुओं को भेजा जा सकता है कंटेनर्स  के प्रयोग से ढुलाई के खर्च में भारी बचत हुई है इस से माल को ट्रकों जहाज रेलवे एवं वाहनों पर बिना छती लाया जा सकता है  

2.  वैश्वीकरण को प्रोत्साहित करने वाले कारकों में परिवहन प्रौद्योगिकी से भी अधिक महत्वपूर्ण सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी  (information and communication Technology, IT) का विकास है सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास में वैश्वीकरण की प्रक्रिया को काफी तेज किया है वर्तमान समय में दूरसंचार कंप्यूटर और इंटरनेट के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से विकसित हो रही है  आज विश्व के सभी भागों के निवासी एक दूसरे से संपर्क करने सूचनाओं को तत्काल प्राप्त करने और दूरस्थ क्षेत्रों से संवाद के लिए दूर संचार सुविधाएंटेलीग्राफ टेलीफोन मोबाइल फोन और फैक्सका प्रयोग करते हैं संचार उपग्रहों ने इन सुविधाओं को बहुत सुगम बना दिया है।     

 विश्व व्यापार संगठन वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन  

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में संयुक्त राज्य संघ के सदस्य द्वारा आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए की गई थी। इसका मुख्य कार्यालय जनेवा में हैइस संगठन ने भारत समेत अधिकतर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की प्रतिक्रिया को प्रभावित किया है इसका उद्देश्य विश्व के देशों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को इस प्रकार संचालित करना है कि उन में समानता हो खुलापन हो और वह बिना किसी भेदभाव के हो। वर्तमान समय में विश्व व्यापार संगठन 2006 के 149 सदस्य हैं। 

भारत में वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन इन इंडिया

 भारत सरकार की वर्तमान आर्थिक नीति का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के लिए विश्व स्थर् पर प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का विकास करना है। यह सरकार की पूर्व नीति से भिन्न है , विकास की वर्तमान स्थिति में भारत के उद्योग एवं व्यापार को नई प्रौद्योगिकी और ज्ञान की अति आवश्यकता हैइसके साथ ही जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत एक बड़ा देश है जिसके कारण उत्पादन के सस्ते साधनों की उपलब्धता के कारण यहां बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है विश्व बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के कारण दुनिया की  निगाह सभी देश की जगह भारत पर है ऐसी स्थिति में देश के आधुनिक तकनीकी ज्ञान एवं पूंजी को आकर्षित करने के लिए तथा विश्व बाजार में मानव पूंजी और उत्पादित वस्तु को भेजने में वैश्वीकरण का महत्व बहुत बढ़ जाता है। 

वैश्वीकरण के समर्थक भारत में वैश्वीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं  

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रोत्साहन वैश्वीकरण से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रोत्साहित होगा जिससे भारत जैसे विकासशील देश अपने विकास के लिए पूंजी प्राप्त कर सकेगा। 

 प्रतियोगी शक्ति में वृद्धि वैश्वीकरण की नीति के भारत जैसे विकासशील देश की प्रतियोगी शक्ति में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था का विकास संभव हो सकेगा 

 नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग में सहायक वैश्वीकरण भारत जैसे विकासशील देशों को विकसित देशों द्वारा तैयार की गई। नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग में सहायता प्रदान करता है 

 अच्छी उपभोक्ता वस्तुओं की प्राप्ति वैश्वीकरण भारत जैसे विकासशील देशों को अच्छी अच्छी गुणवत्ता की वस्तुओं को सापेक्षता प्राप्त करने के योग बनाता है।  

नई बाजार तक पहुंच वैश्वीकरण के फलस्वरुप भारत जैसे विकासशील देशों के लिए दुनिया के बाजारों तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा 

उत्पादन के स्तर को उन्नत करना वैश्वीकरण के द्वारा उन्नत मशीन तथा तकनीक के प्रयोग से उत्पादन के स्तर को उठाया जा सकता है।  

बैंकिंग तथा वित्तीय क्षेत्र में सुधार वैश्वीकरण के अन्य देशों के संपर्क में आने से बैंकिंग तथा वित्तीय क्षेत्र की कुशलता में सुधार होगा  

मानव पूंजी की क्षमता का विकास कौशल विकास को बढ़ावा मिलता हैभारत जैसे विकासशील एवं विकसित देश को अपनी निर्यात की वस्तुओं में श्रम प्रधान तकनीक का प्रयोग करते हैं इससे मजदूरी की दर तथा श्रमिकों की वृद्धि होती है। 

वैश्वीकरण ऐतिहासिक परिवेश में 1991 से पूर्व आर्थिक विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति को ही भारत ने अपनाया था इस नीति को अपनाने के लिए मुख्य कारण था कि कोयला खनन इस्पात शक्ति और सड़कें जैसी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उद्योग सरकार को अपने जिम में रखने चाहिए तथा इन बातों पर भी तर्क दिया गया की महत्वपूर्ण उद्योगों का प्रबंधन सरकार के अपने हाथों में रहने से अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए आवश्यक संसाधन मिल सकेंगे। 

                                                       निजी क्षेत्र को उद्योगों और व्यापार में कार्य करने की अनुमति दी गई परंतु कानून के अंतर्गत नियम और प्रतिबंधों को स्वीकार करते हुए यह इसलिए भी आवश्यक समझा गया ताकि संसाधन और धन-संपत्ति केवल कुछ हाथों में ही केंद्रित होकर महाराजा सार्वजनिक क्षेत्र में सरकार ने अपनी आय का काफी बड़ा भाग निवेश में लगाया और सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योग उद्यम प्रारंभ में पहली पंचवर्षीय योजना 1951 से 1956 सरकारी पंचवर्षीय योजना 1997- 2002 में ₹3200 करोड़ों का हो गया  इस कार्य नीति का उद्देश्य गरीबी का उन्मूलन और सामाजिक न्याय के आधार पर आर्थिक विकास को प्राप्त करना था। संसाधनों के नियंत्रण प्राप्त होने से एक ऐसी स्थिति आ गई जब भारत का सर्वाधिक क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र बहुत बड़ा हो गयासरकार के आय का एक बड़ा भाग  अन्य विकास के कार्यों की ओर ना जाकर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की धन की पूर्ति में लगने लगा। 

 भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों से आप क्या समझते हैं  

1991 के आर्थिक सुधारों के अंतर्गत वे सभी तरीके शामिल हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए 1991 में अपनाए गए इन सुधारों का मुख्य बल अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और कुशलता में वृद्धि के लिए एक प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण का निर्माण करने पर था । हमारे देश में आर्थिक सुधारों का प्रारंभिक विदेशी व्यापार की प्रतिकूलता और विभिन्न कारणों से देश की उत्पन्न विदेशी विनिमय की गंभीर संकट की पृष्ठभूमि पर हुआ था आर्थिक सुधार की नीतियों में व्यापार और सुधारों को विशेष महत्व दिया गया। सरकार ने जुलाई 1991 से व्यापार क्षेत्र में ऐसी कई सुधार किए हैं जो हमारे देश को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सहायक हुए हैं। 

बिहार में वैश्वीकरण का प्रभाव  

वैश्वीकरण के वर्तमान युग में उपयोग एवं उत्पादन के क्षेत्र में पूरी दुनिया एक देश हो गया है  और इस कारण वैश्वीकरण का सुखद परिणाम बिहार राज्य में भी दिखाई पड़ने लगे हैंप्रगति की वर्तमान स्थिति में और अधिक मजबूती लाना आवश्यक है तभी हमें वैश्वीकरण का लाभ प्राप्त हो सकेगा। 

                   वैश्वीकरण का बिहार के जन जीवन पर ना केवल सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं बल्कि इनके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं जो हमने लिखित रूप से व्यक्त करते हैं या कर सकते हैं 

कृषि उत्पादन में वृद्धि  

निर्यातों में वृद्धि  

विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग की प्राप्ति  

शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद तथा शुद्ध प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पादन में वृद्धि  

विश्वस्तरीय उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता  

रोजगार के अवसरों में वृद्धि  

बहुराष्ट्रीय बैंक एवं बीमा कंपनियों का आगमन  

बिहार के आर्थिक जीवन पर वैश्वीकरण का जो नकारात्मक प्रभाव पड़ा है हम मुख्य रूप से निन्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं  

कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों की उपेक्षा  

कुटीर एवं लघु उद्योग पर विपरीत प्रभाव  

रोजगार पर विपरीत प्रभाव  

आधारभूत संरचना के क्रम विकास के कारण कम निवेश 

आर्थिक सुधारों का अर्थ meaning of economic reforms 

 भारत में आर्थिक सुधारों का मतलब उन नीतियों से है जिसका प्रारंभ 1991 में अर्थव्यवस्था में कुशलता उत्पादकता लाभदायकता एवं प्रतियोगिता के शक्ति के स्तर में वृद्धि करने के दृष्टिकोण से किया गया है  

                     यह स्तर आर्थिक उदारीकरण (liberalisation ) निजीकरण (privatization) वैश्वीकरण (globalisation) की नीतियों पर आधारित है अतः इसे हम LPG नीति भी कहते हैं यहां ध्यान देने की बात यह है कि आर्थिक सुधारों को नई आर्थिक नीति के नाम (new economic policy ) से भी पुकारते हैं  

आर्थिक सुधारों एवं नई नीति आर्थिक सुधारों की निम्नलिखित उद्देश्य हैं  

  1. उत्पादन इकाइयों की कुशलता एवं उत्पादकता स्तर पर सुधार लाना 
  2. उत्पादन इकाइयों के प्रतियोगी क्षमता को बढ़ाना 
  3. भूतकाल की तुलना में विदेशी विनियोग एवं तकनीक अधिक से अधिक उपयोग करना 
  4. आर्थिक विकास की दर को बढ़ाना आर्थिक विकास के लिए सर्वव्यापी संसाधन का प्रयोग करना  
  5. वित्तीय क्षेत्र में सुधार लाना तथा इसे आधुनिक बनाना की अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा कर सके  
  6. सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य संपादन में सुधार लाना तथा इसके क्षेत्र को अधिक युक्तिसंगत बनाना आर्थिक सुधारों की विशेषताएं। 

 आर्थिक सुधार या नई आर्थिक नीति का मुख्य विशेषताएं 

 वैश्वीकरण से आदमी का जीवन किस प्रकार प्रभावित हुआ है। 

आम आदमी की श्रेणी में निम्न मध्यम एवं निर्धन वर्ग के व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है जो आराम एवं विलासिता की अधिकांश वस्तुओं के उपयोग से वंचित होते हैं इनकी इतनी कम होती है कि यह अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं को ही कठिनाई से पूरा कर पाते हैं हमारे देश के इस प्रकार के व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है तथा यह प्रश्न अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि इनका जीवन यापन वैश्वीकरण से किस प्रकार प्रभावित हुआ है   

भारत सरकार के वैश्वीकरण की नीति लगभग दो दशक पहले  बनाई गई इसके फलस्वरुप देश के अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है विदेशी निवेश बढ़ा है तथा सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि हुई है लेकिन इस से समाज की किसी वर्ग के लोग समान रुप से लाभान्वित नहीं हुए हैं प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए भारत की बड़ी कंपनियों में ने भी अपनी उत्पादन प्रणाली में सुधार तथा मानक को ऊंचा उठाने का प्रयास किया है अब भारतीय बाजारों में मोटर गाड़ी दुपहिया वाहनो इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद आदि जैसे उपभोक्ता पदार्थों की पूर्ति बहुत बढ़ गई है आज उपभोक्ताओं के समक्ष पहले से अधिक विकल्प मौजूद है तथा अधिक उत्कृष्टता वाले उत्पादन को कम मूल्य पर खरीद लेते हैं लेकिन उत्पादों के अधिकांश क्रेता एवम संपन्न वर्ग के लोग हैं इससे आम आदमी का सामान्य उपभोक्ता को विशेष लाभ नहीं हुआ है 

वैश्वीकरण से भारत के सभी उपभोक्ता तथा बड़े उत्पादक लाभांवित हुए हैं लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा के मध्यम तथा छोटे उत्पादकों को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित किया है खिलौना बैटरी उत्पाद एवं खाद्य तेल के उदाहरण आपदा के कारण उत्पादों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है इसके फलस्वरुप एक लघु इकाइयां बंद हो गई हैं और इस में कार्यरत बेरोजगार हो गए हैं ऐसे अनुमान है कि पिछले कुछ वर्षों से लगभग 5 गोलियां बंद हो चुके हैं जिससे 2500000 से भी अधिक बेरोजगार हो गए हैं भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा कृषि के क्षेत्र देश के सबसे अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है 

                                   वैश्वीकरण से श्रमिकों  के जीवन यापन से प्रभावित हुआ है कुशल श्रमिकों की आय में वृद्धि हुई है लेकिन अकुशल श्रमिकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है प्रथा के कारण अधिकांश नियोजक रोजगार की शर्तों को लचीला बनाने के लिए प्रयासरत है इसका अभिप्राय है कि अपनी आवश्यकता अनुसार श्रमिकों को नियुक्ति करने लगे हैं इसका एक उदाहरण परिधान उद्योग है जिस के फलस्वरुप उद्योग के अनेक श्रमिक बेरोजगार हुए हैं और अस्थाई श्रमिकों के रूप में कार्य करने के लिए विवश हैं। 

 मूल रूप से आम आदमी पर वैश्वीकरण का निम्नलिखित अच्छा प्रभाव पड़ा है 

  •  उपयोग के आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता 
  •  रोजगार की बढ़ती हुई संभावना 
  •  अधिकतम तकनीक का उपलब्धता 

नाकारात्मक प्रभाव  

  • सामान्य कम कुशल लोगों में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका  
  • उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में बढ़ती हुई प्रतियोगिता 
  • श्रम संगठनों पर बुरा प्रभाव मध्यम एवं छोटे उत्पादकों की घटनाएं कृषि एवं ग्रामीण बैंक ग्रामीण क्षेत्र का संकट।